प्रधानसेवक के वादे जो वफ़ा न हो सके

क्या मोदी उत्सव मनाने वाली सरकार जनता को इस अवसर पर यह भी बताने का कष्ट करेगी कि आख़िर स्मार्ट सिटी की योजना पर अब तक कितना काम किया जा चुका है? यह काम शुरु हुआ भी है या नहीं?...

तनवीर जाफ़री

गत् 26 मई को भारतीय जनता पार्टी के शासन वाली नरेंद्र मोदी सरकार के तीन वर्ष पूरे हो गए हैं। सरकार द्वारा अपने इन तीन वर्षों के कामकाज की उपलब्धियों का बखान करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर 'मोदी उत्सव' नामक एक प्रचार अभियान भारत के 900 शहरों में चलाया गया। इस महाप्रचार अभियान के अंतर्गत् प्रधानमंत्री की ओर से जनता को दो करोड़ पत्र लिखे जाने व दस करोड़ एसएमएस भेजे जाने का प्रस्ताव था जिनमें उनकी सरकार के काम-काज की उपलब्धियों का जि़क्र किया गया था।

इस मोदी 'महोत्सव' के आयोजन में जहां प्रधानमंत्री सहित समूची केंद्र सरकार व उसके मंत्री सक्रिय रहे वहीं भाजपा शासित राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों, उपमुख्यममंत्रियों तथा वरिष्ठ मंत्रियों ने इस पूरे प्रचार अभियान की कमान संभाली।

यह भी पढ़ें - जब देश तरह-तरह की आग में झुलस रहा हो क्या तब जश्न की बांसुरी बजाना उचित है?

इसी प्रकार देश के पांच सौ शहरों में 'सबका साथ सबका विकास' नामक यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस पूरे महोत्सव को - 'देश बदल रहा है- भारत उभर रहा है'  के नए नारे के साथ मनाया गया। इस अवसर पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च कर 26 मई को देश के लगभग चार सौ दैनिक समाचार पत्रों में प्रथम पृष्ठ पर संपूर्ण पृष्ठ के विज्ञापन भारत सरकार द्वारा जारी किए गए वहीं कई भाजपा शासित राज्यों ने भी 26 मई को ही अपनी ओर से भी संपूर्ण पृष्ठ के विज्ञापन देकर तीन वर्षीय सत्ता सिंहासन की उपलब्धि के गुणगान में अपनी शिरकत दर्ज कराई।

यह भी पढ़ें - मोदी अच्छे भाषणकर्ता तो हैं, लेकिन आम जनता के साथ उनका संवाद लगभग नहीं है

गौरतलब है कि 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के कुछ ही समय बाद दिल्ली तथा बिहार के विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। और भाजपाई अपने राजनैतिक भविष्य को लेकर चिंतित दिखाई देने लगे थे। परंतु पिछले दिनों उत्तर प्रदेश विधानसभा के अप्रत्याशित चुनाव नतीजों ने तो भाजपा के नेताओं की सोच तथा इनकी कार्यशैली को ही बदल कर रख दिया है।

यह भी पढ़ें - मोदी सरकार के तीन साल : प्रजातंत्र सिकुड़ रहा, मीडिया नहीं रहा प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ

जो पार्टी यूपी विधानसभा चुनाव में नोटबंदी जैसे विवादित व जनता पर अपना नकारात्मक प्रभाव छोड़ने वाले विषय का जि़क्र सार्वजनिक रूप से करते हुए घबरा रही थी वही पार्टी उत्तर प्रदेश में अपनी विजय पताका लहराने के बाद जनता के निर्णय को नोटबंदी के पक्ष में दिया गया मतदाताओं का निर्णय बता रही है। पूरे उत्तर प्रदेश में एक भी मुस्लिम व्यक्ति को अपना उम्मीददवार न बनाने वाली भाजपा अब बहुसंख्य मतदाताओं के पक्ष की राजनीति को ही भारत की राजनीति का वास्तविक चेहरा बता रही है।

