नोटबंदी की खुल गयी पोल

नोटबंदी से नाहक गयीं 103 आम लोगों की जानों के हिसाब को अगर हम अलग भी रख दें तब भी, नोटबंदी से हुआ देश की अर्थव्यवस्था का नुकसान उससे बहुत-बहुत भारी है। ...

हाइलाइट्स

नोटबंदी से नाहक गयीं 103 आम लोगों की जानों के हिसाब को अगर हम अलग भी रख दें तब भी, नोटबंदी से हुआ देश की अर्थव्यवस्था का नुकसान उससे बहुत-बहुत भारी है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी के अनुमान के अनुसार, यह नुकसान 1.5 लाख करोड़ रु0 के करीब का बैठेगा।

नोटबंदी की खुल गयी पोल

0 राजेंद्र शर्मा

आखिरकार, नोटबंदी की पोल खुल गयी। बेशक, मोदी सरकार ने अपने स्वभाव के अनुरूप, अपनी इस भारी विफलता को खबरों से बाहर करने के लिए, तुरत-फुरत केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल कर डाला है। इसके बावजूद, इस विफलता की सचाई को लोगों की आंखों से ओझल करना आसान नहीं होगा। ऐसा इसलिए भी है कि अब नोटबंदी के पूरी तरह से विफल रहने पर रिजर्व बैंक ने भी आधिकारिक रूप से मोहर लगा दी है। मोदी सरकार को इस विफलता के आधिकारिक रूप से स्वीकार किए जाने की शर्मिंदगी से बचाने के लिए ही महीनों तक टालमटोल करने के बाद, आखिरकार केंद्रीय बैंक ने उस सचाई को विधिवत स्वीकार कर लिया, जो वैसे भी कोई बहुत छिपी हुई नहीं थी। खैर! अब यह एक आधिकारिक तथ्य है।

पिछले साल नवंबर के शुरू में प्रधानमंत्री ने पांच सौ और हजार रु0 के नोटों पर जो पाबंदी लगायी थी, उसके बाद नोटबंदीशुदा नोटों का 99 फीसद हिस्सा बैंकों में लौट आया है। 15.44 लाख करोड़ रु0 के नोटों को यकायक चलन से बाहर किया गया था, उनमें से पूरे 15.28 लाख करोड़ रु0 के नोट बैंकिंग व्यवस्था में लौट आए थे। इस तरह बैंकिंग व्यवस्था में न लौटने वाले नोट 16,000 करोड़ रु0 से ज्यादा के नहीं होंगे।

ये आंकड़े क्या सचमुच नोटबंदी की विफलता की कहानी कहते हैं?

यह सवाल इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि रिजर्व बैंक के उक्त आंकड़े आने के बाद भी सरकार ने नोटबंदी की सफलता का अपना दावा दुहराया है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने खासतौर पर इस मामले में सरकार की ओर से मोर्चा संभाला है। लेकिन, नोटबंदी का जेटली का बचाव, वास्तव में नोटबंदी के मूल लक्ष्यों से ही कतराते हुए पेश किया गया है।

सभी जानते हैं कि नोटबंदी की घोषणा के प्रधानमंत्री के टेलीविजन प्रसारण में सबसे ज्यादा जोर, काले धन की अर्थव्यवस्था और काले धन पर हमला किए जाने पर था। यहां तक कि नोटबंदी को कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक तक बताया जा रहा था। इसके साथ चलताऊ तरीके से जाली नोटों और आतंकवाद की फंडिंग पर प्रहार की बात भी जोड़ दी गयी थी। वैसे कम से कम जाली नोटों पर हमले की भी पोल इस सचाई से खुल गयी है कि बैंकिंग व्यवस्था में लौटे पुराने नोटों में, जाली नोटों की रकम का आंकड़ा दो अंकों में ही है। इस लिहाज से यह मक्खी मारने के लिए तोप चलाने ही मामला नजर आता है।

और नोटबंदी को काले धन पर प्रहार किस तरह करना था?

