जिग्नेश मेवानी को राहुल गाँधी से बहुत कुछ सीखने की जरूरत, जिनके सकारात्मक रवैये से आज सरकार परेशान

डॉ आंबेडकर आज दुनिया भर के लोगो के लिए बदलाव और आज़ादी के एक बड़े प्रणेता के रूप में उभरे हैं.... जिग्नेश को भी ब्राहमण बनिया मीडिया से बात करते समय ध्यान रखना पड़ेगा ...

Vidya Bhushan Rawat

21वीं सदी में अम्बेडकरवाद की जीत का उत्सव

विद्या भूषण रावत

जिग्नेश मेवानी के भारी मतों से चुनाव जीतने पर दो तरह की अतिवादी प्रतिक्रियाये सामने आ रही हैं. एक जो उनके ऊपर बहुजन आन्दोलन को कमजोर करने के आरोप लगा रहे हे और दूसरे वो जो उनको सबसे बड़ा क्रन्तिकारी होने का सर्टिफिकेट बाँट रहे हे. हकीकत ये है कि भारत में गंभीर मुद्दों पर छिछोरेपन से बहस करने का प्रचलन बढ़ चुका है. हम अभी भी मसीहाई राजनीति में विश्वास करते हैं और इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि किसी भी जीत पर अपना जश्न मना लेते हैं. हमने लिखा 2019 के लिए मैदान अभी बहुत खाली है और ये बात मैंने उत्तर प्रदेश के चुनावों के नकारात्मक परिणामों के आने के बाद भी लिखी थी. गुजरात से तो मुझे बहुत उम्मीद भी नहीं थी क्योंकि गुजरात का चुनाव तो सवर्णवाद के अंतर्द्वंद्वों का चुनाव था और उसमे दलित पिछड़े तो फिर भी कुछ बात करते रहे लेकिन मुसलमानों को तो अपने प्रतिनिधित्व तक से हाथ धोना पड़ा है, क्योंकि अगर मुसलमानों के मुद्दे गुजरात में उठते तो सेकुलरिज्म खतरे में होता और उसको बचाने की जिम्मेवारी भी तो जनेयुधारी सेकुलर्स की ही होगी न?

जिग्नेश मेवानी ने उना कांड के विरोध में दलितों को खड़ा किया और अपनी राजनीतिक सक्रियता को भी बढाया. केवल दलित आन्दोलन की बदौलत तो वह अपनी सीट से चुनाव नहीं जीत सकते, क्योंकि गुजरात के जातीय समीकरण ऐसे हैं कि बहुजन राजनीति बनाने के लिए बहुत मेहनत करने की आवश्यकता होगी जिसका समय किसी के पास भी नहीं है.

जिग्नेश वैसे भी बहुजन राजनीति की उपज नहीं है. वह सीधे-सीधे उना आंदोलन से सुर्खियों में आये.

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि आज के नौजवानों की तरह उनके अन्दर भी एक बेहतरीन अर्टिकुलेशन है विशेषकर आज की राजनैतिक आर्थिक परिस्थितियो पर और गुजरात के अन्दर अन्य सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर उन्होंने काम भी किया है. गुजरात के अन्दर हालात थोडा भिन्न भी हैं और अकेले जिग्नेश राजनीतिक नेता तो नहीं बन सकते. राजनीति कभी भी एक्सक्लुसिविजम पर नहीं चल सकती, इसलिए आप को अलाएंस बनाकर काम करने की जरूरत पड़ती है. आज के हालत में आपको देखना पड़ेगा कि आप के सबसे अच्छे दोस्त कौन हो सकते हैं और कौन नहीं ?

हर प्रदेश के हालत एक से नहीं होंगे और हर एक नया दलित बहुजन कार्यकर्ता कोई जरूरी नहीं कि बसपा या आर पी आई के विचार से आये. इसका कारण साफ़ है. पिछले तीन वर्षो में देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र असंतोष पनपा है, जिसका मुख्य कारण शिक्षा का निजीकरण, भगवाकरण और दलित आदिवासी और पिछड़ी जातियों के छात्रो की छात्रवृतियो का बंद हो जाना या उनको बंद करने का प्रयास करना है. विश्वविद्यालयो के कैम्पसो में संघी छात्र संगठनो की उद्दंडता और गुंडागर्दी के चलते छात्रो का गुस्सा उफान पर है. पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय, फिर जे एन यू, रामजस की घटना, बी एच यू की छात्राओ पर पुलिस का लाठीचार्ज आदि की घटनाओं ने साबित किया कि छात्र अब झुकेंगे नहीं और विरोध करेंगे.

