जनतंत्र, नागरिक समाज और आज का भारत

येन केन प्रकीर्ण किसी एक को हटा कर दूसरे का सत्ता में आना उतना बड़ा विषय नहीं है, जितना बड़ा प्रश्न यह है कि सत्ता पर आने के बाद क्या? सत्ता में परिवर्तन मात्र से कोई सुनिश्चित परिवर्तन तय नहीं होता...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

संसदीय जनतंत्र और नागरिक समाज के संबंधों की इस चर्चा की पृष्ठभूमि में जब हम अपने भारतीय जनतंत्र के यथार्थ को देखते है,  यहाँ की स्थिति बेहद जटिल और पेचीदा दिखाई देने लगती है।

'डे आफ्टर' के सवाल का कोई भी सकारात्मक समाधान जनतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक समाज के विस्तार से पूरे समाज के आधुनिकीकरण में निहित है। लेकिन दुर्भाग्य है कि इसी में में अपने ख़ुद के तात्विक विकास के अंत को देखते हैं।

 

मोदी-शाह-आरएसएस सिर्फ ये पाँच साल नहीं, वोट की तिकड़मों के जरिये भले आगे और भी कुछ सालों तक शासन में रह जाएँ, ये इस समाज को गाय, गोबर, गोमूत्र और सांप्रदायिक नफरत से अधिक और कुछ भी देने में असमर्थ हैं

-अरुण माहेश्वरी

अंतोनिओ ग्राम्शी ने अपनी 'प्रिजन नोटबुक' में नागरिक समाज पर काफी गंभीरता से चर्चा की है। जनतंत्र में नागरिक समाज उसी की एक उपज होता है तो उसकी रक्षा का एक बड़ा कवच भी। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की पूरी संरचना में एक ऐसे लोच को तैयार करता है जो उसे किसी भी क्रांतिकारी या प्रति-क्रांतिकारी सीधे हमले से बचाता है।

ग्राम्शी के पहले 1925 में हेराल्ड लास्की ने 'अ ग्रामर आफ पालिटिक्स' लिखी थी। यह संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की संरचना के व्याकरण पर लिखा गया ग्रंथ है। लास्की इसमें संसदीय व्यवस्था में राजनीति और नौकरशाही के पूरे ढाँचे को अपना विषय बनाते हैं। वे अपने विषय में इस मूलभूत प्रस्थापना के साथ प्रवेश करते है कि राजशाही के बजाय जनतंत्र का अर्थ है राजा के हितों की रक्षा के लिये एक शासन व्यवस्था के बजाय जनता के हितों की रक्षा के लिये शासन व्यवस्था।

शासन की इस नई संरचना की परेशानी तब शुरू होती है जब किसी भी बड़े संघर्ष के बाद राजशाही तो ख़त्म हो जाती है, लेकिन उसकी जगह जनता के हितों को साधने वाली व्यवस्था की संरचना तैयारशुदा उपलब्ध नहीं होती है। इसे सुचिंतित ढंग से निर्मित करना होता है।

हमारे आज के समय के बहुचर्चित दार्शनिक स्लावोय जिजेक जब पूरी गंभीरता और आवेग के साथ  'डे आफ्टर' ( कल क्या) की बात करते हैं तो उनका संकेत इसी बात की ओर होता है। येन केन प्रकीर्ण किसी एक को हटा कर दूसरे का सत्ता में आना उतना बड़ा विषय नहीं है, जितना बड़ा प्रश्न यह है कि सत्ता पर आने के बाद क्या?