यह भी पढ़ें - मोदी सरकार के तीन साल का एक ही संदेश- अब मुखौटे उतर रहे हैं

एक ओर तो उत्तर प्रदेश के सत्ताधारी नेता प्रदेश में चुनाव पूर्व जारी किए गए अपने घोषणा पत्र जिसे पार्टी ने लोक कल्याण संकल्प पत्र का नाम दिया था उसकी तुलना गीता तथा दूसरे पवित्र धर्म शास्त्रों से करते हुए उस संकल्प पत्र को पूरा करने का आश्वासन दे रहे हैं। बूचडख़ाने तथा रोमियो स्कवॉयड व किसानों की कजऱ् माफी जैसे विषयों पर अमल भी किया जा चुका है। परंतु दूसरी ओर दिल्ली की मोदी सरकार 2014 के अपने चुनाव घोषणा पत्र से अलग हटकर अपने चुनावी वादों की अनदेखी करते हुए दूसरे अघोषित एजेंडे पर काम कर रही है।

यह भी पढ़ें - अच्छे दिन : जनसंख्या सफाये के लिए इससे बेहतर राजकाज और राजधर्म नहीं हो सकता

सवाल यह है कि ऐसे समय में जबकि पार्टी अपने शासन के तीन वर्ष पूरे होने का विशाल उत्सव सरकारी खर्च से वृहद् स्तर पर आयोजित कर रही है तो क्या उसे जनता को यह बताना नहीं चाहिए कि 2014 से पहले नरेंद्र मोदी व उनकी पार्टी के नेताओं द्वारा दिखाए गए सपने आख़िर कहां चले गए? मोदी ने तालियां ठोक-ठोक कर वादा किया था कि उनके सत्ता में आते ही केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की सहायता से राजनीति से अपराधियों का सफ़ाया कर देगी। चाहे वह भाजपा के ही अपराधी नेता क्यों न हों।

यह भी पढ़ें - शिक्षा क्षेत्र पर फासीवादी हमले के तीन साल : सरकार का छात्रों के खिलाफ मोर्चा

मोदी जी के इस वादे का आख़िर क्या हश्र हुआ। क्या उत्तर प्रदेश के मंत्रिमंडल का चेहरा उनके इन वादों के ठीक विपरीत  दिखाई नहीं देता? सरकार में आते ही प्रधानमंत्री ने देश में सौ स्मार्ट सिटी बनाए जाने की घोषणा की थी। इनमें पहले बीस स्मार्ट सिटी प्रथम वर्ष अर्थात् 2014-15 में ही तैयार हो जाने थे। सरकार द्वारा इन स्मार्ट सिटी पर ख़र्च करने के लिए 50,802 करोड़ रुपये का बजट भी घोषित किया गया था।

यह भी पढ़ें - अभिव्यक्ति की भ्रूणहत्या के तीन साल : मैं सच कहूंगी और फिर भी हार जाऊँगी / वो झूठ बोलेगा और लाजबाब कर देगा

भुवनेश्वर, पूना, जयपुर, सूरत, कोच्चि, अहमदाबाद, जबलपुर, विशाखापटनम, शोलापुर, दवांगिरी, इंदौर, नई दिल्ली, कोयंबटूर, काकीनाड़ा, बेलागावी, उदयपुर, गोहवाटी, चेन्नई, लुधियाना तथा भोपाल जैसे शहरों का चयन स्मार्ट सिटी बनने वाली पहली सूची में किया गया था।

क्या मोदी उत्सव मनाने वाली सरकार जनता को इस अवसर पर यह भी बताने का कष्ट करेगी कि आख़िर स्मार्ट सिटी की योजना पर अब तक कितना काम किया जा चुका है? यह काम शुरु हुआ भी है या नहीं? और भविष्य में भी इस काम के शुरु होने की कोई योजना है भी अथवा नहीं?