छात्र आन्दोलनों ने देश में सरकारें बदली हैं चाहे वह जय प्रकाश के 1975 के आन्दोलन की बात हो या 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन मोर्चा का आन्दोलन रहा हो या असम गण परिषद् का आन्दोलन रहा हो या कोई अन्य. 1990 के बाद से देश में बसपा का राजनैतिक उदय देश भर में दलित बहुजन समाज के लिए एक बहुत सकारात्मक सन्देश था.

छात्र आन्दोलन में भी अम्बेडकरवादी युवाओं ने हुंकार भरनी शुरू की और अपने स्पेस की बात की जो गलत नहीं था, लेकिन दुर्भाग्यवश इन छात्र आन्दोलनों या युवा असंतोष को एक राजनैतिक दिशा देने के लिए दलित बहुजन के नाम पर कार्य करने वाली पार्टियों ने कुछ नहीं किया.

इस बात को मैंने कई बार साथियो को बताया कि क्यों नहीं बसपा छात्रो और युवाओ के असंतोष को राजनैतिक दिशा दे.

एक बात तो साफ़ है कि आज का युवा राजनीति में केवल झंडा उठाने के लिए नहीं आएगा और जिंदाबाद मुर्दाबाद की राजनीति से भी ऊपर एक वैचारिक बहस की राजनीति करेगा और शायद उसके लिए हमारी राजनीति अभी तैयार नहीं है, इसीलिये नवयुवाओ को बहुजन राजनीति के शीर्ष नेतृत्व में जगह नहीं मिल रही है जिसके कारण उनके अन्दर गुस्सा है. जिनके पास अम्बेडकरवादी युवा जाना चाहता है वहां का शीर्ष नेतृत्व उनको पहचानने से भी इनकार कर रहा है और दूसरी और ऐसे लोग जो उनका महिमामंडन करके उनको दलित बहुजन आन्दोलन के समकक्ष खड़ा कर देना चाहते हैं.

खतरा बड़ा है और उम्मीद है कि सभी अम्बेडकरवादी साथी इस पर विचार करेंगे.

जिग्नेश मेवानी ने राजनीति को चुना और वो चुनना भी चाहिए लेकिन राजनीति में जो समझौते होते हैं वो आन्दोलनों को कमजोर भी करते हैं. जिग्नेश को गुजरात में राजनीति करनी है इसलिए उनके निर्णय अपने समाज के बेहतरी के लिए होने चाहिएं, लेकिन उन्हें अति-उत्साही होने से बचना पड़ेगा. अब वो जिम्मेवार पद पर हैं.

मैं जानता हूँ कि सेचुलारिस्म के सभी सर्टिफिकेट देने वाले उनके मोदी के मजाक को जोर-जोर से तालियां पीट कर कहेंगे लेकिन उससे न तो उनको लाभ होगा और मैं दावे के साथ कहता हूँ कि मोदी ही मजबूत होंगे.

जिग्नेश को चाहिए कि वो अब अपने काम पर लगें और आन्दोलन को मज़बूत करें। गुजरात के अन्दर दलित बहुजन आन्दोलन को उनकी आवश्यकता है और वो उस पर अपना ध्यान केन्द्रित करें, क्योंकि उनकी छोटी-छोटी बातो को पूंजीवादी मनुवादी मीडिया गलत तरीके से प्रस्तुत करेगा और फिर उनके ही आन्दोलन का नुक्सान होगा. इस सन्दर्भ में उनको राहुल गाँधी से बहुत कुछ सीखने की जरुरत है जिनके सकारात्मक रवैये से आज सरकार परेशान है.

