पूर्व नौकरशाहों का खत मोदी सरकार के लिए चिंता का सबब न बने लेकिन चिंतन का विषय तो जरूर है

स्वागत है इन नौकरशाहों की हिम्मत का जिनने कम से कम ये तो कहा कि मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले ही राष्ट्र विरोधी कैसे हो सकते हैं।...

स्वागत है कोई तो बोले, लेकिन दाल में कुछ काला भी तो नही है?

संजय रोकड़े

भारतीय समाज व राजनीति में राजनेता के बाद कोई सबसे अधिक सशक्त व सक्षम इकाई है तो वह है प्रशासनिक अफसर। हम इन्हें देश में जनता के सेवक या नौकरशाह के रूप में भी जानते हैं। सच कहें तो असली सरकार तो यही चलाते हैं। ये ही वो लोग हैं जो किसी व्यक्ति विशेष, मंत्री या उद्योगपति का काम नहीं करना चाहें तो उसे दो सेकंड में घुमा दें और चलता कर दें। नौकरशाहों की हाजिर जवाबी और तार्किक क्षमता इतनी होती कि वे पल में किसी की भी मानसिकता बदल सकते हैं। ये वो लोग हैं जो पद पर रहते हुए ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाएं तो नेताओं को भी बेईमानी करने या उलूल-जुलूल हरकतें करने में पसीने ला दें पर ये पद पर रहते हुए ऐसा काम हरगिज नहीं करते हैं। गर ये ऐसा नहीं कर पाते हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण सत्तारूढ़ सरकारों की मानसिक गुलामी। इनके बारे में यह भी जगजाहिर है कि यही वो वर्ग है जो सत्ता का सबसे बड़ा गुलाम और लालची है। इन दिनों इनकी गुलामी का आलम ये हो गया है कि अब इनको लल्लू-पंजू सा नेता भी जिसके चेहरे पर मक्खियां तक न उड़े डपट कर चले जाता है। नौकरशाह की साख में इतना पतन तो आज से दो- तीन दशक पहले नही देखा गया था।

बहरहाल इन्हीं नौकरशाहों में एक तबका ऐसा भी जो इन सब विपरित हालातों के बाद भी एक उम्मीद जगाता है, आश बंधाता है और ये संदेश देता है कि आज भी देश में आवाज उठाने वाले अफसर हैं, भले ही इनकी संख्या कम हो। इनके आगे पूर्व लग गया हो लेकिन ये संख्या बल में जितने भी हों पर इस बात के लिए हमें विश्वस्त करते हैं कि डरो नहीं वो नही तो हम ही सही कोई तो है। आज भी इस तरह के अफसरों की कमी नहीं है कि वे सरकार को ये बताएं कि उसके द्वारा बनाई गई नीतियां सही है या गलत हैं।

बेशक आप जान गए हैं। हम यहां बात कर रहे है उन पूर्व नौकरशाहों की जिनने हिम्मत और होसला जुटा कर देश के प्रधानमंत्री भाई नरेन्द्र मोदी के नाम एक खुला खत लिखा है। इस खत में साफ-साफ लिखा है कि देश में आज ऐसा माहौल बन गया है या बना दिया गया है कि जो भी व्यक्ति या संस्थान मोदी सरकार की बुरी नीतियों या बुराईयों को सामने लाता है उसे देश विरोधी करार दिया जाता है।

स्वागत है इन नौकरशाहों की हिम्मत का जिनने कम से कम ये तो कहा कि मोदी सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले ही राष्ट्र विरोधी कैसे हो सकते हैं।

बताता चलूं कि खत पर करीब 65 पूर्व नौकरशाहों के हस्ताक्षर हैं। ये संख्या बल में बेशक कम है लेकिन जो भी है उनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) एवं अन्य केंद्रीय सेवाओं के पूर्व अधिकारी हैं।

जिन नौकरशाहों ने इस खत पर दस्तखत किए हैं उनमें सर्व प्रथम 91 वर्षीय हर्षमंदर सिंह शामिल हैं। वे 1953 बैच के आईएएस अधिकारी रह चुके हैं। इनके साथ ही पूर्व केंद्रीय संस्कृति सचिव जवाहर सरकार, आर्थिक मामलों के विभाग के पूर्व सचिव ई.ए.एस सरमा और मुंबई के पुलिस आयुक्त रह चुके जूलियो रिबेरो भी शामिल हैं।

इन सबने मिलकर जो खत लिखा है उसमें इस बात का विशेष तौर से जिक्र है कि भारत में तानाशाही, असहिष्णुता और अल्पसंख्यक उत्पीड़न तेजी से बढ़ रहा है। इसके लिए लोक प्राधिकारियों और संवैधानिक संस्थाओं से अपील भी की है कि वे इन परेशान करने वाली प्रवृतियों पर ध्यान दें और सुधारवादी कदम उठाएं। साथ ही इस तरह की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने में सहभागी भी बनें। इस खत में संविधान के साथ होने वाली छेडछाड़ की शंका भी जाहिर की गई है। संविधान के संरक्षण के संबंध में लिखा है कि हमारे पुरखों की दृष्टि के अनुसार हमें भारत के संविधान की भावना को फिर से जीवंत करना है और उसका बचाव भी करना है। इनके पत्र में इस बात का विशेष हवाला है कि गोरक्षा को लेकर हिंसा और धर्म के आधार पर लोगों को बांटे जाने के कई मामले सामने आए हैं, इन पर रोक लगाई जानी चाहिए। पीएम को खत लिखने वाले ये वो वरिष्ठ नौकरशाह हैं जिनने दशकों सरकार चलाई है। इस समय इनका ऐसा संयुक्त बयान सामने आना बेहद अपूर्व घटना है।