तुनीसिया के बाद मिस्र के तेहरान में तहरीर स्क्वायर (जनवरी 2011) पर लाखों लोगों के उतर जाने से सालों से सत्ता पर क़ब्ज़ा जमाये बैठी होस्नी मुबारक की सरकार का पतन हो गया, अफ़्रीका और मध्यपूर्व की अरब दुनिया में 'अरब वसंत' का प्रारंभ हो गया, लेकिन इस विद्रोह की लंबी श्रृंखला के बाद क्या? आज का सच यह है कि अफ़्रीका और पश्चिमी एशिया का यह पूरा क्षेत्र चरम अराजकता, तबाही और साम्राज्यवादियों के हथियारों के परीक्षण का क्षेत्र बन गया है

अर्थात, एक विद्रोह मात्र से, सत्ता में परिवर्तन मात्र से सामाजिक जीवन में कोई सुनिश्चित परिवर्तन तय नहीं होता है। सामाजिक परिवर्तन उस शासकीय संरचना के बीच से मूर्त होते हैं, जो विद्रोह के दिन के बाद की एक लंबी रचनात्मक राजनीतिक संस्थागत प्रक्रिया के बीच से तैयार की जाती है।

भारत से अंग्रेज़ों का चला जाना मात्र हमारी आजादी की रक्षा का कारक नहीं बन सकता था। सन् 47 के बाद तीन साल में हमने अपने गणतंत्र के संविधान को अपनाया और तिल-तिल कर अनेक सांस्थानिक परिवर्तनों के बीच से एक जन-कल्याणकारी राज्य की दिशा में काम शुरू किया। इसके रास्ते में तमाम बाधाएँ आती रही है और उनके संदर्भ में हम आज तक अपनी इस शासकीय संरचना को जनता के हितों की सेवा के लक्ष्य को मद्देनज़र रखते हुए उन्नत करने की लड़ाई में लगे हुए हैं।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार के बारे में 9 जजों की बेंच का जो सर्व-सम्मत फैसला सुनाया, उसे इस लगातार जारी प्रक्रिया में हाल के दिनों के एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील के पत्थर के रूप में हम देख सकते हैं।

यहां इस चर्चा का मूल विषय है - 'डे आफ्टर' ! लास्की ने जब संसदीय लोकतंत्र की संरचना पर विचार शुरू किया तो इसकी पहली सबसे बड़ी विशेषता या कमज़ोरी, जो भी कहे, यह बताया कि यह एक ऐसे प्रकल्प के प्रारंभ की तरह है जिसमें राजसत्ता को उस जनता के हितों को साधना होता है जो आम तौर पर अपने हितों के प्रति जागरूक नहीं होती, प्राय: अचेत होती है। उसके जीवन की कठिन परिस्थितियाँ ही उसके विवेक-सम्मत मानसिक विकास में बाधक बनती है।

इसलिये इन परिस्थितियों में शासन के उस नौकरशाही ताने-बाने का का असीम महत्व हो जाता है जो जन-हितकारी बुद्धिजीवियों और चिंतकों के जरिये प्रशिक्षित और चालित होते हैं और जनता के हितों को परिभाषित करते हैं। राजनीति और समाज में बौद्धिकों और जागरूक लोगों के इन अक्सर अल्पमत तबक़ों को ही जनतंत्र का नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) कहते हैं।

पश्चिमी समाजों की जैसे-जैसे समृद्धि बढ़ती गई, आम लोगों में शिक्षा और चेतना का प्रसार होता गया, उसी अनुपात में इस नागरिक समाज का भी, अर्थात अपेक्षाकृत चेतना संपन्न तबक़ों का भी लगातार विकास होता गया है। यह ग़रीबी और पिछड़ेपन के बहुमत वाले समाज के वृत्त से निकल कर समृद्ध और विकसित चेतना के समाज के नये वृत्त में प्रत्यावर्त्तन उन समाजों को एक पूरी तरह से भिन्न आधार पर स्थापित कर देता है, जिसकी पहले के समाज में कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। संसदीय लोकतंत्र के आंतरिक विकास के इस नये चरण में शासन की पूरी संरचना अनोखे ढंग से पूर्ण स्वतंत्र और स्वायत्त अनेक सांस्थानिक सम्मुचय का नया रूप ले लेती है।

