सहारनपुर हिंसा : जातीय दंभ छोड़ लोकतान्त्रिक मूल्यों को अपनाने से ही समाज आगे बढ़ेगा

​​​​​​​उन्नाव के विधायक ने जिस राजपूत लड़की के साथ बलात्कार किया उस लड़की के समर्थन में एक भी राजपूत महासभा या उनका नेता खड़ा नहीं हुआ। इससे अधिक शर्मनाक बात कुछ नहीं हो सकती...

Vidya Bhushan Rawat

विद्या भूषण रावत

सहारनपुर शहर में फिर से तनाव व्याप्त है। पिछले वर्ष शब्बीरपुर में ठाकुरों के जातीय उत्पीड़न के बाद हुए भीम आर्मी के विद्रोह से सहारनपुर शहर को दलितों की ताकत का अहसास हुआ था। हालाँकि ऐसा नहीं है कि उन्हें इसका पता नहीं था लेकिन जहाँ दलितों की राजनीतिक शक्ति में उत्तर प्रदेश में पिछले 20 वर्षो से लगातार इजाफा होता जा रहा है वही अधिकांश लोग ये भी मानते थे के राजनीतिक सत्ता को तो शीर्ष नेतृत्व को विश्वास में लेकर या राजनीतिक बैलेंसिंग को करने के लिए, आसानी से मैंनिपुलेट किया जा सकता है लेकिन सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर तो दलितों के विद्रोह का सीधे-सीधे उदाहरण फिलहाल उत्तर प्रदेश में नहीं था। इसका कारण यह भी था कि बसपा की राजनीति के कारण दलितों के बहुत बड़े तबका का राजनीतिकरण हुआ और उसकी संवैधानिक मूल्यों में आशा बढ़ी और उसने हिंसा के रास्ते को कभी नहीं अपनाया, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जब दलित में नए युवा अपनी बात रख रहे हैं, अपनी योग्यता का परिचय दे रहे हैं और इसलिए अब अपने अपमान को सहने के लिए तैयार नहीं है।

सहारनपुर में भीम आर्मी के प्रदर्शन से उत्तर प्रदेश में सत्ताधारियों और विपक्ष के नेताओं की राजनैतिक ‘असुरक्षा’ को बढ़ा दिया है क्योंकि जहाँ पर उन्हें अपनी परिपक्वता का परिचय देना चाहिए था उसका जवाब वे नए आरोपों और सधी चुप्पी से दे रहे हैं जो बेहद दुखद है। इस सवाल के विभिन्न पक्षों को हम बारी बारी से विश्लेषित करने की कोशिश करेंगे।

सबसे पहले तो उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को हिसाब देना होगा जिसने सहारनपुर में शब्बीरपुर के लोगों को न्याय देने के बजाय धमकाने का काम किया और दलितों के लिए लड़ रहे लोगों के उपर ही एफ़आईआर कर डाली। भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद अभी भी जेल में हैं और इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो मामलो में उन्हें जमानत दिए जाने के बावजूद भी प्रदेश सरकार ने उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की विभिन्न धाराओं में मुक़दमे ठोके हैं और उन्हें रिहा नहीं होने दिया। उनके अन्य साथी और भीम आर्मी के वर्तमान अध्यक्ष कमल वालिया भी जेल में हैं और दो दिन पूर्व ही उनके छोटे भाई सचिन वालिया की भी उनके घर के सामने गोली मार कर हत्या कर दी गई।

शब्बीरपुर के दलितों ने महाराणा प्रताप जयंती पर ठाकुरों के जुलूस को निकालने के विरुद्ध प्रशासन से अनुमति मांगी थी, लेकिन प्रशासन ने जानते हुए भी ऐसा किया और एक निर्दोष को उसके घर के सामने गोली मार दी गई। प्रशासन का कहना है कि मामला संदिग्थ है लेकिन प्रश्न इस बात का है कि जिस तरीके के वीडियो और सचिन की मौत पर अपने को ठाकुर कहने वालो ने वीडियो बनाए हैं वे शर्मनाक हैं।

