थोड़े तो सीरियस हो जाएं राहुल बाबा, हल्के में न लें भाजपा को

जहां तक बात 2019 के आम चुनाव की है, तो इसमें विपक्ष का एक होना और निस्वार्थ भाव से एक-दूसरे की मदद करना इतना आसान है नहीं, जितना बताया जा रहा है।...

देशबन्धु

क्या मोदीजी को हरा पाएंगे राहुल गांधी?

2019 के पहले विपक्षी दलों की एकजुटता की कोशिश से भाजपा परेशान हो रही है। यह स्वाभाविक भी है। किसी को भी अपनी सत्ता खोना अच्छा नहीं लगेगा, न ही कोई ये चाहेगा कि उन्हें चुनौती देने के लिए मजबूत विकल्प सामने हो। 2014 के चुनाव में तो भाजपा को ऐसा बहुमत मिला था कि विपक्ष नाममात्र को रह गया। फिर धीरे-धीरे भाजपा के प्रति दलों और नेताओं में असंतोष सामने आने लगा। अलग-अलग खेमों में बंटे विपक्ष को यह बात समझ आने लगी कि मजबूत भाजपा का जवाब मजबूत विपक्ष ही दे सकता है, लिहाजा वे सब नए ढंग की चुनावी रणनीति बनाने में जुट गए हैं।

कांग्रेस इस विपक्ष की धुरी रहेगी, फिलहाल यही लग रहा है। और शायद इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस संभावित विपक्षी एकता के उत्साह में आकर कह रहे हैं कि 2019 के चुनाव में राजग यानी एनडीए का ऐसा पतन होगा, जैसा कई वर्षों में नहीं देखा होगा। एकजुट विपक्ष के सामने भाजपा चुनाव जीतने की बात तो भूल ही जाए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी अपनी वाराणसी सीट गंवा सकते हैं। अगर यह बात उन्होंने कांग्रेस समर्थकों और कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने के लिए कही है, तब तो ठीक है। लेकिन अगर वे सचमुच मानते हैं कि विपक्ष की एकता के कारण नरेन्द्र मोदी वाराणसी की सीट गंवा देंगे, तो यह बयान उनकी राजनीतिक अनुभवहीनता को दिखाता है।

वैसे तो चुनाव में जीत-हार अप्रत्याशित ही होती है। लेकिन फिर भी कुछ सीटों पर परंपराओं और रूझानों को देखकर अनुमान लगाना कठिन नहीं होता है। जैसे 2014 में मोदी-मोदी के शोर में भी यह माना जा रहा था कि स्मृति ईरानी या कुमार विश्वास राहुल गांधी को अमेठी सीट पर नहीं हरा पाएंगे, और वैसा ही हुआ भी। वाराणसी सीट की बात करें तो यहां 2014 में नरेन्द्र मोदी ने रिकार्ड जीत दर्ज की थी। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल को दो लाख दस हजार वोट के आसपास मिले थे। कांग्रेस के अजय राय को मात्र 75 हजार, सपा उम्मीदवार को 45 हजार और बसपा उम्मीदवार को 60 हजार। जबकि अकेले नरेन्द्र मोदी को 5 लाख 81 हजार वोट मिले थे। ऐसा नहीं है कि केवल 2014 में भाजपा ने यहां जीत दर्ज की, बल्कि वाराणसी तो 1991 से भाजपा की झोली में जाती रही है।

केवल 2004 में ऐसा नहीं हुआ, लेकिन 2009 में जब यूपीए फिर से केंद्र की सत्ता में आई, तब भी भाजपा से मुरली मनोहर जोशी यहां के सांसद बने। 2019 में भी भाजपा अपनी इस सीट को खोना नहीं चाहेगी और बहुत मुमकिन है कि नरेन्द्र मोदी ही यहां से फिर खड़े होंगे। बेशक उनकी लोकप्रियता में अब पहले वाला जादुई फैक्टर नहीं रहा है, लेकिन उनके बरक्स कोई और नेता भी तो नहीं है, जो वैसा करिश्मा दिखा सके। इसलिए नरेन्द्र मोदी की हार की भविष्यवाणी करने से पहले राहुल गांधी को जमीनी सच्चाई ठीक से परख लेना चाहिए।

जहां तक बात 2019 के आम चुनाव की है, तो इसमें विपक्ष का एक होना और निस्वार्थ भाव से एक-दूसरे की मदद करना इतना आसान है नहीं, जितना बताया जा रहा है। अच्छी बात है कि अलग-अलग दलों के तमाम बड़े नेता एकता कायम करने की पहल कर रहे हैं, लेकिन जिस तरह अखिलेश यादव या मायावती ने बयान दे दिया है कि सीटों के बंटवारे आदि पर कोई मतभेद नहीं होगा, वैसी ही नीयत तमाम क्षत्रपों द्वारा अभी की जाहिर किया जाना बाकी है। मान लें विपक्षी दल इस बाधा को पार कर लेते हैं तो अगली बाधा भाजपा और उसके सहयोगी दलों की ओर से पेश की जाएगी।

एनडीए सत्ता में है और इसे बरकरार रखने के लिए वह हर मुमकिन कोशिश करेगी। एनडीए और भाजपा की मजबूती का जवाब विपक्षी गठबंधन किस तरह से देगा, यह देखना होगा। इस विपक्षी गठबंधन के सामने तीसरी बाधा जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय समीकरणों को ठीक-ठीक बिठाना होगा। कई छोटे-बड़े मुद्दे हैं, जिन पर ईमानदार और निष्पक्ष सोच सामने रखनी होगी, अन्यथा नेताओं के बीच मोल-भाव की गुंजाइश बढ़ेगी और उसका फायदा विरोधी उठाएंगे। इस वक्त देश में दलित मुद्दे पर विपक्ष लामबंद होकर भाजपा को घेर रहा है।

भाजपा के ही कुछ दलित सांसद उसका विरोध कर रहे हैं। दलितों पर अत्याचार, सांप्रदायिक सौहार्द्र और संसद न चलने देने पर कांग्रेस ने आज उपवास का ऐलान किया था, जिसमें राहुल गांधी खुद 1 बजे राजघाट पहुंचे, जबकि भाजपा से फिर कांग्रेस में आए अरविंदर सिंह लवली, हारून युसूफ और दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन सुबह छोले-भटूरे खाते दिखे। इसकी तस्वीरें वायरल होने पर लवली का जवाब था कि ये तस्वीर तो सुबह 8 बजे की है, उपवास तो 10 बजे से था। कहना जरूरी नहीं कि कांग्रेस के ऐसे नेता ही उसकी जड़ों को कमजोर करते हैं। वे लोग कुछ गंभीर मुद्दों पर उपवास जैसे गांधीवादी तरीके को अपना रहे थे या उसका मजाक उड़ा रहे थे। राहुल गांधी को इन्हें जरूर तलब करना चाहिए। अन्यथा इतने दिनों से वे कांग्रेस की छवि ठीक करने की जो कोशिशें कर रहे हैं, वह व्यर्थ हो जाएंगी।

देशबन्धु का संपादकीय

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