भारत-चीन विवाद : क्या है मोदी का कुसूर और क्यों हार रहे हैं हम

आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत का बयान कि भारत चीन और पाकिस्तान समेत आंतरिक विरोधियों से लड़ने को तैयार है, एक अगम्भीर के साथ-साथ खतरनाक परिणाम देने वाला बयान माना जाना चाहिए ...

भारत-चीन विवाद : हमें आंतरिक कमजोरियों से उबरना होगा

शाहनवाज आलम

डोकलम विवाद के कारण चीन और भारत के बीच बिगड़ते माहौल में भारत सरकार की उहापोह ने एक बार फिर हमारी कमजोरियों को उजागर कर दिया है, जिससे आम लोगों में इस मुद्दे पर कोई एक आम राय नहीं दिख रही है जो कि ऐसी किसी भी स्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर दिखनी चाहिए। जिसके कारण विचारहीनता, लक्ष्यहीनता और अराजकता का आंतरिक माहौल बनता दिख रहा है। जिसकी सबसे बड़ी वजह मौजूदा केंद्र सरकार में ‘कलेक्टिव रिस्पोंसेबिलिटी’ के सिद्धांत जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूण आधार होता है, कि कमी का होना है।

ऐसा संदेश गया है कि इस सरकार में जो कुछ भी हैं वो प्रधानमंत्री मोदी हैं, विदेश मंत्री या रक्षा मंत्री का कोई मतलब ही नहीं रह गया है।

ऐसा माहौल बनता दिखा कि पूरा मंत्रिमंडल और उनके साथ पूरा देश इस बात का इंतजार कर रहा हो कि प्र्रधानमंत्री मोदी कब विदेश दौरे से लौटते हैं और क्या कहते हैं। तब तक सब कुछ अपनी जगह स्थिर बना रहना है और इस मुद्दे पर जो भी जनमत बनना है वो चैनलों के माध्यम से बनना है। जबकि ऐसी स्थिति में विदेश मंत्री की सक्रीयता सबसे ज्यादा अपेक्षित होती है। उन्हें ही आगे बढ़ कर यहां तक कि अगर प्रधानमंत्री देश में हों तब भी पहल करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं होता नहीं दिख रहा है और ना इसकी उम्मीद ही की जा रही है।

आम लोगों में यह धारणा बहुत तेजी से विकसित हुई है कि विदेश मंत्री की भूमिका सिर्फ विदेशों में फंसे भारतीयों या विदेश में रह रहे किसी व्यक्ति के परिवार को संकट के समय में मानवीय मदद पहुंचाने भर की रह गई है। वहीं प्रधान मंत्री के बारे में यह धारणा बनती दिख रही है कि उनके विदेशी दौरों और अंतरराष्ट्रीय नेताओं से व्यक्तिग मित्रता के दावे अगर सच होते तो चीन इस तरह की धमकी नहीं देता।

इस स्थिति से वैश्विक समुदाय में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की हैसियत से गलत संदेश गया है कि हम हर मसले पर सिर्फ एक व्यक्ति पर निर्भर हैं और हमारे मंत्रिमंडल का अधिकार क्षेत्र सिर्फ कागज तक सीमित है। वहीं अगर इस मुद्दे पर चीन का रूख देखा जाए तो वहां से लगातर दूसरे या तीसरे रैंक के नेतृत्व की तरफ से ही अगुवाई होती दिख रही है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कंग अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में अपना पक्ष रख रहे हैं। जिससे चीन यह संदेश देने में सफल हो गया है कि उसके लिए भारत कोई ऐसी बड़ी चुनौती नहीं है कि पूरा देश उनके राष्ट्रपति की तरफ देखे। इस फर्क को अगर हम धारणाओं का संघर्ष मानें तो हम यहां हार गए हैं।

