प्रणव मुखर्जी को एक व्यक्ति समझना भूल होगी, यह संघ -भाजपा के उभार का सबसे खतरनाक दौर है

कांग्रेस के उदार हिंदूवाद और संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद के बीच वैचारिक धरातल पर एक निरंतरता है, radical break नहीं। भारतीय राज और समाज के जनतांत्रिकरण का अधूरा कार्यभार इसी की कहानी बयां कर रहा है ।...

प्रणव मुखर्जी को एक व्यक्ति समझना भूल होगी, यह संघ -भाजपा के उभार का सबसे खतरनाक दौर है

लाल बहादुर सिंह

श्री प्रणव मुखर्जी का संघ कार्यक्रम में सम्पूर्ण व्यवहार और विचार तो बस उस सार (Essence) की औपचारिक अभिव्यक्ति है, जिसकी अन्तःसलिला आधुनिक भारत के इतिहास को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले इन दो संगठनों, कांग्रेस और संघ-जनसंघ-भाजपा के बीच निरंतर प्रवाहित होती रही है, नेहरूजी के उदारवादी मूल्यों और Scientific temper में आस्था के बावजूद।

अतीत में संघ के कार्यक्रमों में तमाम विभूतियों की आवाजाही तथा उसे दिये गए समाजसेवा या देशभक्ति के तमगे इसी सच्चाई की और इशारा करते हैं।

प्रणव मुखर्जी के जाने की विशिष्टता बस इतनी है कि यह एक ऐसे समय में हुआ जो संघ -भाजपा के उभार का सबसे खतरनाक दौर है और जब उनके खिलाफ बढ़ते आक्रोश के मद्देनजर उन्हें एक नयी वैधता की ज़रूरत है ।

Lal Bahadur Singhकहना अतिशयोक्ति न होगा कि कांग्रेस के सर्वोच्च पदों पर विराजमान रह चुके (जो बस बाल भर प्रधान मंत्री बनने से चूक गए), श्री मुखर्जी कांग्रेस की वैचारिक- राजनैतिक मशीनरी के सर्वोत्तम उत्पादों में हैं। इसलिए उन्हें एक व्यक्ति समझना भूल होगी। कांग्रेस की डोमिनेंट विचारधारा का प्रतिनिधित्व वे करते हैं, शर्मिष्ठा मुखर्जी या अहमद पटेल नहीं।

पार्टी के आधिकारिक प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला के एक तरह उनके भाषण को endorse करते बयान को टैक्टिकल डैमेज कण्ट्रोल से ज्यादा इस वैचारिक सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए।

श्री मुखर्जी और मोहन भागवत के भाषण के बीच रोचक समानता और भिन्नता से इन दोनों धाराओं - कांग्रेस (कुछ लोग इसे कांग्रेस का दक्षिण पंथ कहना चाहेंगे) और संघ के बीच के वैचारिक सम्बन्ध, अंतःक्रिया और interpenetration को समझा जा सकता है।

कांग्रेस के उदार हिंदूवाद और संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद के बीच वैचारिक धरातल पर निरंतरता है

यह अनायास नहीं है कि जिस देश में 1857 में हमारी जनता की महान एकता ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की चूलें हिला दी थी और बहादुरशाह जफ़र के अमर शब्दों की ललकार गूंजी थी, "गाजियों में बू रहेगी जब तलक इमान की, तख्ते लन्दन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की", वह देश 1947 आते आते दुनिया के सबसे रक्तरंजित दंगों के बीच सांप्रदायिक आधार पर विभाजित हो गया, और आज कांग्रेस के सुदीर्घ शासन के बाद, उसी की अगली कड़ी में देश हिन्दू राष्ट्र के फासीवादी प्रोजेक्ट के मुहाने पर खड़ा है।

कांग्रेस के उदार हिंदूवाद और संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद के बीच वैचारिक धरातल पर एक निरंतरता है, radical break नहीं। भारतीय राज और समाज के जनतांत्रिकरण का अधूरा कार्यभार इसी की कहानी बयां कर रहा है ।

सच्चे लोकतान्त्रिक भारत का सपना देखने वालों को इस वैचारिक ढांचे के पार जाना होगा।!

लाल बहादुर सिंह, लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।

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