यह भी पढ़ें - भय, भूख और भ्रष्टाचार से जूझ रही दुनिया से साइबर फिरौती और अच्छे दिन के तीन साल

यहां प्रधानमंत्री के उस वादे को याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि आम लोगों के खातों में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये क्यों नहीं आए। क्योंकि इस तरह की बातों को तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह पहले ही 'जुमलेबाज़ी' बता चुके हैं। परंतु कम से कम जनता को यह पूछने का हक़ तो ज़रूर है कि सौ दिन में जिस काले धन को विदेशों से भारत वापस लाने का वादा किया था वह काला धन तीन वर्ष पूरे हो जाने के बावजूद अब तक वापस क्यों नहीं आया?

यह भी पढ़ें - अच्छे दिन के 3साल : मोदी सरकार पर नज़र रखने अब तक असफल रही कांग्रेस

प्रधानमंत्री ने लाल क़िले से अपने पहले संबोधन में देश की जनता से सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने की एक सार्थक व सकारात्मक अपील की थी। संभव है उनके विरोधी दलों के नेताओं ने अथवा उनकी छवि को धूमिल करने की कोशिशों में लगे हुए लोगों ने उनकी बात न मानी हो। परंतु क्या प्रधानमंत्री जी यह बता सकते हैं कि उनकी इस अपील पर स्वयं उन्हीं की पार्टी के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों तथा दूसरे छोटे-बड़े नेताओं द्वारा कितना अमल किया गया?

आज पूरे देश में सांप्रदायिकता व जातिवाद का काला धुंआ उठता दिखाई दे रहा है। जहां देखिए भीड़तंत्र का राज नज़र आ रहा है। पुलिस अधीक्षक, डीएसपी व थानेदारों से लेकर बैंक कर्मचारियों व दूसरे सरकारी विभाग के लोगों को डराया-धमकाया जा रहा है। पाकिस्तान की ओर से न केवल लगातार दु:स्साहसिक कारवाईयां जारी हैं बल्कि भाजपा शासित ज मू-कश्मीर राज्य में भी अशांति व अस्थिरता का जो वातावरण दिखाई दे रहा है वह गत् दो दशकों में नहीं देखा गया। प्रधानमंत्री द्वारा रिकॉर्ड विदेश यात्राएं किए जाने के बावजूद विदेशी पूंजी निवेश में कोई इज़ाफ़ा तो नहीं हुआ हां भारत के चारों ओर के सीमावर्ती देशों से रिश्ते ज़रूर तनावपूर्ण होते दिखाई दे रहे हैं।

यह भी पढ़ें - जुमलों के दम पर मोदी सरकार के तीन साल पूरे, झूठे बना रहे हैं खुशी: पैंथर्स

बुलेट ट्रेन चलाने की योजना पर गत् तीन वर्षों में कितना काम हुआ है जनता को इसका कोई ज्ञान नहीं। हर वर्ष दो करोड़ नौकरियां देने का वादा करने वाली सरकार ने नोटबंदी के दौरान लाखों लोगों को बेरोज़गार बना दिया। नोटबंदी से न तो भ्रष्टाचार रुका न काले धन का संग्रह करना नियंत्रित हुआ न ही आतंकवाद पर काबू पाया जा सका न ही लेसकैश या कैशलेस जैसी लफाज़ी बातें कार्यान्वित हो सकीं। परंतु इस योजना से उद्योग-धंधे तथा छोटे व मध्यम व्यवसाय पूरी तरह प्रभावित हुए। पेट्रोल व डीज़ल की कीमतें अपने चरम पर हैं। डॉलर की तुलना में भारतीय मुद्रा की क़ीमत निरंतर घटती जा रही है। परंतु इन सब वास्तविकताओं को नज़र अंदाज़ करते हुए भाजपा अपने शासन के तीन वर्षों का जश्र आख़िर किस मुंह से मना रही है?

यह भी पढ़ें - अच्छे दिनों के तीन साल का जश्न : सच छुपाने के लिए शोर

निश्चित रूप से प्रधानमंत्री सहित पार्टी के सभी जि़म्मेदार नेताओं को जहां अपनी उपलब्धियां गिनाने से फुर्सत नहीं मिल रही वहीं उन्हें उन वादों का जि़क्र भी करना चाहिए जो प्रधानसेवक व उनकी पार्टी अब तक वफ़ा नहीं कर सकी।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।
क्या मौजूदा किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है ?