पिछले कुछ वर्षों में जब से भाजपा का हिंदुत्व का एजेंडा चला है उसका सबसे अधिक लाभ चाहे ठाकुर युवाओं को मिला हो या नहीं लेकिन उनके नेताओं की तो मानो चांदी हो गई। उत्तर प्रदेश के अन्दर 2014 के ‘देशभक्ति’ के अभियान ने ब्राह्मण ठाकुर नेताओं को पुनर्जीवित किया। मुजफ्फरनगर के परीक्षण से ठाकुरों ने इस क्षेत्र में जाटों और गुर्जरों की राजनीति को भी किनारे कर दिया और शायद उनके नेताओं को ये लग रहा है कि आगे भी इसी प्रकार की ध्रुवीकरण की राजनीति करेंगें तो वो सत्ता की ओर ले जाएगी, लेकिन आज के इस राजनैतिक युग में जब दूसरी जातियां भी अपने अधिकारों के प्रति सतर्क हैं तो वे भी देर-सवेर सवाल करेंगी और अपनी हिस्सेदारी मांगेंगी। लेकिन कुछ समय से पूरे देश में खासकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि प्रदेशों में राजपूतों के युवाओं का अपनी ‘अस्मिताओं’ को लेकर प्रदर्शन दिखाई दिया। राजस्थान में महारानी पद्मावती को लेकर उन्होंने खूब तोड़फोड़ की और कुछ लोगों ने ये माना भी था कि व्यावसायिक लाभ के लिए अक्सर बम्बई के निर्माता निर्देशक ऐसा खेल खेलते हैं, लेकिन उन्नाव के बलात्कार के आरोपित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को लेकर जैसे उनकी बिरादरी ने प्रदर्शन किया वो शर्मनाक था। इसलिए क्योंकि जो प्रताड़ित महिला थी वह भी राजपूत जाति की बताई जा रही थी तो फिर उसका सम्मान कहाँ है। क्यों नहीं राजपूत युवाओं का खून उस महिला की इज्जत के खौला जिसको आरोपित विधायक ने अपनी दबंगई के चलते तार-तार किया। अब तो सीबीआई ने भी स्वीकारा है कि विधायक ने महिला के साथ बलात्कार किया लेकिन उत्तर प्रदेश के सरकार या भारत के केंद्रीय मंत्री अथवा उनके संस्कारी समर्थकों ने बजाए इसके कि मंत्री और नेता से सवाल करें, उलटे उनके समर्थन में आना शुरू कर दिया।

राजपूत नेताओं के ये समर्थक आज सड़कों पर उतर कर लठैती कर रहे हैं, भद्दी-भद्दी गालियां दे रहे हैं और जय राजपूताना या भारत माता की जय के साथ अपनी मूंछों को मरोड़ रहे हैं। किसी भी प्रश्न पर राजपूत नेता अपने समाज की आन-मान-मर्यादा के प्रश्न खड़ा कर दे रहे हैं, लेकिन ये प्रश्न भी समझ में आना चाहिए कि आखिर राजपूतों के आर्थिक हालत कैसे हैं ? क्या किसी नेता ने सवाल किया कि उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है, उनके बच्चे नौकरियों में हैं या नहीं, खेती के क्या हाल हैं आदि-आदि।

आज़ादी के बाद से ही राजपूतों को बड़े राजाओं और अपनी जाति पर गौरव करने के अलावा कुछ नहीं सिखाया। ज्यादातर जमीन जमींदारी उन्मूलन के समय चली गई। बचे खुचे जमींदार पार्टियों के नेता बन गए। राजाओं की जमीनों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन बाकी गरीबों के हालात ख़राब होते चले गए। नौकरी करने को तौहीन समझा गया इसलिए राजपूतों का भारत सरकार की नौकरियों में प्रतिशत बहुत कम है। अयोध्या के राम मंदिर आन्दोलन में में इतनी बड़ी संख्या में राजपूतों का संप्रदायीकरण नहीं हुआ जो आज है।

बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश में ऐसे राजपूत नेता थे जो हमेशा से सामाजिक न्याय और समाजवादी आन्दोलनों से जुड़े रहे। ये तो नहीं कहा जा सकता कि सबने जाति छोड़ दी, लेकिन ये जरूर था कि सभी आग उगलने वाले और गाली-गलौज की राजनीति वाले नहीं थे। उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर जैसे लोग भी थी जिनकी भाषा और दोस्ती दबंगई वाले लोगों से थी, लेकिन राजनीति में उन्होंने संवेदनशीलता से ही बात की। भाजपा में भैरों सिंह शेखावत, जसवंत सिंह जैसे नेता थे और उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह, जो वर्तमान में ठाकुरों के नाम पर नेतागिरी कर रहे लोगों से न केवल कद में अपितु व्यवहार और विचार में भी बहुत बड़े थे।

