एस.सी-एस.टी एक्ट का तीसरा पक्ष, जिसे जानना बहुत जरूरी

दलितों का विकास पहली प्राथमिकता अवश्य होनी चाहिए लेकिन यदि उस विकास की मानसिकता में प्रतिशोध के तत्व घोले जा रहे हैं तो यह भविष्य के लिए ख़तरनाक है...

अतिथि लेखक
एस.सी-एस.टी एक्ट का तीसरा पक्ष, जिसे जानना बहुत जरूरी

संजीव ‘मजदूर’ झा.

बुद्धिजीवियों और राजनेताओं में आचरण का बहुत बड़ा फ़र्क होता है. इस फ़र्क को समझे बगैर यदि कोई बुद्धिजीवी सामाजिक आचरण का प्रयास करता है तो वह प्रयास एक पक्षीय होकर रह जाता है. दर्शन हमें यह भी बताता है कि सभी का कोई न कोई पक्ष होता है लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि समाज का दर्शन परिवर्तनगामी होता है. इसलिए समाज को परिवर्तनशील बौद्धिकों की आवश्यकता होती है जो समय और परिस्थितियों का सही मूल्यांकन कर समस्याओं को सही रूप में चिन्हित करने का कार्य कर सके. अफ़सोस रफ़्तारवादी प्रवृतियों ने इस पूरी प्रक्रिया का सर्वनाश कर दिया है.

एस.सी, एस.टी. एक्ट का संशोधन और उसे पुनः लागू करने जैसे गंभीर विषय पर सत्ता की अपनी रफ़्तार थी तो दलित और ब्राह्मणवादी संगठनों की भी अपनी रफ़्तार थी. इसी क्रम में बुद्धिजीवियों की अतिवादी रफ़्तार भी अपनी जगह कायम रही, जो चिंता का विषय है.

बुद्धिजीवियों के आचरण का भी अपना इतिहास होता है और यह इतिहास भी कम गंभीर नहीं होता है. दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि जो तबका समाज को इतिहास जानने-समझने पर इतना ज़ोर देता है, वह ख़ुद अपने इतिहास से कैसे अछूता रह जाता है? शायद इन्हीं स्थितियों में इतिहास ख़ुद को दुहराता है और तब इसका परिणाम क्या होता है यह हम सभी भली-भांति जानते हैं.

बीते दशकों में सांप्रदायिकता जैसी गंभीर समस्या पर लगभग बुद्धिजीवियों द्वारा उनके ‘सेकुलर’ छवि के बचाव के अतिआग्रह ने धर्म आधारित राजनैतिक पार्टियों को किस रूप में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ पहुँचाया, उसे शायद हम भूल बैठे हैं. इस भूल का परिणाम क्या निकला शायद हम यह भी भूल गए हैं. परिणाम यह निकला कि समाजवादियों को चिल्ला कर कहना पड़ रहा है कि ‘हम भी हिंदू हैं’ और मुस्लिम तुष्टिकरण वाले जगह जगह ‘जनेऊ’ बदलते फिर रहे हैं. ऐसा आखिर क्यों हुआ?

कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति और उस समय के बुद्धिजीवियों के ‘सेकुलरिज्म’ का तिलस्म लगभग एक जैसा था. साहित्य में भी यह इतना गहरा था कि राजेन्द्र यादव ने जैसे ही हिन्दू धर्म से हटकर धार्मिक आलोचना शुरू की नहीं थी कि पंकज बिष्ट ने उनके ऊपर सांप्रदायिक होने का इल्जाम मढ़ दिया. यहाँ राजनेता और बौद्धिक लगभग एक जैसा ही आचरण कर रहे थे. परिणाम यह निकला कि जो मतदाता कांग्रेस को, राजद को, समाजवादियों को सत्ता पर प्रतिष्ठित कर रही थी, जो वामपंथियों को इस लायक बना देती थी कि उसके सपोर्ट से केंद्र में सरकारें बनती और बिगड़ती, वही मतदाता मोबलाईज़ होकर धर्म आधारित राजनीति करने वालों के साथ हो गई. यदि यह एक ख़तरनाक स्थिति थी जैसा कि बुद्धिजीवियों ने बार-बार कहा तो सवाल उठता है कि ऐसी स्थितियां तैयार होने में किन लोगों की भूमिका थी?

