वो अवध के आखिरी नवाब थे . भिखारी हो गए, दिल्ली में लावारिस मर गए !

इस मौत से उन सबों को सबक लेना चाहिए जो दौलत, शोहरत, सूरत, सीरत और ताक़त पर गुमान करते हैं. "सचमुच अमीरी की कब्र पर पनपी हुई ग़रीबी बड़ी ज़हरीली होती है !"...

पुष्परंजन

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वो अवध के आखिरी नवाब थे . भिखारी हो गए, दिल्ली में लावारिस मर गए !

इस मौत से उन सबों को सबक लेना चाहिए जो दौलत, शोहरत, सूरत, सीरत और ताक़त पर गुमान करते हैं.

अख़बारों के ज़रिये खबर मिली कि अवध के आखिरी नवाब प्रिंस साइरस कई दशकों तक दिल्ली में मुफलिसी में गुज़ारा करते रहे, आखिरी वक़्त में भीख मांगना शुरू किया. पिछले हफ्ते दिल्ली के मालचा मार्ग के जंगलों में उनकी लावारिश लाश मिली, अंततः उन्हें आईटीओ के पास कब्रगाह में दफना दिया गया.

इंदिरा गांधी ने 1971 में जब प्रिवी पर्स खत्म किया तो कई नवाब साधारण जिंदगी जीने को मजबूर हो गए. अवध के प्रिंस साइरस, उनकी बहन सकीना, उन दोनों की मां जो खुद को विलायत महल कहतीं थीं, नौ वर्षों तक दिल्ली स्टेशन पर अपने कुत्तों के साथ धरने पर बैठे रहे. अंततः इंदिरा गांधी सरकार ने 1980 में तुगलक काल का एक शिकारगाह "मालचा महल" उन्हें रहने के लिए दे दिया. विलायत महल आखिरी दिन तक इस महल से नहीं निकली.1993 में विलायत महल ने हीरे कुचल कर खा लिए, और आत्महत्या कर ली. प्रिंसेज सकीना भी अब इस दुनिया में नहीं हैं.

शिवपूजन सहाय ने "कहानी का प्लाट " में सही कहा था, "सचमुच अमीरी की कब्र पर पनपी हुई ग़रीबी बड़ी ज़हरीली होती है !"

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