सामाजिक न्याय की राजनीति में विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। अपने छोटे से कार्यकाल में जिस ईमानदारी के साथ उन्होंने सामाजिक न्याय का प्रश्न राजनीति की मुख्यधारा बना दिया वो इतिहास में मील का पत्थर है। हालाँकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद उनकी जाति और अन्य सवर्णों ने उन्हें सिर्फ गालियाँ ही दी लेकिन इसके बावजूद जब भी भारत के बहुजन समाज के हितो का प्रश्न आएगा, विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजनीतिक क़ुरबानी को भी याद किया जाएगा। मंडल दो को लागू करवाने में कांग्रेस सरकार में अर्जुन सिंह की भूमिका को भी हमेशा याद किया जाएगा। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री के तौर पर शिक्षा को साम्प्रदायिकता से मुक्त करने के उनके प्रयास भी सराहनीय रहे हैं। मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह चाहे मीडिया में कितना ही बदनाम होते रहे हों लेकिन अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने मध्य प्रदेश में डाइवर्सिटी के एजेंडा को लागू करने की कोशिश की। कांग्रेस पार्टी के अन्दर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खुलकर बोलने वालो में दिग्विजय सिंह प्रमुख रहे हैं।

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख नेता रघुवंश प्रसाद सिंह भी सामाजिक न्याय और समाजवादी आन्दोलन के प्रमुख हिस्सा रहे हैं। इनमें से किसी भी नेता ने खुले तौर पर अपने जातीय वर्चस्व की बात नहीं कही। चुनावों में अपने क्षेत्रों में जरूर जातिगत खेल होते रहे हों, लेकिन न तो गाली गलौज की भाषा और न ही अपने मूल समाजवादी सेक्युलर चरित्र को इन सभी लोगों ने नहीं छोड़ा। लेकिन 2014 के चुनावों के बाद से ही भाजपा ने राजपूतों में उस तबके को प्रश्रय दिया जो अपनी जातीय अस्मिता के अलावा और कुछ नहीं देखे। योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम और उन जैसे आग उगलने वाले ठाकुर नेताओं को आगे करके भाजपा ने दरअसल ब्राह्मणवाद का बड़ा सुरक्षा कवच ढूँढा क्योंकि आज उत्तर प्रदेश में बाकी जातिया ठाकुरों की इस दबंगई के खिलाफ कड़ी होंगी।

चुनावो में वोट के लिए राजपूतों के अन्दर छद्म राष्ट्रवाद और फर्जी बड़प्पन की बात कर उनके असली सवालो को गौण कर दिया गया है। सवाल ये है कि आज के 21वीं सदी में बड़ी कौम कौन मानी जाएगी ? उसका उत्तर बहुत साधारण है। कोई कौम इस सन्दर्भ में बड़ी कही जाएगी कि उसका शिक्षा, स्वस्थ्य, विज्ञान, कानून, राजनीति, सिनेमा, खेल और साहित्य में क्या योगदान है। वंशवादी मनुवादी राजशाही के चलते अपनी मूंछों पर ताव रखने वाले अपनी कौम का सर्वे कराकर देखें कि उसकी हालत क्या है। उसके कितने अधिकारी हैं, कितने जज हैं, कितने पत्रकार हैं और फिर अपने पे गर्व करें। इन सभी क्षेत्रो में राजपूत बहुत पीछे हैं और उनके युवा अपने बदलाव के लिए कोई आन्दोलन भी करने को तैयार नहीं हैं। भ्रष्ट नेता इन युवाओं को कोई भी नया भविष्य नहीं दे सकते हैं, इसलिए उन्हें संघ परिवार का सिपाही बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके बहुत लाभ नहीं होने वाले। आज जब युवा नए क्षितिज की ओर जा रहे हैं, राजपूत युवा केवल नेताओं के लठैत की भूमिका निभाएंगे तो कहीं के नहीं रहेंगे।

राजा महांराजाओं, तिलिस्मों, मिथ आदि में गर्व करना तो बहुत आसान है क्योंकि जो लोग इनके सहारे ही हमें जीने के तरीके बता रहे हैं वे जानते हैं कि अगर समाज का कोई ‘महान’ राजा नहीं भी है तो ‘खबर’ और ‘इतिहास’ बनाने की व्हाट्सएप फैक्ट्री में वे इसे आसानी से तैयार कर सकते हैं जिससे वो युवा जिसे अपने रोजगार और साधनों के लिए रोजगार मांगना चाहिए था वो हिंदुत्व, जय श्री राम, जय राजपुताना और ऐसे ही नारे लगाता फिरता है।