कमोबेश नहीं बल्कि उससे भी अधिक ख़तरनाक स्थिति में आज के बुद्धिजीवी हैं. एस.सी., एस.टी. एक्ट पर समाज में दो पक्ष बना हुआ है. अगड़ी जाति बनाम पिछड़ी जाति. सभी अपने -अपने स्वभाव और प्रवृति के अनुकूल अपना-अपना पक्ष चुन रहे हैं. लेकिन इसका एक तीसरा पक्ष भी है और वह पक्ष है सत्ता-पक्ष का. इसी तीसरे पक्ष से ध्यान हटाने के लिए यह सारी व्यवस्थाएं तय की जाती हैं. जिसे हम दो पक्ष के रूप में देखते-सुनते हैं, सत्ता के लिए अंततः वह एक ही पक्ष होता है. घासलेटी बुद्धिजीवी अक्सर इस बात को समझे बगैर ही दिन भर पानी पीटते नज़र आते हैं. जैसे ही यह मुद्दा छिड़ता है कि स्वाभाविक रूप से समाज के लिए अन्य जरूरी सभी मसलें गौण हो जाते हैं फिर चाहे वह बेरोजगारी का हो, भ्रष्टाचार का हो या मंहगाई का हो. और इससे भी बड़ा फ़ायदा सत्ता पक्ष को यह मिलता है कि उसकी राजनैतिक-सामाजिक प्रतिबद्धता से सबका ध्यान हट जाता है. यहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का मसला लगभग एक जैसा ही है.

ध्यान-पूर्वक देखें तो हम पाते हैं कि एस.सी./एस.टी. एक्ट पर सदन में सर्वसम्मति से सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटने पर सहमति है. अब यह कैसा विरोधाभास है? क्या यह संभव है कि एक तरफ़ सदन के सभी सदस्य दलित-उत्पीड़न को स्वीकार करते हुए उसके ख़िलाफ भी हों और दूसरी ओर दिन-ब-दिन दलित शोषण बढ़ता भी रहे? इसका सीधा अर्थ है सदन के हाथियों के दिखाने के दांत अलग हैं और खाने के दांत अलग हैं.

एस.सी./ एस.टी. एक्ट के संदर्भ में जिन दो पक्षों का जिक्र ऊपर किया गया है उस पर भी हमें विचार करने की आवश्यकता है. जो विद्वान् एस.सी./ एस.टी. एक्ट के बिना संशोधित नियम को लागू करने के पक्ष में हैं उनके मुख्य तर्क या प्रश्न इस प्रकार से हैं –

“क्या कभी किसी दलित ने किसी ब्राह्मण को मारा?”

“क्या कभी किसी ब्राहमण संगठनों ने दलितों के मारे जाने का विरोध किया?”

“दुरूपयोग तो सभी कानून का होता है तो क्या सभी कानून हटा दिए जाए?”

“अगर कोई निर्दोष है तो वह न्यायालय से न्याय पाएगा.”

इन प्रश्नों में किसी भी प्रकार से न तो प्रगतिशील विचार की अवधारणा समझ में आती है और ना ही समाधान के तत्व. दूसरा प्रश्न अवश्य महत्वपूर्ण है लेकिन इस आधार पर बुद्धिजीवियों के पास संवाद स्थापित करने की कोई रणनीति नहीं है.

अगर हम जातिगत संगठनों पर विचार करें तो सभी सवर्ण जातियों की सभी उपजातियों के ‘कुल’ और ‘गौत्र’ से संबंधित भी संगठन हैं. अब अगर हम सभी जातियों से संबंधित संगठनों की सूची देखें और इसके चलाने वालों की मानसिकता का अध्ययन करें तो आश्चर्य होता है कि अभी तक देश में महायुद्ध या महाभारत कैसे नहीं छिड़ा? यह सवाल महत्वपूर्ण है कम से कम समाजशास्त्रीय दृष्टि से.

