चीनी झालर के विरोधी भक्तों बताओ बैंक ऑफ चाइना का स्वागत करें या विरोध ?

जो सत्तर साल में नहीं हुआ वो अब हो रहा है..... हमारे बैंक कल्याणकारी राजनीति का शिकार हैं फिर भी मदद अमीरों की करते हैं...

चीनी झालर के विरोधी भक्तों बताओ बैंक ऑफ चाइना का स्वागत करें या विरोध ?

जो सत्तर साल में नहीं हुआ वो अब हो रहा है

राकेश अचल

बैंक ऑफ चाइना का स्वागत करें या विरोध ?

सीना छप्पन इंच का और फैसले ऐसे की माथा पीटने को मन होता है। देश को राष्ट्रीयता और देशभक्ति का पाठ पढ़ने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दत्तक भाजपा के नेतृत्व में चल रही सरकार ने अंतत: चीन के लिए भारत की अर्थव्यवस्था में घुसपैठ के लिए बैंक ऑफ चाइना को कामकाज का लायसेंस जारी कर दिया।

पिछले चार साल से संघ और भाजपा के आव्हान पर देश में चीनी उत्पादों के बहिष्कार का अभियान चला रहे राष्ट्रभक्त अब भौंचक हैं कि वे देश में खुलने वाली बैंक ऑफ चाइना की शाखा में अपना खाता खोलें या न खोलें ? चीन हमारा मित्र या शुभचिंतक देश है ये मानने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि जिस दिन से हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शिन पिंग को साबरमती के तट पर झूला झुलाया है तभी से चीन भारत की ऐसी-तैसी करने पर आमादा है।

चीन ने बीते चार साल में एक भी कदम ऐसा नहीं उठाया जिसे मैत्रीपूर्ण कहा जा सके, मानसरोवर यात्रा के लिए एक वैकल्पिक रास्ता खोलना इसका अपवाद है। चार साल में डोकलाम हुआ, हमारी सीमाओं में घुसपैठ हुई, हमारे पड़ोसियों और शत्रुओं की पीठ सहलाई गई सो अलग। इस सबके बावजूद भारत चीन का दबाब नहीं झेल सका और उसने बैंक ऑफ चाइना को भारत में काम करने की इजाजत दे दी।

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि बैंक ऑफ चाइना, चीन में काम करने वाले चार बड़े सरकारी बैंकों में से एक है। बाजूर पूंजीकरणक के लिहाज से यह दुनिया के बड़े बैंकों में शामिल है। चीन के इस बैंक की शाखांए दुनिया के सभी महादेशों में हैं। फिलहाल बैंक ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, आयरलैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर, जापान समेत कुल 27 देशों में काम करता है।

देश में कांग्रेस ने लम्बे समय तक शासन करते हुए वैश्वीकरण के बाद भी चीन को अपने यहां बैंक खोलने की इजाजत नहीं दी थी. गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने भी इसे राष्ट्र हित के खिलाफ माना और चीन के प्रस्ताव को ठण्डे बस्ते में डाल दिया था लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को पता नहीं बैंक ऑफ चाइना को भारत में लाते हुए राष्ट्रहित दिखाई दे गया ?

भारत सरकार ने बैंक ऑफ चाइना को भारत में प्रवेश की अनुमति उस समय दी है जब देश की बैंकिंग व्यवस्था अविश्वास के दौर से गुजर रही है। भारतीय बैंकों का अकूत पैसा लेकर भारत के बड़े व्यापारी फरार हैं या देश से बाहर जाकर रह रहे हैं। भारत में नोटबंदी के बाद तो भारतीय बैंको की जैसे कमर ही टूट गई। बैंकें अपने कामकाज में सुधार के बजाय परेशानी से घिरीं हैं। ऐसे में बैंक ऑफ चाइना क्या गुल खिला सकती है इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। चीनी बैंक भारतीय कारोबार को किस हद तक प्रभावित करेगी और इसका भारतीय अर्थ व्यवस्था पर क्या प्रभाव-दुष्प्रभाव पडेगा ये किसी ने अब तक देश को बताया नहीं है।

हमारे बैंक कल्याणकारी राजनीति का शिकार हैं फिर भी मदद अमीरों की करते हैं

भारत में बैकिंग हालांकि दो सौ साल पुरानी हो चुकी है, लेकिन इसे आज भी वो विश्वसनीयता हासिल नहीं है जो दुनिया के दूसरे बड़े देशों की बैंकों को है। हमारे यहां बैंकों के आधुनकीकरण की गति बेहद धीमी है। हमारी बैंकें कल्याणकारी राजनीति का शिकार हैं फिर भी मदद अमीरों की करतीं हैं। भारत में अभी पाँच तरह की बैंकिंग प्रणाली है। इसमें केंद्रीय बैंक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी बैंक, सहकारी बैंक और विकास/वित्तीय बैंक।

बैंकों के भ्रष्टाचार

भारत में बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भी बैंकें आम आदमी के सपनों में रंग नहीं भर पा रही हैं। बैंकों के भ्र्ष्टाचार ने आम जनता की नाक में दम कर दी है, ऐसे अराजक माहौल में एक अविश्वसनीय देश की बैंक को भारत में प्रवेश देना घातक ही नहीं राष्ट्रद्रोह का काम है। इसके नतीजे भविष्य में देश को भुगतना पड़ेंगे, लेकिन आप यदि भक्त वत्सल श्रेणी में हैं तो शौक से ''बैंक ऑफ चाइना” के भारत आगमन का स्वागत कर सकते हैं।

भारत में कितने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हैं

भारत में वर्तमान में 27 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक हैं, जिनमें से उन्नीस राष्ट्रीयकृत बैंक हैं और छह एसबीआई और उसके सहयोगी बैंक हैं, और बाकी दो आईडीबीआई बैंक और भारतीय महिला बैंक हैं। भारत में कुल 93 वाणिज्यिक बैंक हैं। ऐसे में यदि बाइक आफ चाइना न भी आती तो हमारे कामकाज पर कोई ख़ास फर्क पड़ने वाला नहीं था।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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