करीब चार वर्ष पहले मैं बेहमई गाँव गया था। वहाँ मैं पहले भी गया था क्योंकि मैं फूलन देवी के गाँव शेखुपुरा, कालपी भी गया था। बेहमई ठाकुरों का वह गाँव है जहाँ ऐसा बताया जाता है कि डकैतों ने जो ठाकुर थे, फूलन का अपहरण करके यहाँ रखा था और फिर उनके साथ बलात्कार किया गया था और बताया जाता है कि गाँव के एक भी व्यक्ति ने उन्हें बचाने की कोशिश नहीं की जिसके फलस्वरूप ही फूलन बहुत आक्रोशित हुई थीं और फिर यहीं 14 फरवरी 1989 में उन्होंने और उनके साथियों ने अपने साथ हुए अत्याचार का बदला लेते हुए 20 राजपूतों की हत्या कर दी थी। देश भर में इन हत्याओं को लेकर बेहद शोर हुआ था। यहाँ की 20 विधवाओं को लेकर अखबारों में कई कहानियाँ लिखी गईं लेकिन एक महिला के साथ बातकर मुझे इस समाज की दकियानूसी परम्परा पर बोलने की इच्छा हुई।

14 फ़रवरी के हत्याकांड में लाल सिंह नामक युवक की मौत भी हुई थी जिसके उम्र करीब 12-13 वर्ष की रही होगी। उसकी सगाई पास के गाँव के मुन्नी से हुई थी, जिसकी उम्र नौ वर्ष की थी। लाल सिंह की मौत के बाद, मुन्नी के भाइयों ने अपनी बहिन को विधवा बनाकर बेहमई गाँव भेजा। इतने वर्षों के बाद मुन्नी को देखकर मुझे इस समाज की दकियानूसी परम्परा पर इतना क्षोभ हुआ कि व्यक्त नहीं कर सकता।

बेहमई के आस-पास 84 गाँव ठाकुरों के हैं और शादियाँ इन गाँवों में आपस में होती हैं। किसी ने विद्रोह किया तो उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ेगा। मुन्नी अपनी पूरी उम्र विधवा बन कर रही। क्या करे ऐसे भाइयों का जिन्हें रीति रिवाज ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है लेकिन अपनी बहिन की ख़ुशी नहीं।

राजपूत समाज में अभी भी महिलाओं की स्थिति बहुत ख़राब है। जो भी समाज रिजिड होगा और केवल पुरानी परम्पराओं में ही अपने शान समझता होगा तो वह औरतों की स्थिति बहुत ख़राब होगी। शायद यही कारण है कि उन्नाव के विधायक ने जिस राजपूत लड़की के साथ बलात्कार किया उस लड़की के समर्थन में एक भी राजपूत महासभा या उनका नेता खड़ा नहीं हुआ। इससे अधिक शर्मनाक बात कुछ नहीं हो सकती।

तलवार और लम्बे टीका लगाकर या गाली गलौज कर आप समुदाय के अंदरूनी हालात को छुपा नहीं सकते। राजपूतों को चाहिए कि ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, भूमिहार आदि से अपनी तुलना करें और देखें कि विकास के इंडेक्स में वे कहाँ हैं। संघ के चालाक ‘इतिहासकार’ उनके बच्चों का ध्यान बंटाने के लिए दलितों और पिछड़ों के आरक्षण को इसके लिए दोषी ठहरा देंगे, लेकिन इससे बड़ा झूठ कुछ नहीं हो सकता।

आज राजपूतों की पुरानी शान का मोहरा बनाकर संघ परिवार में उनके पिछलग्गू नेता मात्र ब्राह्मणवाद की सेवा में समर्पित हैं और समाज के ज्वलंत प्रश्नों का उन्हें पता भी नहीं है। किसी भी समाज के नायक वो होते हैं, जिन्होंने समाज में गरीब से गरीब तबके को बराबरी पर लाने के लिए संघर्ष किया हो या समाज बदलाव में कोई योगदान किया हो। इतिहास से हम सबक सीख सकते हैं, उसमें रहते नहीं हैं।

