लोकतंत्र की आत्मा को नष्ट कर रहा है सरकारी विज्ञापनों का वर्तमान स्वरूप

आजकल सरकारें सूचनाएं छुपाती हैं और विज्ञापन अधिक देती हैं।...

लोकतंत्र की आत्मा को नष्ट कर रहा है सरकारी विज्ञापनों का वर्तमान स्वरूप

सरकारी विज्ञापनों की दुनिया 

आजकल सरकारें सूचनाएं छुपाती हैं और विज्ञापन अधिक देती हैं।

वीरेन्द्र जैन

हमारे देश की विभिन्न राज्य सरकारें और केन्द्र सरकार जिसे सरकारी विज्ञापन कहती है वह देश और उस जनता के साथ एक बड़ा धोखा है जिससे अर्जित टैक्स के पैसे से ये विज्ञापन दिये जाते हैं। सरकार का काम जनता को सूचना देना  होता है। सूचना प्राकृतिक है और विज्ञापन किसी सूचना का अतिरंजित रूप जिसमें सूचना देने के लिए अधिकृत के पक्ष में सूचना को अभिमंडित किया जाता है। यह अभिमंडन किसी लक्ष्य विशेष की प्राप्ति के लिए किया जाता रहा है। आजकल सरकारें सूचनाएं छुपाती हैं और विज्ञापन अधिक देती हैं।

सामाजिक बदलाव के लिए व जनता के अन्दर बसे अन्धविश्वासों को दूर करने के लिए शिक्षण प्रशिक्षण हेतु कई जनहितकारी सूचनाएं कलाओं का सहारा लेकर देना बुरा नहीं है क्योंकि इस तरह वे सन्देश को सुग्राह्य बनाती हैं। अक्षर ज्ञान से वंचित लोगों को समझाने के लिए चित्रात्मक रूप से प्रस्तुत करना भी जरूरी होता है। दृश्य माध्यम आने के बाद उक्त लक्ष्य की प्राप्ति हेतु फिल्में भी बनने लगी थीं, और रंगीन टीवी आने के बाद जब विजुअल मीडिया विज्ञापन का मुख्य माध्यम बन गया तो व्यापारिक विज्ञापनों के बीच में सरकारी विज्ञापन भी आने लगे।

अच्छा हो अगर विज्ञापित राशि को भी उस विभाग के बजट में जोड़ दिया जाए

विभिन्न सरकारों के वार्षिक बजट में इस के लिए बड़ी राशि आवंटित की जाने लगी। यह एक ऐसा मद था जिसके प्रभाव की सीधी जाँच कठिन थी इसलिए इस का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग होने लगा। जिस माध्यम का उपयोग जनता को जरूरी सूचनाएं देने के लिए होना था वह सरकार में बैठे नेताओं की छवि बनाने और चमकाने में होने लगा है। कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगायी गयी रोक से पहले किसी पुल के उद्घाटन के लिए भी जो बहुत बड़ी राशि के विज्ञापन जारी किये जाते थे उसमें केन्द्रीय मंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री, विभाग के मंत्री, स्थानीय सांसद, विधायकों आदि के फोटो लगे विज्ञापन सारे अखबारों में फैला दिये जाते थे, पर अब ऐसा होना थमा है। अब केवल प्रधान मंत्री, या मुख्यमंत्री के फोटो ही विज्ञापनों में प्रदर्शित किये जा सकते हैं। सरकारें अपने कर्तव्यों के निर्वहन में जो कार्य करती हैं उन्हें भी बड़े बड़े विज्ञापनों के माध्यम से बताती रहती हैं, जबकि अगर वे वास्तव में किये गये होते तो जनता खुद ही महसूस कर लेती उसे बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती। अच्छा होता अगर विज्ञापित राशि को भी उस विभाग के बजट में जोड़ दी जाती।

