मंगलराम के साथ अमंगल : बदलाव का रास्ता कोई सरल-सपाट नहीं हुआ करता

दलितों को इसे समझना होगा. यह भी कि हिंदूवाद की परिधि में वे सबसे निचले पायदान पर रहे हैं, आज भी हैं और कल भी रहेंगे. यहां बराबरी जैसे मूल्यों की जगह ही नहीं. ऊंच-नीच ही उसकी धुरी जो है....

सृजनयोगी आदियोग

मंगलराम उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के गोसलपुर गांव (थाना करीमुद्दीनपुर) में रहते हैं. दलित हैं. कोई पच्चीस के हैं. पढ़े-लिखे हैं. अंबेडकर और पेरियार जैसे दलित चिंतकों से ख़ासे प्रभावित हैं. समाज को बदलते देखना चाहते हैं. इसके लिए अपने इलाक़े के दलितों को जोड़ने-जगाने का काम करते हैं. खूब समझते हैं कि बदलाव की कोई लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती. व्यापक बदलाव के लिए सभी उत्पीड़ित समुदायों को साथ आना ही होगा. इसी कड़ी में गौर तलब है कि मंगलराम रिहाई मंच की गाजीपुर जिला इकाई के संगठन सचिव हैं. जो नहीं जानते उनके लिए यह जानकारी कि रिहाई मंच राज्य दमन के निडर प्रतिरोध का जाना-पहचाना बैनर है.

ज़माना बहुत बदल गया. मंगलराम जैसों दलितों का शिक्षा से और बाहरी दुनिया की हलचलों से नाता जुड़ा. उनमें बराबरी की कसक का बीज उगा. ज़ाहिर है कि यह बयार सदियों से उन्हें दबा कर रखनेवाले सवर्ण भला कैसे पचा सकते हैं? आख़िर बदलाव का रास्ता कोई सरल-सपाट नहीं हुआ करता बल्कि कहें कि यह जोख़िम से गुज़रना होता है.

मंगलराम का सहपाठी ठाकुर रहा है. दोनों के बीच कोई दोस्ती तो नहीं रही लेकिन कोई बैर भी नहीं रहा. यह अलग बात है कि ठाकुर साहब में थोड़ी बहुत ठकुरसोहाती तो बचपन से ही थी. घर के संस्कार की रंगत बेहद गाढ़ी होती है, आसानी से पीछा नहीं छोड़ती. तो ठाकुर साहब बड़े हो गये, अपने बड़ों की नक़ल करते ‘ठाकुर साहब’ हो गये. लेकिन समय तो करवट बदल रहा है. चमरही में उनके ठाकुरपन की धाक कमज़ोर होने लगी है, उसे खुली चुनौती मिलने लगी है. पैर ज़मीन पर ना हों और दिमाग सातवें आसमान पर हो तो हवा के रूख़ बदलते जाने से उपजी खुंदक फूटती रहती है. 

तो ठाकुर साहब जब भी मिलते मंगलराम को छेड़ते लेकिन मंगलराम उसे दोस्ताना बर्ताव मान कर सहन कर लेते. यह सिलसिला चलता रहा लेकिन 15 जून को इसकी हद हो गयी. मंगलराम के किसी परिजन का निधन हो गया. शव यात्रा में ठाकुर साहब भी शामिल हो लिये. इस मौक़े पर भी वह अपने फूहड़ हंसी-मज़ाक से बाज नहीं आये. मंगलराम ने मना किया तो गालियां बकने लगे और वह भी जातिसूचक अपमानजनक संबोधन के साथ. मंगलराम ने ऐतराज़ किया तो मामला हाथापाई पर पहुंच गया. लोगों ने बीच-बचाव किया, ठाकुर साहब किसी तरह माने, शव यात्रा बीच में छोड़ कर वापस लौट गये और मामला शांत हो गया.

लेकिन यह फ़ौरी शाति थी. शव यात्रा समाप्त हुई. चिता को अभी अग्नि दी ही गयी थी कि ठाकुर साहब लाठी, सरिया और असलहों से लैस अपनी जाति के एक दर्जन से अधिक लोगों के साथ आ धमके. इन हमलावरों ने मंगलराम को पीटना शुरू कर दिया. मंगलराम को बचाने आये छह लोगों पर जानलेवा हमला हुआ. इनमें तीन की हालत गंभीर है.

कल को उनकी हालत ठीक भी हो जायेगी, लेकिन दलितों पर बढ़ते हमलों की यह ताज़ा घटना बता रही है कि क़ानून व्यवस्था की सेहत क़तई अच्छी नहीं है और उसके सुधरने की कोई सूरत भी दूर-दूर तक नज़र नहीं आती. इसलिए कि उसकी कमान संभालनेवालों की नीयत ही ठीक नहीं है. उनकी मंशा ही नहीं कि अमन-चैन कायम हो, कि विभिन्न धर्मों और जातियों के बीच की दूरी घटे. शासकों का बुनियादी सवालों से मुंह चुराने का यह पुराना मंत्र रहा है.

दलितों को इसे समझना होगा. यह भी कि हिंदूवाद की परिधि में वे सबसे निचले पायदान पर रहे हैं, आज भी हैं और कल भी रहेंगे. यहां बराबरी जैसे मूल्यों की जगह ही नहीं. ऊंच-नीच ही उसकी धुरी जो है.

दलितों को शोषण और उत्पीड़न के इस मकड़जाल से बाहर आना होगा. इसी में उनका कल्याण है और देश का भी.

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