याद रहे कि जितने भी राजा महाराजा थे वे अपनी लड़ाई लड़ रहे थे और अपने हितों के अनुसार ही मुगलों के दोस्त और दुश्मन बने। खानदान में एक उनके साथ रहा तो दूसरे मुगलों के साथ खड़ा रहा और सबके अपने हित थे इसलिए उस दौर के राजाओं के आपसी खींचतान को आप वर्त्तमान परिपेक्ष्य में हिन्दू मुसलमान की लड़ाई में बदलकर अपना राजनैतिक एजेंडा तो चला लोगे लेकिन ये बहुत समय तक चलने वाला नहीं है। जैसे अपना इतिहास आप बना रहे हैं वैसे ही और भी जातियाँ अपने अपने नायक गढ़ रही हैं और इन सबसे केवल कुछ लोगों का एजेंडा काम कर रहा है, जिन्हें हम पुरोहितवादी पूंजीवादी शक्तियाँ कह सकते हैं क्योंकि इसकी आड़ में उन्होंने अपने परम्परागत और पुश्तैनी धंधों को मज़बूत कर दिया है।

दलितों ने तो व्यवस्था से सवाल पूछना शुरू किया और ब्राह्मणवादी परम्पराओं को नकार कर अपना रास्ता अपना लिया। पिछड़े भी अब सीख रहे हैं और अपनी राजनीति स्वयं कर रहे हैं, तो आप क्यों नहीं इतिहास और मिथ को चुनौती देते ? क्यों आज परशुराम जयंती मनाई जा रही है जिसने क्षत्रियों की 21 पीढियों को समूल नष्ट कर देने की बात कही ? आज सड़ी-गली परम्पराओं को महिमामंडन किया जा रहा है, क्योंकि बदलाव से डर लग रहा है।

नेताओं का क्या वे तो ऐसे खेल खेलेंगे। नौकरियाँ ख़त्म हैं, लेकिन अपने समाज के हाथ में एक छुन्छूना पकड़ा देंगे कि सरकारी नौकरियाँ देंगे और फिर वोट की खातिर समाज को सड़कों पर उतार देंगे। आज के बदलते युग में ये घिसी-पिटी बाते हो चुकी हैँ, जिससे समाज का भला होने वाला नहीं। समय है कि युवा लोग अपने में बदलाव लाएं और सामाजिक न्याय की शक्तियों के साथ जुड़ें। जनतंत्र की सफलता विभिन्न जातियों, धर्मों आदि में केवल राजनैतिक सहयोग की नहीं अपितु सामाजिक गठबंधन में भी निहित है। पुराने राजे-महाराजे आधारित वंशीय और जातीय दंभ समुदाय के नेताओं को भी कुछ समय तक ही ताकत देगा, लम्बे दौर में ऐसे नेता बेकाम रहेंगे और समाज ने अगर अभी से ये दंभ छोड़ कर अन्य मुख्य प्रश्नों में दूसरे लोगों के साथ राब्ता कायम नहीं किया तो एक समय आएगा जब सारी दूसरी जातियाँ आपके खिलाफ खड़ी दिखाई देंगी और वो सबसे भयावह स्थिति होगी। सत्ताधारियों की जातीय उदंडता के विरुद्ध उत्तर प्रदेश की जनता ने हमेशा विद्रोह किया है, इसलिए भलाई इसी में है कि मानवीय मूल्यों के लेकर समाज में सामंजस्य बनाया जाए और स्थानीय स्तर पर राजनैतिक गठबंधन बने लेकिन वो किसी समुदाय के विरुद्ध न हो। राजनैतिक लड़ाई लड़ते वक़्त आपसी रिश्ते इतने न ख़त्म कर दो कि मिलने में दिक्कत हो। आप अपने पड़ोसी को नहीं बदल सकते और उनके साथ अच्छे रिश्ते बनाकर ही आप सुरक्षित रह सकते हैं। ये सोच कर कि अपनी ताकत दिखाकर पड़ोसी को झुकाकर या भागकर आप चैन से रह पाएंगे तो ये ग़लतफ़हमी में कोई समाज न रहे। इस देश में साथ रहने और एक जुट रहने की एक ही गारंटी है कि संविधानिक मूल्यों का ईमानदारी से पालन हो और ईमानदारी बिना भागीदारी के नहीं आ सकती, लेकिन कोई ये सोचे कि एक समाज को समाप्त कर या अपमानित कर उनकी जिंदगी आसान हो जाएगी तो उस पर कोई भी समझदार व्यक्ति हँस ही सकता है।