विज्ञापनों से मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिशें

कहा जाता है कि इस तरह के विज्ञापनों से सूचना माध्यमों की मदद की जाती है, जबकि ऐसी मदद के नाम से वे मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिशें करती हैं। जो मीडिया उनकी मर्जी के बिना घटनाओं की निष्पक्ष समीक्षा करता है उसके विज्ञापनों में कटौती करके उस पर दबाव बनाया जाता है। विज्ञापनों की दरें उसके सर्कुलेशन के अनुसार तय की जाती हैं, इसलिए ज्यादातर समाचार पत्र अपने सर्कुलेशन की संख्या बहुत अतिरंजित करके बताते हैं। देश में समाचार पत्रों की कुल संख्या के आंकड़ों के अनुसार तो पूरे देश को साक्षर होना चाहिए था किंतु परिदृश्य एकदम से भिन्न है। विज्ञापनों की राशि समाचारों को उनके मूल रूप में सामने न आने देने के लिए स्तेमाल की जा रही है। मध्य प्रदेश में पिछले दिनों जब व्यापम जैसे भयानक कांड जिसके घटित होने के सारे प्रमाण मौजूद थे, को इस तरह से दबा दिया गया जैसे कि कहीं कुछ हुआ ही न हो। समाचार पत्र, पत्रिकाओं को खुले हाथ से विज्ञापन लुटाये गये। पत्रकारों को बड़ी राशि के सम्मानित करने के अनेक आयोजन हुये। यहाँ तक कि प्रमुख पत्रकारों, सम्पादकों की पत्नियों, भाइयों, या अन्य परिवारीजनों के नाम से चलने वाली वेव पत्रिकाओं को जिनकी दर्शक संख्या अज्ञात है, 148 करोड़ के विज्ञापन लुटा दिये गये। जिनको नहीं मिले उन्होंने स्वर भी बुलन्द किये किंतु नक्करखाने में तूती की आवाज कौन सुनता है। प्रदेश में पेटलावाद जैसा भयानक कांड हुआ, बड़वानी में आँख फोड़ देने वाले लापरवाह आपरेशनों में सैकड़ों लोग अन्धे बना दिये गये किंतु ये समाचार एक दिन की अपेक्षाकृत छोटी खबर बन कर रह गये। विस्मृति के बाद जेल से भागे कैदियों की सन्देहात्मक मृत्यु, मन्दसौर में किसानों पर गोली चालन, ग्वालियर मुरैना में दलितों पर गोली चालन आदि भी जाँच के नाम पर ‘नो वन किल्लिड जेसिका’ बना दिये गये।

चुनावों के समय विज्ञापनों के खेल अपना रूप बदल लेते हैं। आचार संहिता लगने से पहले ही अलिखित समझौते पर विज्ञापनों का कोटा पूरा कर दिया जाता है। आचार संहिता लगने के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के विज्ञापनों में वृद्धि हो जाती है और वे चुनिन्दा अखबारों को ही मिलते हैं। जिन कार्पोरेट घरानों की मदद सरकार करती है वे सरकारी पार्टी के इशारे पर उसके पक्ष में माहौल बनाने वाले अखबारों को अपना विज्ञापन देते रहते हैं, व ऐसे विज्ञापन देते हैं जो उनके संस्थानों के उत्पाद या सेवाओं के प्रचार में कोई मदद नहीं कर रहे होते हैं। पेड न्यूज इससे अलग होती है। कोबरा पोस्ट के स्टिंग में इतना बड़ा खुलासा होने के बाद भी सम्बन्धित मीडिया हाउसों और साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वालों पर व उनके हथकंडों पर कोई असर नहीं पड़ा। यह एक कौम के स्पन्दनहीन होने को दर्शाता है। दूसरी ओर विज्ञापनों से पूरित ये समाचार माध्यम विपक्ष के सारे प्रयासों, और आन्दोलनों के समाचारों को विलोपित कर देते हैं। महाराष्ट्र और राजस्थान के बड़े किसान आन्दोलन मुख्य धारा के मीडिया से गायब ही रहे।

पता नहीं सीएजी आदि विज्ञापनों के मद में हुये खर्चों और उसकी उपयोगिता के सम्बन्ध में कोई जाँच करती है या नहीं किंतु राज्यपाल बना दिये गये सेवानिवृत अधिकारियों की स्थापनाएं धूमिल हो जाने के बाद लगता नहीं कि यह खुला खेल कभी बन्द भी होगा। जिस जनता का पैसा लुटाया जा रहा है उसे ही सही सूचना से वंचित रखा जा रहा है। आये दिन किसी न किसी विभाग के अधिकारी कर्मचारियों के घरों पर पड़े छापों में करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति उद्घाटित होती रहती है, जो इस बात की संकेतक है कि उसके अनुपात में कितनों की सम्पत्ति ऐसी है जिस पर हाथ नहीं डाला जा सका है। यह राशि विकास के व्यय में बतायी गयी राशि में से ही चुरायी गयी होती है। जब इतनी बड़ी बड़ी राशियां उसमें से चुरा ली जाती हैं तो अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि विज्ञापित विकास कितना झूठा होगा।

सरकारी विज्ञापनों का वर्तमान स्वरूप हर बोलने वाली आवाज को खामोश करने के सबसे बड़े माध्यम बन कर लोकतंत्र की आत्मा को नष्ट कर रहा है। 

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