सरकार की ओर से यह माना और बताया जा रहा था कि काले धन का मतलब ही है बेहिसाबी नकदी। नोटबंदी की छन्नी से काली नकदी छनकर अलग हो जाएगी। होगा यह कि जो ईमानदार हैं, वे तो अपने पुराने नोट बैंकों में ले जाकर बदलवा लेंगे। लेकिन, काले धन के खिलाड़ियों की अपना काला पैसा, नये नोटों से बदलवाने के लिए बैंकों में जमा कराने की, बैंकों के सामने ले जाने की हिम्मत ही नहीं होगी क्योंकि बैंकों में उन्हें इसकी सफाई देनी पड़ेगी। नतीजा यह होगा कि काल धन, काले धन वालों की तिजारियों में पड़ा-पड़ा ही बेकार हो जाएगा। काले धन पर इस सीधे हमले को ही नोटबंदी का सबसे बड़ा निशाना बताया जा रहा था। नोटबंदी की गोपनीयता से लेकर आकस्मिकता तक, सब को ठीक इसी आधार पर जरूरी ठहराया जा रहा था।

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उस समय इक्का-दुक्का मामलों में औपचारिक तरीके से, लेकिन मुख्यत: अनौपचारिक रूप से शासन में विभिन्न स्तरों से इसके अनुमान भी पेश किए जा रहे थे कि इस तरह नष्ट होने वाला काला धन कितना होगा? 20 से 30 फीसद तक खारिजशुदा नोटों के बैंकिंग व्यवस्था में न लौटने और इस तरह सीधे-सीधे नष्ट हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा था। इतना ही नहीं, इस नष्ट हुए ‘काले धन’ को सीधे सरकार की ‘कमाई’ मानकर, इसके भी चर्चे हो रहे थे कि 3 से 5 लाख करोड़ रु0 के बीच की ‘राष्ट्र’ की इस अप्रत्याशित कमाई को, किस तरह खर्च किया जाना चाहिए। इसके लिए सीधे-सीधे गरीबों में पैसा बांट देने से लेकर, जिसे लेकर मोदी जी के विचारधारात्मक परिवार के लोगों ने गरीबों के जीरो बैलेंस खातों में सीधे पैसा आने की अफवाहें भी उड़ायी थीं, मुफ्त के इन संसाधनों का बुनियादी ढांचे के निर्माण से लेकर कल्याणकारी कार्यों पर खर्च करने तक के सुझाव भी आ रहे थे। इसके बल पर ब्याज की दरें घटाए जाने की उम्मीदेें जतायी जा रही थीं सो अलग। लेकिन, अब पता चला है कि मुश्किल से एक फीसद धन इस तरह नष्ट हुआ है और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि इसमें काफी पैसा ऐसे ईमानदार लोगों का नहीं होगा, जो तरह-तरह के कारणों से, तय की गयी समय सीमा में अपने पुराने नोट बैंकों तक नहीं ले जाए पाए थे।

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साफ है कि काले धन के खिलाड़ियों पर नोटबंदी का कम से कम सीधे तो कोई असर नहीं पड़ा है। और जहां तक इस कसरत से ‘राष्ट्र’ की कुछ कमाई होने का सवाल है, तो नोटबंदी के चलते नये नोट छपवाने पर और बैंकों को अपने हाथों में पुराने नोटों में जमा हो गयी भारी तथा निवेश के लिए अनुपलब्ध राशि पर जो ब्याज देना पड़ रहा था, उसकी किसी हद तक क्षतिपूर्ति के लिए रिजर्व बैंक द्वारा भरे गए ब्याज पर, इन दो मदों में ही 30,000 करोड़ रु0 से ज्यादा खर्च होने का अनुमान है। इस तरह, नष्ट हुए करीब 16,000 करोड़ रु0 को अगर सरकार की ‘कमाई’ भी मान लिया जाए, तब भी नोटबंदी के लिए इससे दोगुना खर्चा तो सरकारी खजाने से सीधे ही करना पड़ा है। इसमें अगर, नये नोटों के लिए एटीएम मशीनों को रीकैलीबरेट करने पर आया करीब 25,000 करोड़ रु0 का खर्च और जोड़ दिया जाए तो, नोटबंदी का खर्चा इस कमाई से चार गुना हो जाता है।