हमारे अम्बेडकरवादी साथी जिग्नेश की कई बातो से शायद नाखुश हैं और इस नाखुशी को उन्होंने जाहिर भी किया है. ये बात हमें ध्यान रखनी होगी कि राजनीति में बहुत से दलित बहुजन आयेंगे और वे शायद अम्बेडकरवादी या फुलेवादी भी न हों. सामाजिक आन्दोलन राजनीति से बड़ा होता है और अगर हमारे यहाँ पर होता तो शायद दलित बहुजन राजनीति को नियंत्रित करता, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है. हमारे यहाँ राजनीति ने सांस्कृतिक आन्दोलन को अपना पिछलग्गू बनाया है जो खतरनाक है. जिग्नेश को उनका काम करने दीजिये और अगर वह कहीं पर गलत हैं तो उनको बताया भी जाए लेकिन उनको शुरुआत में ही इसलिए मत नकार दीजिये कि उन्होंने बीएसपी क्यों नहीं ज्वाइन की. राजनीति में हालात अलग-अलग किस्म के है. हालाँकि जिग्नेश ने कहा कि उनके जीतने में कांग्रेस का नहीं आप, और माले जैसे संगठनो का हाथ भी है, लेकिन ये उनकी बात हो सकती है अपने को कांग्रेस से अलग दिखाने की. जब उनके आम आदमी पार्टी के साथ में आने के चर्चे थे तो मैंने भी उसका विरोध किया था, क्योंकि कुमार विश्वास जैसे लोगो की मानसिकता कोई अचानक से नहीं बनी. आरक्षण का विरोध आप का वैचारिक आधार था. जिग्नेश कांग्रेस के सहयोग के बिना गुजरात में आ भी नहीं सकते थे और शायद जो उन्होंने किया वो राजनैतिक तौर पर सही निर्णय था. अगर उनकी राजनीति जनोन्मुख रही और जुमलेबाजी से हटकर गंभीरता से काम करेंगे तो बहुत आगे तक जायेंगे लेकिन अगर सेक्युलर सर्टिफिकेट देने वालों के चक्कर में आकर रास्ते से भटकेंगे तो वो नेता तो बड़े हो सकते हैं लेकिन समाज के बहुत से चाहने वालो से हट भी जायेंगे. राजनीति में सारे सफल लोग अपने समाज के मान्य नहीं है क्योंकि ये राजनीति पूना पैक्ट की औलाद है जिसमें काम करने वाले चुनाव हारते भी हैं.

बहुजन आन्दोलन को सामाजिक आन्दोलन के तौर पर व्यापक जनाधार की जरूरत है. जब सामाजिक बदलाव के वाहक राजनीतिक दलदल में फंसते हैं तो दलाल ज्यादा नजदीक आते हैं और राजनैतिक मजबूरियां उनसे बहुत कुछ करवाती हैं, जिसके कारण समाज का बहुत नुक्सान हुआ, हालाँकि नेता बहुत बड़े बन जाते है.. ब्राह्मणवादी मीडिया हमेशा एक ब्रांड बनाने की कोशिश करता है ताकि जब भी जरूरत पड़े उस ब्रांड का इस्तेमाल कर सके. आज की राजनीति में चाहे पक्ष हो या विपक्ष ये मीडिया अपने परसेप्शन के अनुसार हीरो बनता है और उन्हें जनता पे थोपता है. हमें इससे सावधान रहना है.

देश में अम्बेडकरवादी आन्दोलन बाबा साहेब के समय से चल रहा है और लोगों ने अपना जीवन उसके लिए कुर्बान किया है, लेकिन इस संघी मीडिया की नज़र उस पर नहीं पड़ती.

अभी भीमा कोरेगांव की घटना से भी जिग्नेश और उनके साथियो को देश भर के दलित आन्दोलन का प्रणेता बनाने की कोशिश भी खतरनाक है. देश भर में अम्बेडकरी आन्दोलन का एक बड़ा इतिहास है और जो इसको नकारता है वो अपने लिए खड्डा ही खोदेगा. किसी आन्दोलन की शक्ति या महानता मात्र इस बात में नहीं है कि कोई संसद या विधानसभा में कैसे आया.