सहारनपुर के घटनाक्रम ने जहाँ सत्ताधारी दल और सरकार की असफलता को उजागर किया है वही इसने सामाजिक न्याय और अम्बेडकरवाद का झंडा उठाने वालो को भी सोचने पर मजबूर किया है। आखिर ये पार्टियाँ इस प्रश्न पर सहारनपुर के दलितों के साथ क्यों खड़ी नहीं दिखाई देतीं ? बहुत से लोग सोशल मीडिया पर कह रहे हैं कf योगी आदित्यनाथ साल के आखिर में चंद्रशेखर आज़ाद को रिहा कर देंगे ताकि वह बहिनजी के खिलाफ चुनाव लड़े या बसपा को नुक्सान पहुचाए। ये बहुत ही निराशाजनक बात है क्योंकि चुनाव लड़ने की बात तो बाद में आएगी आखिर चंद्रशेखर के खिलाफ जो आरोप लगे हैं वे तो पूरे फर्जी हैं और उसके साथ अन्याय हुआ है। भीम आर्मी के लोग जेल में भेजे जा रहे हैं इसलिए जो भी राजनीतिक पार्टियाँ हैं उन्हें समझदारी दिखाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर दवाब डालना चाहिए के वे सारे मुकदमे वापस ले।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी इस मामले में चुप रहे हैं, शायद इसलिए कि भाजपा का चालाकी का दांव में नहीं फंसे। लेकिन ये राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं की असफलता है यदि हम ऐसे प्रश्नों पर ईमानदार बहस नहीं कर सकते। दलितों पर हो रहे अत्याचार का प्रश्न मात्र दलितों का सवाल नहीं है, ये मात्र राजनैतिक हिसाब-किताब का सवाल भी नहीं है अपितु मानवाधिकारों और संविधान की सर्वोच्चता का प्रश्न भी है क्या इस देश में कानून का शासन चलेगा या मनुवाद चलेगा।

भाजपा और संघ परिवार ने इस देश के ताने-बाने को और नकारात्मक किया है और राजनीतिक दलों पर बहुत दवाब डाला है। उनकी लगातार कोशिश रही है एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके विभाजन का राजनैतिक फायदा उठाया जाए। उनके पास ऐसे दबंगों की फौज है चाहे वह बिकाऊ मीडिया हो या तथाकथित बुद्धिजीवी। हम जानते हैं कि दूसरी पार्टियाँ उनके इन विभाजनकारी सवालोँ का जवाब देने में असफल रहे हैं। सहारनपुर में पार्टियों को सवर्णों के वोट का खतरा है, लेकिन हम उनसे ये कहना चाहते हैं अपनी पार्टियों के सभी जातियों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को बैठाकर इन प्रश्नों पर चर्चा कीजिए। अगर भाजपा तोड़ती है तो आप जोड़िए और सभी पक्षों को सामाजिक तौर पर साथ ला कर बात कीजिए लेकिन इसकी एक ही शर्त होगी कि छुआछूत और जातीय सर्वोच्चता में यकीं करने वालों के साथ तो कोई बात नहीं हो सकती।

सहारनपुर का घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र में दबंगों की बढ़ती ताकत की कहानी भी है। ऐसी घटनाएं जानबूझकर फैलाकर पूरे प्रदेश में अराजक दबंको को राजनीति में घुसाने की तैयारी है और इसका दूसरा इलाज़ केवल सामाजिक न्याय की शक्तियों को आपस में साथ रहकर, अपनी लड़ाई मिलजुलकर लड़ने में ही है।

विभाजनकारी ताकतों को आंबेडकर, फुले, पेरियार के सांस्कृतिक परिवर्तनवादी ताकते ही शिकस्त दे सकती हैं। उत्तर प्रदेश में राजनैतिक तौर पर तो इन ताकतों ने अपनी मौजूदगी का एहसास करवाया है लेकिन सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन में जब ऐसी शक्तियाँ सभी दबी कुचली जातियों को एक कर देंगी तो ब्राह्मणवादी वर्चस्ववादी ताकतें अपने आप ही नेस्तनाबूद हो जाएँगी और तभी उनसे प्रताड़ित सभी लोगों सामाजिक और सांस्कृतिक लोकतंत्र की खुली हवा में सांस ले पाएंगे।

लड़ाई बहुत लम्बी है लेकिन असंभव नहीं है, केवल आवश्यकता बौद्धिक ईमानदारी की है। सहारनपुर में दलितों पर हुए अपराधों की जाँच हो और मुझे ये बात कहते हुए कोई गलत नहीं लगता कि भीम सेना के सभी कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए और उनपर ठोके गए फर्जी मुकदमे सब वापस लिए जाएँ और ये बात की मांग करने में अगर राजनैतिक दलों को झिझक हो रही है तो फिर इससे बड़ी शर्मनाक बात कोई नहीं हो सकती।

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