आज जिस दिन अमेरिका का 'महाबली' समझा जाने वाला राष्ट्रपति चुन कर सत्ता संभालता है उसी दिन अमेरिकी प्रेस का बड़ा तबका उसके प्रति अपनी खुली शत्रुता की घोषणा करने से परहेज़ नहीं करता। और वहाँ का सुप्रीम कोर्ट उसके पहले आप्रवासन संबंधी प्रशासनिक फैसले को कानून सम्मत न मान कर खारिज करने में देरी नहीं लगाता। इसी का एक परिणाम यह अभी है कि नागरिक समाज और उसकी संस्थाओं के सामने सरकारी नौकरशाही अक्सर एकदम बौनी दिखाई देने लगती है।

ग्राम्शी जब फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की पृष्ठभूमि में ही इन समाजों में समाजवादी क्रांति की समस्याओं पर मनन कर रहे थे, उन्होंने जनतंत्र में इस बढ़ते हुए नागरिक समाज की उपस्थिति के सच को बहुत गहराई से समझा था। और इसीलिये, पश्चिमी समाजों में एक झटके में, किसी क्रांतिकारी प्रहार के जरिये राजसत्ता पर क़ब्ज़ा करने की रूस की तरह की क्रांति को संभव नहीं पाया था। सचाई के उनके इसी अवबोध पर उनका प्रभुत्व (hegemony) के पूरे सिद्धांत की इमारत खड़ी है जिसमें झटके से होने वाली क्रांति और राजसत्ता पर क़ब्ज़े के बजाय वैचारिक संघर्ष की एक लंबी, समाज के नागरिक समाज पर विचारधारात्मक प्रभुत्व कायम करने की लड़ाई पर बल दिया गया था।

संसदीय जनतंत्र और नागरिक समाज के संबंधों की इस चर्चा की पृष्ठभूमि में जब हम अपने भारतीय जनतंत्र के यथार्थ को देखते है,  यहाँ की स्थिति बेहद जटिल और पेचीदा दिखाई देने लगती है। सत्तर साल की आजादी के बीच से यहाँ भी समाज के ऐसे प्राय: सभी हिस्सों में जिनमें हज़ारों सालों के बीच भी कभी शिक्षा और अधिकार-चेतना की रोशनी का प्रवेश नहीं हुआ था, शिक्षा का किंचित प्रवेश हुआ है और सभी समाजों का अपना एक बौद्धिक समुदाय भी पैदा हुआ है।

कुल मिला कर देखने पर भारतीय समाज में ऐसे पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय तबके की एक बड़ी जमात को पाया जा सकता है, जो शायद संख्या की दृष्टि से दूसरे किसी भी देश के नागरिक समाज से बड़ी हो सकती है। लेकिन फिर भी, आबादी के अनुपात में, इसका विस्तार इतना कम है कि हम अपने समाज को पश्चिमी समाजों की तरह पूरी तरह से अधिकार चेतना से संपन्न नागरिक समाज नहीं कह सकते हैं। इसीलिये सरकार और नौकरशाही पर अपना निर्णायक दबाव बनाने की दृष्टि से यह अब भी जनतंत्र के बिल्कुल आदिम स्तर पर ही बना हुआ है जिसमें व्यापक जनता, जिसके मतों से सरकारें बना करती है, अपने ख़ुद के हितों के प्रति ही पूरी तरह से अचेत बनी हुई है।

इसीलिये हमारे यहाँ आज भी '30-'40 के ज़माने तक के यूरोप की वे सारी परिस्थितियाँ मौजूद हैं जिसमें किसी भी प्रकार से राज सत्ता पर क़ब्ज़ा करके कोई भी शासक गिरोह समाज को मनमाने ढंग से चला सकता है

चुनावों में सांप्रदायिकता और जातिवाद की तरह की भीड़ की आदिम-चेतना की प्रमुखता का मायने यही है कि नये जनतांत्रिक नागरिक समाज में आदिम ग़ैर-जनतांत्रिक समाज के वृत्त का प्रत्यावर्त्तन नहीं हो पा रहा है। और इसीलिये हमारे यहाँ दुनिया में जातीय नफरत से किये जाने वाले जन-संहारों के इतने भयानक अनुभवों के बावजूद फासीवाद-नाज़ीवाद का ख़तरा एक सबसे ज्वलंत सचाई के तौर पर बना हुआ है।

