प्रेस की आज़ादी : क्या योगी और वसुंधरा भी प्रधानमंत्री की नसीहत से सबक लेंगे !

मीडिया की भूमिका को एक बार फिर रेखांकित करके नरेंद्र मोदी ने अपने राजधर्म का पालन किया है। ऐसा लगता है कि उन्होंने राजस्थान की सरकार द्वारा मीडिया को घेरने की कोशिश को भी एक सन्देश दिया है।...

हाइलाइट्स

संविधान में लिखा है कि 'अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमानना, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।'दिलचस्प बात यह है कि संविधान के प्रावधान और सुप्रीम कोर्ट की समय-समय पर आई व्याख्याओं के बाद यह सारी बातें तय हो चुकी हैं फिर भी सरकारें कभी-कभी मीडिया पर नकेल लगाने की कोशिश करती रहती हैं।

पत्रकारिता के बुनियादी सवालों पर नए विचार की ज़रूरत

शेष नारायण सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेन्नई में एक तमिल अखबार के कार्यक्रम में मीडिया को समाज को बदलने का साधन बताकर अभिव्यक्ति की आजादी को फिर चर्चा में ला दिया है।

प्रधानमंत्री ने चेन्नई में कहा कि 'आज समाचारपत्र सिर्फ खबर ही नहीं देते, वे सोच को गढ़ते हैं और दुनिया के लिए खिड़की खोलते हैं।' व्यापक संदर्भ में देखें तो मीडिया समाज को बदलने का साधन है। इसलिए हम मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा बोलते हैं।

'प्रधानमंत्री के इस बयान से उस संभावना को बल मिलेगा कि कोई राज्य सरकार दंड संहिता में थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके मीडिया का गला दबाने की कोशिश करने में संकोच करेगी।

मीडिया की भूमिका को एक बार फिर रेखांकित करके नरेंद्र मोदी ने अपने राजधर्म का पालन किया है। ऐसा लगता है कि उन्होंने राजस्थान की सरकार द्वारा मीडिया को घेरने की कोशिश को भी एक सन्देश दिया है।

प्रधानमंत्री के मीडिया संबंधी विचार से उत्तर प्रदेश सरकार को भी सबक लेना चाहिए। वहां भी सरकार की लगातार आलोचना कर रहे फ्रीलांस पत्रकार चंचल को उनतालीस साल पुराने एक मामले में पकड़कर जेल में डाल दिया गया। उनके ऊपर 1978 में उनके गांव के पास एक थाने में किसी मैजिस्ट्रेट से कहा-सुनी के बाद चुपचाप केस दर्ज का लिया गया था, जिसको अब झाड़-पोंछ कर निकाला गया है। जानकार इस केस को मीडिया को अर्दब में लेने की कोशिश बता रहे हैं। जिस मजिस्ट्रेट को उन्होंने 1978 में डांटा था, वह तो कब का रिटायर हो चुका होगा इसलिए इस मामले को लखनऊ के किसी आला हाकिम की कारस्तानी बताया जा रहा है।

चंचल को दफा 353 में बंद किया गया, जिसको बर्तानिया हुकूमत ने अपने कर्मचारियों का दबदबा बनाये रखने के लिए बनाया था, जबकि सरकारी कर्मचारी को पब्लिक के गुस्से से बचाने के लिए उसी ताजीरात हिन्द की दफा 186 ही काफी है।

बहरहाल प्रधानमंत्री के मीडिया संबंधी बयान के बाद जौनपुर और लखनऊ के मातहत अमले को सबक लेना चाहिए वरना दिल्ली नाराज हो सकती है।

भारतीय दंड संहिता की दफा 353 को और खूंखार बनाने के लिए ही राजस्थान में कुछ और बदलाव की पेशकश की गयी है। बिल विधानसभा में पेश कर दिया गया है, इस बिल को देखकर लगता है कि मुख्यमंत्री ने अपने भ्रष्ट अधिकारियों के कुत्सित कारनामों को छुपाने के लिए यह योजना बनाई है। इसमें प्रावधान है कि सरकार की मंजूरी के बिना जज, मैजिस्ट्रेट,और अन्य सरकारी कर्मचारियों के उन कामों की जांच नहीं की जा सकती जो उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाते समय किया हो। सबको मालूम है कि सरकारी बाबू सारे भ्रष्टाचार ड्यूटी के समय ही करते हैं। जब तक भ्रष्टाचार की जांच के लिए सरकार की मंजूरी नहीं मिल जाती तब तक मीडिया भी आरोपों के बारे में रिपोर्ट नहीं कर सकता। इस मंजूरी में छ: महीने लग सकते हैं। राजस्थान सरकार की नीयत का पता लग जाने पर जब हल्ला हुआ तो मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है लेकिन लगता है कि अब दफन ही करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र के चौथे खम्भे को महत्वपूर्ण बताकर राज्य सरकारों को भी चेतावनी देने की कोशिश की है।