अगर बाबा साहेब आंबेडकर के आन्दोलन को आप संसद में दलित सांसदों की संख्या से जोड़ेंगे तो कभी भी उस आन्दोलन की क्रांतिकारिता को नहीं समझ पाओगे.

अभी कुछ दिनों पूर्व एक सज्जन ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि बहिन मायावती बाबा साहेब आंबेडकर से ज्यादा महान हैं क्योंकि वो उत्तर प्रदेश राज्य की मुख्यमंत्री चार बार बन चुकी हैं और बाबा साहेब आंबेडकर तो अपना चुनाव भी ढंग से नहीं जीत पाए.

बहुत से भूतपूर्व अम्बेडकरवादी अब बाबा साहेब की आलोचना करते हैं. कुछ उनके बुद्ध धम्म को ग्रहण करने को गलत बताते हैं तो कुछ उनको राजनैतिक तौर पर असफल मानते हैं लेकिन ये सोच लीजिये जैसे-जैसे बाबा साहेब आंबेडकर के विषय में दुनिया को जानकारी हो रही है वैसे वैसे लोगो को पता चल रहा है कि अम्बेडकरवाद का मतलब लोकतंत्र, आधुनिकता, महिलाओं का सम्मान, मानवाधिकारों की इज्जत है. डॉ आंबेडकर आज दुनिया भर के लोगो के लिए बदलाव और आज़ादी के एक बड़े प्रणेता के रूप में उभरे हैं. जब दुनिया उनको जान रही है तो हम उनको क्या चुनाव जीतने तक सीमित रखेंगे ?

गाँधी ने तो कोई चुनाव नहीं जीता, पेरियार कभी विधान सभा या लोक सभा में नहीं आये, मान्यवर कांशीराम ने तो अपने को सत्ता से दूर रखा तो क्या उनकी महानता और महत्ता इस बात से कम हो जायेगी कि वह बहुत कम समय तक सांसद थे. संसद में कई लोग तो सालो से जीतते आ रहे हैं और बहुत से कई वर्षो तक मंत्री थे तो क्या उनका महत्व ज्यादा है?

RSS नकारात्मक है लेकिन कई बार दुश्मनों से भी सीखना चाहिए

ये सोचना इसलिए जरूरी है क्योंकि सत्ता मात्र संसद में बैठना नहीं है. आज के दौर में जरूरी है कि अम्बेडकरवादी अपने मीडिया, सिनेमा, साहित्य, बिज़नस, कानून, खेल, गीत संगीत पर भी उतना ही जोर दें. इन सब विधाओं को छोड़कर, हम केवल राजनैतिक सत्ता को ही माईबाप न मानें. राजनीतिक सत्ता लोगों के सामने झुकती है. एक विधायकी उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना उनको नियंत्रण करना. आर एस एस कभी सीधे सत्ता में नहीं आया लेकिन उसने सत्ता को नियंत्रित किया. उसका विचार व्यवहार और आन्दोलन लगातार चलता रहा. वो नकारात्मक है लेकिन कई बार दुश्मनों से भी सीखना चाहिए.

बाल ठाकरे कभी मुख्यमंत्री नहीं बने और शायद उनकी कोई इच्छा भी नहीं थी, लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्रियों का कान पकड़कर काम करवाए होंगे.

पेरियार ने कभी भी राजैतिक पदों की इच्छा व्यक्त नहीं की और डीएमके इसलिए बनी कि अन्नादुराई और उनके साथियो ने कहा कि राजनीति में आये बिना कुछ संभव नहीं. आज भी तमिलनाडु में पेरियार के बिना कोई राजनैतिक दल अपनी राजनीति नहीं कर सकता.

