माफ़ कीजिए मैं खाप-पंचायत का हिस्सा नहीं ! फासीवादी हथियारों से नहीं हो सकता फासीवाद का मुकाबला

‘गौरी लंकेश की हत्या’ और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वामपंथी छात्रों की अलगाववादी दृष्टि..... मूर्खता की सीमा का उल्लंघन करके वामपंथी होने का कम से कम भ्रम तो मत तोड़िए.......

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

याद रहे कैंपस के बाहर बहिष्कार करने के सारे यंत्र आज संघ के पास हैं. जहाँ आपने मुंह खोला नहीं कि पाकिस्तान भेजने की योजना बनने लगती है. आपने खाप पंचायत को ठीक से अनुभव नहीं किया है. खाप पंचायत ही बहिष्कार किया करती है. तो इसी अस्त्र से आप लड़ने वाले हैं जिस अस्त्र को आपको उठाना तक नहीं आता और जिसे चलाने में वे किसी से भी प्रवीण हैं. मूर्खता की सीमा का उल्लंघन करके वामपंथी होने का कम से कम भ्रम तो मत तोड़िए.

संजीव ‘मजदूर’ झा

समाज जब अलगाव और दोषारोपण के दौर से गुजरने लगता है तब हमें एक पल ठहरकर यह सोचना चाहिए कि जिस लक्ष्य को साधने के लिए हम संगठित होकर, जिस रास्ते का अनुकरण कर रहे हैं, क्या वह रास्ता उसी मंजिल तक पहुँचता है जिसे पाने की राह और चाह में हमने अपने हजारों लोग गंवा दिए? ऐसे में साध्य और साधन दोनों पर विचार करना जरुरी हो जाता है. गांधी से लेकर भगत सिंह और माओवाद से लेकर जयप्रकाश तक के वैचारिक विविधताओं की एक लंबी परंपरा की विरासत के बावजूद यदि हम प्रतिरोध के फूहड़ और प्रतिक्रियावादी रवैये अपनाते हैं तो स्वाभाविक रूप से यह दुखद है.

मैंने बार-बार इस प्रश्न को मजबूती से उठाने का प्रयास किया है कि दमन का प्रतिवाद दमन नहीं हो सकता है. मैं सशस्त्र क्रांति और हिंसा के बीच के भेद को पहचानता हूँ. लेकिन यहाँ न तो क्रांति है और न ही कोई संरचनात्मक कार्यक्रम.

मैं बात करना चाहता हूँ ‘गौरी लंकेश की हत्या’ और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के वामपंथी छात्रों की अलगाववादी दृष्टि पर.

वर्तमान छात्र कल देश के भविष्य हैं, इसलिए सामान्य स्तर पर देखा जा सकता है कि समाज के एक बहुत बड़े तबके की दृष्टि कॉलेज-विश्वविद्यालयों पर टिकी रहती है ताकि बदलाव के संकेत को महसूस किया जा सके. लेकिन विश्वविद्यालय मतलब जे. एन. यू ही तो नहीं होता है? उसका मतलब हिंदी विश्वविद्यालय भी होता है.

मैं आज तक यह नहीं स्वीकार पाया हूँ कि छात्रों की धारा को अलग रख कोई विश्वविद्यालय अपनी पहचान कैसे बना सकता है. ऐसा नहीं है कि जे. एन. यू के छात्र नेता इन विश्वविद्यालयों पर अपनी नज़र नहीं रखते हैं, वे अपनी पूरी दृष्टि बनाए रखते हैं बावजूद इसके सत्ता-प्रतिष्ठानों और बीच की दूरी का लाभ उठाते छात्र या तो गुमराह होते दिखते हैं या उनकी शैली ठीक उसी रूप में विकसित होने लगती है जिस शैली के विरोध में वे अपना मोर्चा खोलते हैं.