ज़रूरत इस बात की है कि मीडिया की आजादी पर नए सिरे से व्यापक बहस की शुरुआत की जाए। भारत के संविधान में प्रेस की आजादी की व्यवस्था है। संविधान के अनुच्छेद 19(1) (ए) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की व्यवस्था दी गई है, प्रेस की आजादी उसी से निकलती है। सुप्रीम कोर्ट के 1962 के सकाल पेपर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम यूनियन आफ इण्डिया के फैसले में प्रेस की अभिव्यक्ति की आजादी को मौलिक अधिकार के श्रेणी में रख दिया गया है। लेकिन इस आजादी पर नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था भी है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) में उसकी सीमाएं तय कर दी गई हैं।

संविधान में लिखा है कि 'अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमानना, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।’

दिलचस्प बात यह है कि संविधान के प्रावधान और सुप्रीम कोर्ट की समय-समय पर आई व्याख्याओं के बाद यह सारी बातें तय हो चुकी हैं फिर भी सरकारें कभी-कभी मीडिया पर नकेल लगाने की कोशिश करती रहती हैं। कोई भी नेता या अफसर मीडिया के कर्तव्यों पर उपदेश देता मिल जाएगा। इसलिए जरूरी है कि संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता बनाने वाले कुछ कानूनी इंतजाम कर दिए जाएं।

सबको मालूम है कि मीडिया के सामने आज कितनी ज़रूरत चुनौतियां हैं। देखा यह गया है कि ज़्यादातर लोग अपनी समस्याओं के हल के लिए मीडिया से उम्मीद लगाये बैठे रहते हैं। इसी हफ्ते दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में एक संगोष्ठी में जाने का अवसर मिला। वहां एक प्राध्यापक महोदय ने मीडिया को नसीहत दी और कहा कि आप लोगों को ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिससे संस्कृत भाषा और साहित्य के साथ-साथ उसमें निहित संस्कृति को भी विश्वविद्यालयों में ज्यादा से ज्यादा पढ़ाया जाए और टेलिविज़न कार्यक्रमों में स्थान मिले। उसी सेमिनार में यह कहा गया कि समाचार तभी बनता है जब किसी विषय पर कुछ नया हो। दुर्भाग्य यह है कि शिक्षक बिरादरी कुछ भी नया करने को तैयार नहीं है और उम्मीद की जाती है कि जो बहुत पहले संस्कृत में लिख दिया गया था, उसको आज भी चर्चा में मीडिया ही लाए। इसलिए ज़रूरत है कि शिक्षा और शोध के काम में लगे लोग उच्चकोटि के शोध आदि करें तभी मीडिया उसको अपने कार्यक्रमों में स्थान दे पायेगा। इस साधारण सी बात पर संयोजक जी नाराज हो गए। इस तरह की घटनाएं रोज ही होती रहती हैं। एक तरफ तो शासक वर्ग मीडिया से अपनी ढपली बजवाने पर आमादा रहता है और दूसरी तरफ जनता चाहती है कि उसकी सभी आवश्यकताएं मीडिया पहचाने और उसको सरकार की जानकारी में लाये और उसका निदान करवाए।

इन चुनौतियों के बीच मीडिया को काम करना पड़ता है। यह तो मामूली सवाल हैं जिनको आसानी से हल किया जा सकता है, कुछ वास्तविक और गंभीर चुनौतियां भी हैं जिनको समाज को संज्ञान में लेना पड़ेगा और उनको दुरुस्त करने के लिए प्रयास करना पड़ेगा।