सभी जातियों और धर्मों में दो तरह के लोग होते हैं, एक सांगठनिक व्यक्ति तो दूसरा गैर-सांगठनिक. जो सांगठनिक हैं, सांप्रदायिक होने की संभावना उनमें अधिक है और जो गैर- सांगठनिक हैं उनके यहाँ सांप्रदायिक होने की संभावना कम है. अर्थव्यवस्था की भाषा में यह ‘अन-ऑर्गेनाइजड’ सेक्टर है. और जिस तरह हमारे बुद्धिजीवियों को इस सेक्टर के बारे में बहुत देर से पता चला कि यही वह सेक्टर है जिसकी भूमिका देश की अर्थव्यवस्था में और रोजगार के क्षेत्र में सबसे अधिक है, ठीक उसी तरह समाज में भी यही वह सेक्टर है जिसके कारण जातिवाद के रोज-रोज विष-व्यापार के बावजूद कोई महायुद्ध नहीं हो पाता है. इस सेक्टर में सभी जातियों के लोग हैं. ऊँची जातियों समेत समाज के एक बड़े हिस्से में स्थितियां वैसी भी नहीं है जैसा कि रोज आए दिन देखने को मिलता है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो सवर्ण संगठनों द्वारा ‘भारत-बंद’ के एलान के फ़ेल होने से ही साबित हो जाता है.  

बुद्धिजीवियों के केंद्र में ऐसे लोग होने चाहिए वरना एक सामाजिक-संवेदना की भी नोटबंदी होगी और सबकुछ ध्वस्त हो जायेगा.

दूसरी दिक्कत है, एक नियम का सभी क्षेत्रों पर लागू किया जाना. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जहाँ दलितों पर उस रूप में अत्याचार के अवसर नहीं हैं या जहाँ वे शिक्षित हैं या अच्छे पद पर हैं, वहां इन अधिकारों का गलत प्रयोग भी किया जाता है. ऐसी जगहों पर या संस्थानों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा संशोधित नियम ही अधिक कारगर हैं. स्वभाविक है कि बस्तर, झारखण्ड या उड़ीसा के आदिवासी इलाक़ों में जो स्थितियां हैं, वही स्थितियां विश्वविद्यालयों में नहीं हैं. ऐसे में जरुरी है कि अति-संवेदनशील जगहों पर और कठोर नियम लगाए जाएँ, लेकिन जहाँ स्थितियां सुधार की ओर हैं वहां मानसिक रूप से तनाव की स्थिति से बचाव की भी ज़रूरत है. ऐसी संस्थाओं में हम यदि लोकतांत्रिक परिभाषा के आधार पर इस नियम का आंकलन करें तो क्या कहने की जरुरत है कि मामला दर्ज होने से पहले गिरफ़्तारी एक फ़ासीवादी नियम नहीं है?

कई स्तर पर एक्ट के लागू होने के प्रभावों पर बहस और संवाद की स्थिति के बाद लिया जाने वाला फ़ैसला, जब अचानक से ले लिया जाता है तो संगठनों को यह समझने और समझाने में आसानी होती है कि यह उनके ऊपर थोपा गया है और इसी से तनाव की स्थितियां पैदा की जाती है.

‘एक्ट’ के दुरूपयोग के संदर्भ में यह भी कहा जाता है कि –“दुरूपयोग तो सभी कानून का हो रहा है तो क्या सभी कानून हटा दिए जाएँ?”

यह अतार्किक मसला ही नहीं बल्कि कानून पर एक अटूट विश्वास और अंतिम समाधान की मान्यता को भी दर्शाता है. कहने को तो यह भी कहा जा सकता है कि कानून तो लगभग सभी अपराधों के लिए बनाये गए हैं. फिर क्या कारण है कि आज तक किसी एक किस्म के अपराध का भी खात्मा नहीं हो पाया है. सभी तरह के कानून के अप्रासंगिक होने का बचाव सिर्फ़ इस आधार पर भी नहीं किया जा सकता है कि ‘कानून तो है लेकिन ठीक से अप्लाई नहीं किया जाता है’. ‘खाप पंचायत’ और उसके द्वारा निर्मित अपराधियों, जिन्हें कानून ने सजा दी उनके बयान स्पष्ट कर देते हैं कि अपराध एक मानसिकता है जिसे एक लंबी प्रक्रिया के तहत तैयार किया जाता है.