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बहरहाल, देश के लिए नोटबंदी का बहुत महंगी विफलता साबित होना, नोटबंदी के चलते हुए इन पचास हजार करोड़ रु0 से ज्यादा के खर्चों तक ही सीमित नहीं है। नोटबंदी से नाहक गयीं 103 आम लोगों की जानों के हिसाब को अगर हम अलग भी रख दें तब भी, नोटबंदी से हुआ देश की अर्थव्यवस्था का नुकसान उससे बहुत-बहुत भारी है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी के अनुमान के अनुसार, यह नुकसान 1.5 लाख करोड़ रु0 के करीब का बैठेगा।

जैसाकि सभी जानते हैं, नोटबंदी की सबसे बुरी मार कृषि समेत हमारी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर पड़ी है, जो हमारे देश में तीन-चौथाई रोजगार का स्रोत है। खास बात यह है कि इस क्षेत्र पर नोटबंदी के धक्के का असर अब भी खत्म नहीं हुआ है और यह मार अब भी लगातार पड़ ही रही है।

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हाल में कृषि उत्पादों की कीमतों में जिस गिरावट से महाराष्ट्र से लेकर मध्य प्रदेश तक किसान आंदोलन भडक़ उठे थे, उसके भी पीछे नोटबंदी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आयी नकदी की भारी कमी का ही हाथ माना गया है। अनौपचारिक क्षेत्र में अल्पावधि तथा मध्यम अवधि रोजगार पर अब भी बने हुए नकारात्मक असर के साक्ष्य भी लगातार सामने आ रहे हैं। अचरज की बात नहीं है कि नोटबंदी के बाद गुजरी पिछली दो तिमाहियों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्घि दर लगातार बैठती गयी है और अब 5 फीसद से जरा सी ही ऊपर रह गयी है।

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साफ है कि नोटबंदी बहुत भारी और महंगी भूल साबित हुई है।

यह दूसरी बात है कि जेटली अब भी यह कहकर नोटबंदी के आलोचकों को ही गलत ठहराने में लगे हुए हैं कि उन्होंने काले धन पर नोटबंदी की मार को सही तरीके से समझा नहीं है, कि नोटबंदी से काला पैसा भूमिगत से खुली अर्थव्यवस्था में आ गया है, कि नोटबंदी से कर का आधार बढ़ गया है, कि नोटबंदी के बाद काले धंधों के लिए नकदी की उपलब्धता घट जाने वाली है, आदि, आदि। लेकिन, जानकारों के अनुसार इस सब का भी काले धन पर कोई असर पडऩे वाला नहीं है।

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इसके अलावा सचाई से तो जेटली भी इंकार नहीं कर सकते हैं कि उनकी सरकार ने नोटबंदी के लक्ष्यों को ही बदलने की लगातार कोशिश की है और इसी क्रम में नकदी अनुपात घटाने से लेकर डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ाने तक के नये लक्ष्य उछाले जाते रहे हैं। इसकी शुरूआत नोटबंदी के बीचौ-बीच, नवंबर के आखिर मेें प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ में डिजिटल लेन-देन का लक्ष्य उछाले जाने से ही हो गयी थी। हालांकि इन लक्ष्यों के लिए नोटबंदी की कोई जरूरत ही नहीं थी, फिर भी लक्ष्यों का इस तरह बदला जाना भी तो नोटबंदी की भारी विफलता ही सबूत है।                                                                      0

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