मेरा केवल यही आशय है कि अम्बेडकरवादी विचार और आन्दोलन को इतना मज़बूत भी बनाया जाए कि वो राजनीति को प्रभावित कर सके. इसका मतलब ये नहीं कि हमें राजनैतिक प्रयास नहीं करने चाहिएं, लेकिन हमें ये भी सोचना होगा कि भारत जैसे देश में भाषाई और क्षेत्रीय विविधता के कारण सभी लोगों के विभिन्न समूह या पार्टिया बनेंगीं और आप सभी को एक झंडे के नीचे केवल कार्यक्रमों के आधार पर कर सकते हैं जिसे हम न्यूनतम साझा कार्यक्रम कह सकते हैं. ये मान लीजिये कि दलित बहुजनों में भी भाषा और क्षेत्र के आधार पर कई पार्टियां बनेंगी और उनकी एकता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम सभी में साथ चलने के लिए सिद्धान्तों के प्रति कितनी निष्ठा है. ये इस बात पर भी निर्भर करता है कि एक जगह में यदि दो पार्टियां बन गयीं तो एकता मुश्किल है और फिर ये पार्टियां ब्राह्मंणवादियो की दलाल ही बनेंगीं. ऐसी इस परिस्थितियो के निपटने के लिए एक सांस्कृतिक सामाजिक संगठन की आवश्यकता है जो उन पर वैचारिक और सांस्कृतिक नियंत्रण रख सके. संघ के मॉडल को समझने के जरुरत है.

भीमा कोरेगांव की घटनाओं से सबको सीखने की जरूरत है.

एक बात तो साफ़ है के ब्राह्मणवादी व्यवस्था अभी चरमरा चुकी है क्योंकि युवा अम्बेडकरवादी अब अपने इतिहास को खुद गढ़ेगा और लिखेगा भी. समस्या इस बात की है कि हिन्दुओं और मुसलमानों का भी बड़ा वर्ग स्वतंत्रता आन्दोलन को हिन्दू मुस्लिम विभाजन के नज़रिए से देखता है जिसमें दलितों, पिछड़ों, पस्मांदाओं, आदिवासियों का कोई उल्लेख नहीं है. अब अम्बेडकरवादी युवा इसे चुनौती दे रहा है और ब्राह्मणवादी इतिहासकारों के भ्रष्ट शोध का भी भंडाफोड़ कर रहा है. इसलिए युवाओं की आकाँक्षाओं को नकारकर आप कोई नई चुनौती ब्राह्मणवाद को नहीं दे सकते.

ब्राह्मणवादी व्यवस्था की खासियत ये है कि वो वक़्त के साथ बदली और अपने हितों को ही उसने अपना सबसे बड़ा विचार बनाया जबकि बाकी सभी श्रमशील समुदाय अपने खूंटे से बंधे रहे लिहाज़ा पृथक हो गए.

आज जब हमारा युवा चुनौती दे रहा है तो दलित बहुजन पार्टियों को उन्हें अपने नेतृत्व में जगह देनी पड़ेगी. ऐसा नहीं होने पर गिद्ध की तरह नज़र लगाए लोग इन नए युवाओं को अपनी और खींच लेंगे और फिर आप केवल आरोप लगाते रहेंगे.

जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा एक आन्दोलन से आये और अगर वह लोगों के लिए काम करते हैं तो हमें कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए इसलिए उन्हें मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन अगर उनको दलित आन्दोलन या अम्बेडकरी आन्दोलन का अगुआ बनाकर कुछ लोग देश पर थोपना चाहते हैं तो ये असंभव होगा.

जिग्नेश को भी ब्राहमण बनिया मीडिया से बात करते समय ध्यान रखना पड़ेगा क्योंकि यदि वो कभी भी बाबा साहेब, कांशीराम जी या अम्बेडकरी आन्दोलन को लेकर टिप्पणियां करते रहेंगे तो उसके बहुत से निहितार्थ निकलेंगे.

राजनीति में महत्वाकांक्षी होना कोई बुरी बात नहीं लेकिन कोशिश करें कि बाति को संभल के बोलि. हम उन्हें सफल देखना चाहते हि लेकिन दलित आन्दोलन को लेकर टिपण्णी करने में उन्हें सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि अगर वो बाति को बोलने में नहीं संभले तो बनिया मीडिया उनको विलन बना देगा और अम्बेडकरी आन्दोलन में भी उनके लिए कोई जगह नहीं बचेगी. वो समझ लें कि बाबा साहेब की आलोचना करने से उनको दो चार लोग प्रगतिशील तो कह लेंगे लेकिन बहुजन समाज में जगह नहीं मिलेगी.