गौरी लंकेश की निर्मम हत्या की गई. इस हत्या का विरोध हर सूरत में की जानी चाहिए. इस मामले में उन लोगों का भी विरोध किया जाना आवश्यक है जो इन हत्याओं का समर्थन कर रहे हैं. लेकिन यहाँ जरा ठहरिए और सोचिए कि क्या जिस तरह से हत्या के पक्ष के मोदीनुमा संस्कृति पर बल जरूरी है ठीक वैसा ही उन बच्चों के विरोध में भी किया जाना आप जरुरी समझेंगे जो बच्चे एक खास किस्म के संस्कार के तहत संघ-शिविरों में भेज दिए गए हैं? नहीं दोनों स्तर पर एक जैसा विरोध हमें इकहरा बना देगा. इसलिए इस पर विचार जरुरी है.

संघी सोच और वामपंथी छात्रों की भूमिका

अब जरा इस घटना पर संघी सोच और वामपंथी छात्रों की भूमिका पर विचार करते हैं. गौरी लंकेश की हत्या पर एक युवा छात्र संघ-समर्थक ने इस हत्या पर ख़ुशी जाहिर करते हुए abvp के छात्र जो हत्या के विरोध में केंडल मार्च निकाल रहे थे, उसका विरोध भी किया. स्वाभाविक है उस युवा छात्र का विरोध होना, सो हुआ. लेकिन जब तक उससे संवाद की कोई व्यवस्था बनाई जाती तब तक यहाँ के वामपंथी छात्र हरकत में आए. उन्होंने उस छात्र की तस्वीर को सोशल-मीडिया में घुमाना शुरू किया, सामाजिक बहिष्कार के लिए विश्वविद्यालय के सभी छात्रों से अपील किया और ये सब करने के बाद उस पर भद्दे-भद्दे कमेंट किए गए. प्रतिक्रिया में उस छात्र ने भी संवाद की उसी भाषा में जवाब दिया जिसे वामपंथी छात्रों ने चुना था. लगभग ४०-५० छात्रों द्वारा उससे सवाल किया जाता और वह अकेले जवाब देता. बीच-बीच में उसे चाटुकार है, शराब लाता है, उसकी माँ और बहन से बात की जाए और उसके साथ भी हिंसा हो सकती है, जैसे तर्कों से उस पर प्रहार करने की कोशिश की गई.

इतना ही नहीं कुछ बिचौलिए जो छात्र जीवन से निकल चुके हैं लेकिन शिक्षक जीवन में प्रवेश नहीं कर पाए, जिन्होंने किसी पार्टी की सद्दस्यता इसलिए हासिल नहीं की क्योंकि हर पक्ष से लाब उठाया जाए या उनके अन्दर अपने ही विचारों के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव हो ऐसे शूरवीर ने एक पूरा झुंड उस पर प्रहार करने को तैयार किया ताकि उसे ख़ारिज करवाया जा सके. उन्होंने उस छात्र के विभाग में शिकायत की और ऐसी परिस्थिति बनाने की कोशिश की जिससे उसे फ़ौरन विश्वविद्यालय से हटाया जा सके. और तो और कुछ स्त्री-वादियों ने उसे केस की धमकी भी दी. हाँ उन धमकियों में भी वे साथी कहना नहीं भूलते थे. हालांकि वे ये भूल चुकी थी कि वे जिस तरीके का प्रयोग कर रही हैं उससे साथ लेने या साथी बनाने के सारे मार्ग बंद हो जाते हैं.

कुल मिलाकर भाषा वही थी जो भाषा संघ के दफ्तरों से प्रायोजित होते हैं. उन सभी ने यह विचार तक नहीं किया कि क्या संवाद के तहत इस स्थिति से निपटा जा सकता है.

अब इसका दूसरा पक्ष भी था वह यह कि स्वयं abvp उस संघ समर्थक छात्र का किसी प्रकार सहयोग नहीं कर रहा था. क्या यह ध्यान देने योग्य बात नहीं थी? और तो और कुछ छात्रों ने उस युवा छात्र के बीते एक वर्ष में जिन-जिन लोगों के साथ तस्वीरें थी उसको भी घुमाया गया. उसमें ऐसे भी थे जो संघ के किसी भी एक्टिविटी में सिर्फ शामिल ही नहीं बल्कि विरोधी भी थे, उन्हें संघी घोषित करने की अपील भी की गई.