यहीं पर हम फिर एक बार 'डे आफ्टर' के विषय को विचार के दायरे में लाना चाहते हैं।

हमारी आजादी के बाद भारत का शासन जिन ताकतों ने संभाला उनके सामने पश्चिम के पूँजीवादी विकास और संसदीय राजनीति और जनतांत्रिक समाज का एक साफ ख़ाका था। सांप्रदायिकता के आधार पर बँटवारे के बावजूद चूँकि यह नेतृत्व सारी दुनिया में जातीय हिंसा के जघन्यता रूपों के प्रति जागरूक था, इसने धर्म-निरपेक्षता, भाईचारा और सामाजिक न्याय के रास्ते पर तमाम स्तर पर सांस्थानिक विकास का एक सिलसिला शुरू किया। लेकिन इस नवोदित राष्ट्र के साथ जन्म से सांप्रदायिक और जातिवादी हिंसा का जो रोग लग गया था, उससे मुक़ाबले के लिये शिक्षा और चेतना के विस्तार से जिस तेज़ी से नागरिक समाज का विकास करना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। वोट और भीड़ की राजनीति में वह एक सबसे जरूरी काम उपेक्षित रह गया।

आज तमाम राजनीतिक दलों में, जिनमें दक्षिणपंथियों के साथ ही वामपंथी और मध्यपंथी भी शामिल है, बौद्धिकता का महत्व दिन प्रतिदिन घटता चला गया है। भारत का नागरिक समाज आज राजनीतिक समर्थन से पूरी तरह से वंचित होने के कारण किसी भी समय से कहीं ज्यादा कमज़ोर और लुंजपुंज दिखाई देता है। और यही वजह है कि भारतीय मध्यवर्ग की सूरत पशुवत उपभोक्ता की तरह की ज्यादा दिखाई देने लगती है। शिक्षा और समृद्धि से  इनकी मानसिक चेतना का विकास न होने के कारण इनका एक हिस्सा सीधे तौर पर जनता के प्रति एक प्रकार की शत्रुता का भाव रखता है। वह फासीवादी ताकतों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा दिखाई देता है।

आज मोदी के नेतृत्व में जो लोग सत्ता पर आए हैं, उनके पास कोई प्रगतिशील भविष्य दृष्टि नहीं है। जनता के एक बड़े हिस्से का पिछड़ापन ही विरासत में मिली इसकी राजनीतिक पूँजी है। इसीलिये केंद्र और अनेक राज्यों की सत्ता पर आ जाने के बावजूद जब भी ये 'आगे क्या?' की तरह के प्रश्न के सम्मुखीन होते हैं, ये पूरी तरह से ठिठक कर खड़े हो जाते हैं। इन्हें आगे भी गाय, गोबर, गो मूत्र'आदि से अधिक और कुछ नहीं दिखाई देता। ये सांप्रदायिक दंगों और पड़ोसियों से शत्रुता के आधार पर थोथे राष्ट्रवाद से आगे कुछ नहीं सोच पाते हैं।

'डे आफ्टर' के सवाल का कोई भी सकारात्मक समाधान जनतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक समाज के विस्तार से पूरे समाज के आधुनिकीकरण में निहित है। लेकिन दुर्भाग्य है कि इसी में में अपने ख़ुद के तात्विक विकास के अंत को देखते हैं।

यही वजह है कि मोदी-शाह-आरएसएस सिर्फ ये पाँच साल नहीं, वोट की तिकड़मों के जरिये भले आगे और भी कुछ सालों तक शासन में रह जाएँ, ये इस समाज को गाय, गोबर, गोमूत्र और सांप्रदायिक नफरत से अधिक और कुछ भी देने में असमर्थ हैं। सच्चे अर्थों में हमारे समाज के आधुनिकीकरण के लिये ये अपनी आत्माहुति के जरिये ही आगे का कोई रास्ता खोज पायेंगे। क्या गालियाँ बकने वाले ट्विटर हैंडलर्स के ज्ञान संदेश पर कान लगाये रखने वाले प्रधानमंत्री के लिये यह कभी भी संभव हो पायेगा ?

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