ये बयान भले ही मोदी सरकार के लिए चिंता का सबब न बने लेकिन चिंतन का विषय तो जरुर है। इसमें दो राय नही है कि इन मंजे मंजाए नौकरशाहों ने खत में जो सवाल उठाएं है वे बेहद चिंता का विषय है। अफसरो की ये पहल हम सबका उस और भी ध्यान आकर्षित करती है जो सब चलता है कि नीति के साथ जीने के आदि हो गए है। आज के समय में हम बहुत गैर जिम्मेदाराना होते जा रहे है। हमारे बीच रहने वाले किसी भाई के साथ कोई जुर्म ज्यादती करता है तो भी हम उसे नजर अंदाज कर देते है। हमारी यही मौन स्वीकृति कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर फसाद करने वालों की होसला आफजाई करती जा रही है। पर इन नौकरशाहों ने न तो मौन स्वीकृति दी है और न ही फसाद करने वालों के खिलाफ चुप बैठे। इन सबने मिलकर मुसलमानों पर हो रहे हमले, विश्वविद्यालयों में बढ़ रही गलाघोंटू वृत्तियों और कानून के दुरुपयोग पर भी बड़े ही मुखर तरीके से अपनी बात रखी। न केवल बात रखी बल्कि हमारा भी ध्यान उस और दिलाया जिसकी तरफ हम आंखें मुंदे बैठे थे।

इन अफसर शाहों ने अपने खत में रोमियों ब्रिगेड का जिक्र भी विशेष तौर किया है। हाल ही जिस तरह का खत सामने आया है मेरी समझ से ऐसा कोई खत तो आपातकाल के पहले या उसके दौरान भी जारी नहीं हुआ था।

बहरहाल देश में बढ़ रहे 'उग्र-राष्ट्रवाद को लेकर इस तरह का जो खुला खत सामने आया है उसके पीछे इन नौकरशाहों की मंशा साफ है। इनकी मंशा ये है कि वर्तमान समय में देश में जो घटित हो रहा है वह सब बंद होना चाहिए क्योंकि सांप्रदायिक तौर पर आवेशित माहौल में असहनशीलता व हिंसा पैदा होती है।

इनने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में स्पष्ट कहा कि वर्तमान में मोदी सरकार की आलोचना करने वालों को देश विरोधी ठहराया जा रहा है। इससे आलोचना की गुंजाइश खत्म होती जा रही है। इससे वाद-विवाद और असहमति जताने की गुंजाइश भी नही बचती है। देश में इस समय उग्र-राष्ट्रवाद बढ़ रहा है, इसमें कोई दोराय नही है। इसके चलते किसी आलोचक को एक तय खाके में फिट कर दिया जा रहा है, यदि आप सरकार के साथ नहीं हैं तो आप राष्ट्र विरोधी हैं। सत्तासीनों से सवाल नहीं किए जाने चाहिए- यह स्पष्ट संदेश है।

खौफ और हिंसा के माहौल में इंसान जिंदा नही रह सकता है वह केवल घुट-घुट कर मरता ही है। ऐसे घुटन भरे माहौल से इंसान को आजादी मिलनी चाहिए और उसे खुले में सांस लेना का माहौल मिलना चाहिए।

वरिष्ठ सरकारी पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके इन चंद पूर्व नौकरशाहों ने सरकार से विशेष तौर से अपील की है कि वह देश में बढते उग्र-राष्ट्रवाद और अधिनायकवाद से निपटने के लिए जरूरी कदम उठाए।

इन सबके साथ खत में इस साल के शुरूआत में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में किए गए कथित सांप्रदायिक चुनाव-प्रचार का जिक्र भी है। खत के माध्यम से कब्रिस्तान-श्मशान वाले विवादित बयान, उत्तर प्रदेश के दादरी में अखलाक हत्याकांड, राजस्थान में पहलू खान हत्याकांड जैसी घटनाओं का भी जिक्र है, साथ ही बूचडख़ानों पर प्रतिबंध से अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का आरोप भी लगाया है। इसमें साफ लिखा है कि बूचडख़ानों पर प्रतिबंध से अल्पसंख्यकों की रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा लेकिन सरकार का इस और ध्यान नही है। हमें ये खत क्यों लिखना पड़ा इसके बारे में ये अफसरान कहते है कि यह कदम कथित गोरक्षकों की हालिया घटनाओं व हरकतों को लेकर उठाना पड़ा है। गोरक्षकों की हालिया हरकतों और घटनाओं ने ही उनके दिलों दिमाग में बेचैनी पैदा की और इसी के चलते ऐतराज और संदेह को जाहिर करना पड़ा है।

हालांकि पूर्व नौकरशाहों की इस पहल पर राजनीतिक रंग का आवरण चढ़ा होने के आरोप भी सामने आ रहा है। जनचर्चाएं तो ऐसी भी चल रही है कि नौकरशाहों द्वारा ये जो खत लिखा गया है वह कहीं और से ही लिखा हुआ आया है इनने तो सिर्फ और सिर्फ दस्तखत किए है। सच क्या है ये तो हम नही बता सकते सिवाय अफसरों के।

बता दें कि हमारे देश में जिस तरह से नौकरशाह को लेकर समाज में एक डरपोक इंसान की इमेज बनी है वह भी बात को गहरे तक सशकिंत करती है कि माजरा शायद कुछ और ही है। नौकरशाह वह भी सेवा से हटे हुए इस मामले में बोले है तो दाल में कुछ काला भी जरूर होगा। खैर, अभी तो इनकी हिम्मत और पहल का स्वागत ही करना चाहिए।

संजय रोकड़े, लेखक मीडिय़ा रिलेशन पत्रिका का संपादन करने के साथ ही सम-सामयिक विषयों पर कलम चलाते हैं।

 

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