अब जरा ध्यान दिया जाए कि क्या इस तरह के सामाजिक बहिष्कार से आप मजबूत हो रहे हैं या उस विचारधारा को मजबूत कर रहे हैं जिनसे आपकी लड़ाई है. क्रांति के न जाने किस किताब से सामाजिक बहिष्कार की परिभाषाएं गढ़ ली गई हैं. इसी बहिष्कार का नतीजा है कि पिछले 5 वर्षों में आपकी संख्या का गणित आरोही नहीं हो पाया और आप जिसका विरोध कर रहे हैं इसी विश्वविद्यालय में उनकी संख्या आपसे अधिक बढती गई. घूँघट डाल कर चीजों को देखने से दिखाई देना बंद होता है न कि वास्तविकता खत्म होती है. तस्वीर घुमाने की व्यवस्था को लगभग आप लोगों ने 3 वर्ष पहले भी किया था. कैंपस में तस्वीर लगाई जाए और उसकी इज्जत को इतना उछाला जाए कि कल को वह लड़का बेरोजगारी और अवसाद में आत्म-हत्या कर ले. कौन था वह लड़का और क्या हुआ अंत में? क्या वह संघी था? क्या उसका लेखन संघ को मजबूत कर रहा था? नहीं, आप एक शब्द नहीं ढूंढ पाएंगे जिसमें उसने संघ का विरोध न किया हो जो या तो आप देखना नहीं चाहते थे या आपकी राजनीति ही कुछ और है. यही कारण रहा कि जितने लोगों ने उस लड़के के बहिष्कार की बात उठाई उससे कहीं बड़ी आबादी ने उसका समर्थन किया. तो बहिष्कृत आप हुए या वो. और न्यायिक-प्रक्रिया से जब वह जीतकर वापस आया तब क्या आपने कुछ महसूस किया? ध्यान रखिए और गनीमत समझिए कि वामपंथ की विचारधारा में ही यदि वह ताकत न होती कि बुरे दौर में कैसे अपने पैरों पर टिककर खड़ा रहा जाता है तो आपलोगों ने वामपंथियों को संघी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. और यदि ऐसा करके आप विश्वविद्यालय पर अपनी पकड़ बना भी लेते हैं तो कैंपस के बाहर आपकी क्या स्थिति होने वाली है इसका अंदाजा भी नहीं है. याद रहे कैंपस के बाहर बहिष्कार करने के सारे यंत्र आज संघ के पास हैं. जहाँ आपने मुंह खोला नहीं कि पाकिस्तान भेजने की योजना बनने लगती है. आपने खाप पंचायत को ठीक से अनुभव नहीं किया है. खाप पंचायत ही बहिष्कार किया करती है. तो इसी अस्त्र से आप लड़ने वाले हैं जिस अस्त्र को आपको उठाना तक नहीं आता और जिसे चलाने में वे किसी से भी प्रवीण हैं. मूर्खता की सीमा का उल्लंघन करके वामपंथी होने का कम से कम भ्रम तो मत तोड़िए.

सोशल साईट पर गौरी लंकेश की हत्या का समर्थन कर रही एक युवती के साथ मेरे कई घंटे संवाद का परिणाम निकला की उसने यह स्वीकार किया कि हत्या किसी की भी नहीं होनी चाहिए. इतना हुआ ही था कि लौटकर देखता हूँ तो मेरे 30-35 वामपंथी मित्र एक युवा संघ समर्थक से क्षत-विक्षत हो चुके थे. कारण था वर्धा के वामपंथी मित्रों का अहंकारी भाषा और फासीवादी घोषणाएं. इन घोषणाओं में मिली हार के बाद मुझसे यह कहा गया कि मैं भी उस अपील का हिस्सा बनूँ जिसमें उसे बहिष्कृत किया जा रहा था.