वहीं भारत के पास एक पूर्णकालिक रक्षा मंत्री का न होना भी हमारी अगम्भीरता को उजागर करता है। ये साबित करता है कि हमारी प्राथमिकता में देश की सुरक्षा का सवाल कहां खड़ा है। यह स्थिति तब और बदतर हो जाती है जब हमारी सरकार सेना का मनोबल बढ़ाने के नाम पर सैन्य अधिकारियों को बयानबाजी की छूट दे देती है। जबकि सैन्य अधिकारी की प्राथमिकता किसी भी घटनाक्रम को सैन्य नजरिए से देखने की होती है, वो उसके राजनीतिक पहलू पर विचार नहीं कर पाता और यह उसका काम भी नहीं होता है। इसीलिए इस पूरे विवाद में आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत का बयान कि भारत चीन और पाकिस्तान समेत आंतरिक विरोधियों से लड़ने को तैयार है, एक अगम्भीर के साथ-साथ खतरनाक परिणाम देने वाला बयान माना जाना चाहिए और इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिए।

वहीं सरकार में दिखती अराजकता और भ्रम के माहौल का सबसे बुरा असर विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की अफसरशाही पर भी महसूस की जा सकती है। जो कि ऐसे किसी भी संकट के दौरान गैर सरकारी और गुप्त तरीकों से समस्या के समाधान का प्रयास करने की क्षमता रखता है।

दरअसल, मोदी सरकार ने आम जनता और अफसरशाही में जो अपनी छवि बनाई है कि वो परम्परागत नीतियों से अलग कुछ सोच और रणनीति रखती है उससे अफसरशाही यह तय नहीं कर पा रही है कि उसे अपनी तरफ से इस समस्या को निपटाने का कोई परम्परागत चैनलों से प्रयास करना भी चाहिए की नहीं। जबकि उसके पास ऐसी स्थिति में ‘ट्रैक टू’ और ‘कांफिडेंस बिल्डिंग मेजरमेंट’ यानी सीबीएम के जरिए तनाव को कम करने और विरोधी पक्ष से विवाद के मुद्दों पर आम सहमति कायम करने का विकल्प भी होता है और तर्जुबा भी। मसलन, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में भी पाकिस्तान के साथ तनावपूर्ण स्थिति में वाजपेयी के तत्कालीन रॉ प्रमुख और बाद में पीएमओ में रहे एएस दुलत ने इन दोनों रास्तों से संघर्ष और तनाव को काफी कम कर दिया था। इसी तरह उस सरकार में रक्षा मंत्री रहे जार्ज फंर्नाडिस के चीन को लेकर दिए बयान के बाद पैदा हुई स्थितियों को भी अफसरशाही के स्तर पर ही निपटाया गया था। आज अगर इन दोनों मंत्रालयों के अफसरशाही के सामने यह भ्रम की स्थिति नहीं होती तो हमारे पास ‘ट्रैक टू’ और ‘सीबीएम’ के अलाव शंघाई कोऑपरेशर्न आर्गनाईजेशन (एससीवो) के जरिए भी विवाद को सुलझा लेने का रास्ता खुला था जिसमें चीन, कजाकिस्तान, किरगिजस्तान, रूस, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान के साथ ही इसी साल 9 जून को भारत और पाकिस्तान दोनों ही पूर्ण सदस्य बने हैं। इसके अलावा हम ‘ब्रिक्स’ के जरिए भी विवाद सुलझा सकते हैं जहां हमारे अलावा, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रिका सदस्य हैं। आखिर इन फोरमों का गठन ऐसे विवादों को निपटाने के लिए ही तो हुआ है। 

इस स्थिति में हमें बहुत ‘पैनिक’ रिएक्षन देने और पूरे मामले को सतही राष्ट्रवादिता के नजरिए को देखने की कोशिशों को भी रोकना होगा, जिससे आसानी से हल निकल सके।

यह बात दिमाग से निकाल देनी चाहिए कि चीन युद्ध चाहता है क्योंकि चीन अपने को जिस आर्थिक उंचाई पर ले जाने को प्रयासरत है उसमें दुनिया के सबसे तेजी से विकसित होते बाजार वाले देश के साथ वह कभी भी सम्बंध नहीं खराब करना चाहेगा।

चीन के लिए आर्थिकी का सवाल शायद हमसे भी ज्यादा महत्पूर्ण है। इसीलिए मौजूदा तनाव बहुत लम्बा नहीं चलने वाला। हां, इस बहाने उजागर हुईं अपनी कमजोरियों को जरूर हल करने पर हमें जोर देना होगा।

 

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