हमें यह समझना होगा कि आपराधिक मानसिकता के बगैर सामाजिक प्रयासों को बदला नहीं जा सकता है. इन्हीं सामाजिक प्रयासों में एक बहुत महत्वपूर्ण बिंदु है शिक्षा का. लेकिन इस महत्वपूर्ण बिंदु पर सत्ता पक्ष की रणनीति पर क्यों विचार नहीं किया जाता है? यदि सत्ता पक्ष इस मसले को ख़त्म करने में रत्ती भर भी दिलचस्पी लेती तो हर बजट में शिक्षा का बजट सिकुड़ता हुआ नज़र नहीं आता. कमोबेश यही स्थिति आरक्षण को लेकर है. एक पक्ष आरक्षण को खत्म करने तथा आर्थिक आधार पर लागू करने पर ज़ोर दे रहा है तो दूसरा पक्ष जातीय आधार पर लागू आरक्षण को बरकरार रखने पर ज़ोर दिए हुए है. यहाँ भी तीसरा जो सबसे ख़तरनाक पक्ष है उस पर न तो ठीक से ध्यान दिया जा रहा है और ना ही उस पर संवाद करने की रणनीति है. आरक्षण की हकीकत तो यह है कि किसी भी एक जाति के लिए भी सरकार के पास नौकरियां नहीं है. इसलिए ऊँची जातियों को यह समझाया जाता है कि नौकरियां इसलिए नहीं मिल रही है क्योंकि आरक्षण लागू है और दलितों को यह समझाया जाता है कि आरक्षण के बावजूद आपके हिस्से की नौकरियां ऊँची जाति के लोग लिए जा रहे हैं. इस लड़ाई में सत्ता के पास नौकरी पैदा करने की जो असफ़लता है उस पर ध्यान ही नहीं जाता.

दिक्कत दोनों तरफ गहरी है. दलितों का विकास पहली प्राथमिकता अवश्य होनी चाहिए लेकिन यदि उस विकास की मानसिकता में प्रतिशोध के तत्व घोले जा रहे हैं तो यह भविष्य के लिए ख़तरनाक है. गौर से देखा जाए तो पिछड़े समाज में भी डॉमिनेटिंग जाति जैसे यादव (यादवों में भी डॉमिनेट करने वाले) इसका भरपूर फ़ायदा ही नहीं उठा रहे बल्कि इस उभार का पूरा सेटअप ही चेंज कर रहे हैं. जबकि देखा जाए तो दलितों पर अत्याचार के मामलों में ओबीसी जातियों की भूमिका किसी भी कोण से पीछे नहीं हैं. कहीं-कहीं तो यह इतना काम का साबित हो जाता है कि ‘क्लास’ को भी ‘कास्ट’ में शिफ्ट करना इनके लिए फायदेमंद हो जाता है. इसीलिए कभी दबंग सांसद पप्पू यादव पिछड़ी जाति के हो जाते हैं तो कभी पूंजीपति लाला रामदेव भी पिछड़ी जाति के हो जाते हैं.

 शोषण के चरित्र को हमें ठीक से समझने की आवश्यकता है. यह भी समझने की आवश्यकता होनी चाहिए कि किसी भी तरह के शोषण में दलित, आदिवासी, महिलाएं और बच्चे किन कारणों से अधिक शोषित होते हैं. यह भी ध्यान रहे कि आज दलितों को शोषण से मुक्त करने या उपाय ढूंढने में न तो सत्ता की दिलचस्पी है और न ही मीडिया की. इसलिए कानून लागू करने की मानसिकता को भी ठीक से समझने की आवश्यकता है. सुप्रीम कोर्ट हो या लोकतंत्र का कोई भी खंभा समाज को यह विवेक हो कि वह अपने हित में सभी की समीक्षा कर सके. और यह सब तभी संभव है जब हम महिमामंडन और प्रशस्तिगान की परंपरा से आगे बढ़ें. उदहारण के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा धारा 377 को हटाए जाने को भी लिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस तरह के संबंधों को मान्यता देना एक बात है, समाज में इसके लागू होने न होने की मानसिकता दूसरी बात है और सुप्रीम कोर्ट को यह समझने में 2018 तक का समय लेना एक अलग बात है.

दलित उत्पीड़न एक सामाजिक रोग है और यह तब तक खत्म नहीं हो सकता जब तक कि समाज अपनी आतंरिक बिमारियों से निजात नहीं पा लेता है. इसलिए जरुरी है कि देश भर के बुद्धिजीवी उस वर्ग और जाति के लोगों को चर्चा के केंद्र में लाए जिसके लिए मानवीय मूल्य आज भी सर्वोपरि हैं.

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