मुझे यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं की मैंने इससे साफ़ मना कर दिया. मैंने ऐसा इसलिए भी किया कि अपने कॉलेज के दिनों में मेरे ऐसे कई साथी थे जो संघ से थे और कुछ वर्षों बाद वे वामपंथी हो गए. स्वाभाविक है इससे मुझे बदलाव की प्रक्रिया में विश्वास जगा. इसलिए यहाँ भी मैंने भाषा का अध्ययन किया. इस युवा छात्र और उस युवती दोनों की भाषा में स्पष्ट रूप से हत्या के पक्ष में समर्थन होते हुए भी बदलाव की उम्मीदें बची थी.

ध्यान रखना चाहिए कि हत्या एक विकृत मानसिकता की उपज है तो उसका समर्थन उस विकृति की परंपरा है. आप हत्यारों से जल्दी मुक्ति पा लेंगे लेकिन यदि यह परंपरा बन जाए तो मसला इतना आसान नहीं होगा. फिर बात उठती है युवाओं की जिसे बड़े स्तर पर दुष्प्रचारित कर गलत रास्तों पर भटकाया जा रहा है. इसलिए जरुरी इस बात की है कि संवादहीनता की स्थिति न बने इसका ख्याल रखा जाए. संवाद अंत तक कायम रखा जाना चाहिए और यही कारण है कि उस युवा ने भी अंत में लिखा— मैं किसी भी हत्या का समर्थन नहीं करता हूँ, लेकिन मैं उनका भी समर्थन नहीं करता हूँ जो मुझे जबरन कुछ भी मनवाने की चाहत रखते हैं. और जो किसी की भी हत्या पर जश्न मनाते हैं या मनाते रहे हैं, मैं उनका भी विरोध करता हूँ."

वर्धा विश्विद्यालय के नौजवान वामपथियों (सभी नहीं) को यह समझने की जरूरत है कि कोई आपका गुलाम नहीं है. और आपको जो जवाब दिया गया है वह एक प्रतिक्रिया है जिसको सुनने की स्थति भी आपने ही पैदा की है. इसलिए इस पर हाय तौबा मचने से कुछ भी नहीं हो सकता है.

ध्यान रहे हिंसा और घृणा या बहिष्कार से युवाओं को भड़काया जा सकता है और संवाद से जे. एन. यू. बनाया जा सकता है और आप जैसों संवादहीन तथाकथितों से डी.यू बनाया जाता है. क्या स्थिति है दिल्ली विश्वविद्यालय की इसका अंदाजा भी है? वहां आप बहिष्कृत हैं और वह जे .एन .यू. के 7-8 हजार की संख्या का विश्वविद्यालय नहीं बल्कि लाखों का गढ़ है. वहां के कई कॉलेजों में आज भी वाम छात्र संगठनों को गेट से भगा दिया जाता है. मैं यह दंश कई बार झेल चुका हूँ इसलिए मैं इसका विरोधी हूँ और इसीलिए इस दंश को फ़ैलाने से मैं आपको बार-बार रोकने की कोशिश करूँगा.

फासीवादी हथियारों से नहीं हो सकता फासीवाद का मुकाबला

फासीवाद का मुकाबला फासीवादी हथियारों से नहीं हो सकता इस बात को समझने की जरुरत है साथ ही इस बात को भी तार्किक ढंग से समझने की जरुरत है कि—“ गौरी लंकेश के विचारों को, भाषा को अपनाकर फासीवाद की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है, बल्कि फासीवाद के विरोध में गौरी लंकेश की हत्या को बचाया जरुर जा सकता है.”

मैं हिंदी विश्वविद्यालय के वामपंथी इकाई के इस प्रयास और इस भाषा का विरोध करता हूँ और साथ ही यह अपील भी करता हूँ कि आप अपने तरीकों पर पुनः विचार करें अन्यथा आपके कारण एक सामाजिक विचारधारा को गहराई तक ठेस पहुँचती है और उसकी व्यापकता भी कमजोर होती है. 

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