कश्मीर... नेहरु और एडविना

नेहरु को बदनाम करने का सबसे नायाब तरीका है उनके और एडविना माउन्टबेटन के संबंधों को सी ग्रेड फ़िल्म का जामा पहना कर प्रचारित करना, जो बरसों से बखूबी चल रहा है।...

राजीव मित्तल

हमारे देश में कश्मीर को लेकर नेहरु जी को कोसने की ऐसी आदत पड़ गयी है कि मां का दूध छूटते ही कोई नादान भी नेहरु और शेख अब्दुल्ला का एक बाप होने का एलान करना और फिर उस पर कसीदे काढ़ना शुरु कर देता है..

भारतीय संस्कृति की बरसों से जुगाली कर रहा संघ परिवार तो इन दिनों नेहरु, इन्दिरा और फिरोज गांधी को लेकर बाकायदा पोर्नो पर उतर आया है.. और जनता को वो-वो पढ़वाया जा रहा है कि वात्स्यायन तक माथा पीटें।

नेहरु को बदनाम करने का सबसे नायाब तरीका है उनके और एडविना माउन्टबेटन के संबंधों को सी ग्रेड फ़िल्म का जामा पहना कर प्रचारित करना, जो बरसों से बखूबी चल रहा है।

हम विश्वगुरु टाइप के लोग नेह का अर्थ बिल्कुल ही नहीं जानते क्या ? या हमारे समाज में प्रेम के कोमल भावों का नितांत अभाव है!!!

लोक परलोक में फंसा 33 करोड़ देवी देवताओं वाला समाज स्त्री पुरुष के संबंधों को यौन की उत्तेजना से बाहर रख उसे किसी और रूप में परिभाषित नहीं कर सकता क्या ?

यहां ये सब कहने का मन इसलिए हुआ कि जब भी कश्मीर का मसला उठता है नेहरु-एडविना के किस्से मस्तराम के अंदाज़ में सुनने सुनाने का काम भक्ति भाव से शुरू हो जाता है।

क्या इन चटखारों ने कभी ये जानने की कोशिश की कि भारत-पाक बंटवारे के वक्त अगर नेहरु पठानकोट पर न अड़ जाते तो कश्मीर की स्थिति पूर्वी पाकिस्तान जैसी होती... और उस स्थिति में कश्मीर बांग्लादेश तो कतई न बन पाता, बल्कि हमारी किताबों के नक्शे में भी न होता।

बंटवारे के लेनदेन में पठानकोट पाकिस्तान को मिलने वाला ही था लेकिन नेहरु पूरी तरह अड़ गए और इस कदर अड़ गए कि माउन्टबेटन को नेहरु की बात माननी पड़ी।

अब इस किस्से को राष्ट्रवादी मस्तरामों का सा तड़का लगाऊं तो वो कुछ यूं होगा कि उस दिन के बाद माउन्टबेटन यानी इंद्र ने मेनका यानि एडविना पर रात बिरात नेहरु का बिस्तर गरम करने पर रोक लगा दी।

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