जिंदगी मुझे अक्सर डराती है/ मौत से मुझे नहीं लगता डर

मुझे मर चुके लोगों से बिल्कुल नहीं लगता डर मुझे  उनकी किसी भी भीड़ का हिस्सा बनना मंजूर है हर दूसरी रात मैं तफरीह करता हूं मृतकों के साथ ताश खेलता हूं और नाचता-गाता हूं उनके साथ...

अतिथि लेखक

श्मशान की शांति

केपी शशि

 

जिंदगी मुझे अक्सर डराती है
मौत से मुझे नहीं लगता डर

मुझे मर चुके लोगों से बिल्कुल नहीं लगता डर

मुझे  उनकी किसी भी भीड़ का हिस्सा बनना मंजूर है

हर दूसरी रात मैं तफरीह करता हूं मृतकों के साथ

ताश खेलता हूं और नाचता-गाता हूं उनके साथ

बातें करता हूं उनसे जिंदगी के बारे में

जिसका उनके लिए नहीं है कोई मतलब

खुलते ही आंख अभिशप्त महसूस करता हूं।

जिंदगी मुझे डराती है
मौत से मुझे नहीं लगता डर।

 

जिंदगी के मौन से भयभीत हो जाता हूं

देखता हूं गलियों में चलती-फिरती  लाशें

अपने ही दिमाग के कैदखाने में बंद

शिक्षकों की जुबानों पर लगे ताले

ज्ञान नहीं निकलता उनसे बार

एहसास जिनका एहसास नहीं है

जिंदा लोगों पर देखता हूं मौत के साय़े

और सुनता हूं मृतकों की आहें

जिंदगी भयाक्रांत करती है मुझे

लेकिन मौत नहीं।

 

मैं भयाक्रांत हो जाता हूं

मुर्दों के सांस लेने के अभिनय के बारे में सोचकर

लेकिन मौत मुझे नहीं डराती

मुझे भय लगता है श्मशान की शांति से

लेकिन मौत से नहीं लगता मुझे डर

जिंदगी से लगता है

जब नहीं उठते कब्र से मुर्दे

मैं खुद से कहता हूं

निरापद है मयनवोशी

शांत श्मशान में।

(अनुवाद: ईश मिश्र)

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