आज ब्राह्मणवाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है और अपने को बचाने के लिए सत्ता तंत्र और कूटनीति, छलकपट सभी का सहारा ले रहा है. भीमा कोरेगाव् की पूरी कहानी और उस पर मीडिया और पार्टियों की रिपोर्टिंग उनकी कुटिलता की दास्तान है. कुछ लोगो ने इसे अंग्रेजो की जीत का उत्सव बताया तो कुछ लोग दलितों को देशद्रोही साबित करने पर तुले. ये समझिये कि अगर महार योद्धाओं का ब्रिटिश सेना के साथ युद्ध करना देशद्रोह था तो फिर इंडिया गेट पर जो सैनिकों के नाम लिखे गए हैं वो किस बात के लिए हैं. हमारे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और सेनाओं के अध्यक्ष वहां हर साल अपनी श्रद्धांजलि प्रकट करते है. वो किस लिए ? उनमें कोई भी सैनिक भारत के लिए नहीं अपितु ब्रिटिश सेना के लिए लड़ा और हमारी सेनाओं के मुख्यालयों में उनकी तस्वीरें बहुत शान से लगाईं गयी हैं.

अगर भीमा कोरेगांव गलत है तो फिर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र-दिवस पर इंडिया गेट पर जा कर ब्रिटिश सेना में काम कर रहे भारतीय सैनिकों की याद में श्रद्धांजलि व्यक्त करना बंद कर देना चाहिए.

इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि पेशवाओ के क्रूर ब्राह्मणवादी राज्य की पोल खुलना जरूरी है जहाँ दलितों को मनुवादी व्यस्था के अनुसार रहना पड़ता था. पेशवाओं पर तो इंसानियत के खिलाफ काम करने का मुकदमा लगना चाहिए. कोई भी राज्य जो मनुवादी वर्णव्यवस्था पर आधारित हो वो इंसानियत के उसूलों के खिलाफ है और उसकी कड़ी भर्त्सना होनी चाहिए, लेकिन भारतीय ब्राह्मणवादी मीडिया पेशवाओ के कुकर्मो को छुपाकर अम्बेडकरवादियों को विलन बनाने की जो कोशिश कर रहा है वो निंदनीय है.

आज अम्बेडकरवादी अपने साहित्य और इतिहास का सृजन करेंगे और ब्राह्मणवादी कुटिलताओ का पर्दाफाश करेंगे इसलिए आवश्यक है कि घटनाओं को सही से समझा जाए.

भीमा कोरेगांव की घटना के बाद महाराष्ट्र में अम्बेडकरवादी युवाओं की बेहिसाब गिरफ्तारी हुई है जिसकी कड़ी निंदा की जानी चाहिए. यह शर्मनाक है क्योंकि देवेन्द्र फड़णवीस की सरकार ने कुटिल आक्रमणकारियों को बचाने की कोशिश की है. अम्बेडकरवादियों को परेशान किया जा रहा है और उन पर मुकद्दमे किये जा रहे है. इसका विरोध करना चाहिए और सरकार को चाहिए कि वह इन मुकदमों को वापिस ले. लोगों को मुकदमों और पुलिस का भय दिखाकर आप अम्बेडकरवादी आन्दोलन को डरा नहीं सकते.

हम उम्मीद करते हैं कि महाराष्ट्र सरकार इस घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच बम्बई उच्च न्यायलय के किसी न्यायाधीश से करवाएगी ताकि भीमा कोरेगाव पर हमला करने वालो को सजा मिले. इस घटना से अम्बेडकरवादी आन्दोलन भी मज़बूत होगा और अपने रणनीति को नए सिरे से बनाएगा ताकि मनुवादी कुटिलता को पहचान सके और लोगो को उससे लड़ने के लिए प्रेरित कर सके.

21 वीं सदी अम्बेडकरवाद की सदी है. लाख कुटिलताओं के बावजूद अब लोग अन्याय के विरुद्ध लड़ रहे हैं और निसंदेह जीतेंगे भी.

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