आज मीडिया मुक्त बाजार की चुनौती से जूझ रहा है। 1992 के बाद से हम एक ऐसे समाज में बदल चुके हैं जहां सब कुछ एक उत्पाद है। समाचार भी एक उत्पाद है। इस तर्क में ही यह बात निहित है कि किसी भी उत्पाद का अस्तित्व तभी तक है जब तक कि वह बिकता हो। इस बुनियादी समझ के साथ मीडिया की सीमाएं और उसकी ज़रूरत समझी जा सकती हैं। आज अधिकतर मीडिया संस्थान व्यापार के लिए चलाये जा रहे हैं।

देश के सबसे बड़े अखबारों में से एक के मालिक ने न्यूयार्कर पत्रिका को दिए गए एक चर्चित साक्षात्कार में साफ बता दिया था कि वे विज्ञापन के लिए अखबार निकालते हैं, उसमें खबरें केवल विज्ञापन की मार्केंटिंग के लिए डाली जाती हैं क्योंकि खर्च तो विज्ञापन से ही चलता है। इस सोच के सहारे तो मीडिया अपनी पत्रकारीय ज़रूरत कभी पूरी नहीं कर सकता। मीडिया का काम विज्ञापन बटोरना नहीं है। क्योंकि विज्ञापन बटोरने के तर्क को आगे बढ़ाने पर तो बहुत ही चिंताजनक नतीजे सामने आएंगे। मीडिया का मुख्यधर्म सही सूचना और सही व्याख्या पहुंचाना है।

मीडिया की जिम्मेदारी का मूल सवाल मीडिया संगठनों के मालिकों से जुड़ा हुआ है। देश के सबसे बड़े अखबार के मालिक के बरक्स देशबन्धु अखबार के मालिकों की बात को लिया जा सकता है जिन्होंने बाजार की शर्तों पर खबरों को डिजाइन नहीं किया। इस काम में कठिनाई ज़रूरत है लेकिन काम चल तो रहा ही है। इन्हीं दो मानकों के बीच में कहीं निष्पक्ष और स्वतंत्र मीडिया की तलाश की जानी चाहिए। लेकिन उसके लिए समाज और समाज की प्रतिनिधि सरकार को आगे आना पड़ेगा। अमेरिकी समाज और राष्ट्र का उदाहरण दिया जा सकता है। जहां समाज या सरकार की हर कमी और अच्छाई को जनता के सामने बेलौस लाया जाता है। अगर मीडिया कहीं गलती करता है तो उसको भी सही तरीके से उभारा जाता है और नियंत्रण और संतुलन के सिद्धांत का पालन करते हुए मीडिया लोकतंत्र के चौथे खम्बे के रूप में अपने कर्तव्य को बखूबी निभाता है।

मीडिया के सामने आज बहुत चुनौतियां हैं।

सामजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्थानिक और व्यवस्थागत चुनौतियों के अलावा मालिकों की आवश्यकता और प्रतिबद्धता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पहले के समय में जो भी अखबार शुरू किए जाते थे उनके संस्थापकों के कुछ उदात्त आदर्श होते थे लेकिन आर्थिक उदारीकरण के अर्थशास्त्र को राजनीतिक आचरण की बुनियाद बनाये जाने के बाद हालात बदल गए हैं। अब अखबारों की भूमिका भी टेलिविजन की तुलना में कमजोर हुई है। टेलिविजन के कारोबार में पैसा लगाने वाले तरह तरह की पृष्ठभूमि से आ रहे हैं। मालिक लोग अपनी तरह के ही पत्रकार ला रहे हैं।

संविधान में बताई गई अभिव्यक्ति की आजादी मीडिया मालिक के स्वार्थ साधन की आजादी में बदल चुकी है। इसलिए अब ज़रूरत है कि सरकारी स्तर पर प्रयास किया जाए कि ऐसे लोगों को मीडिया मालिक बनने से रोका जाए जो सूचना के काम में निहित स्वार्थ के लिए आते हैं। अब उन बहसों का समय नहीं है जब कहा जाता था कि पत्रकार लोग अपने आप को नियमित करें। अब तो मालिक की इच्छा ही खबरों को तय कर रही है। और चैनल मालिकों की सूची देखें तो समझ में आ जाएगा कि किस तरह के लोग हैं। इनमें बिल्डर, तस्कर, चिटफंड वाले, ब्लैकमेलर आदि भरे पड़े हैं। इनके यहां काम करने वाले पत्रकारों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

ऐसी हालत में सरकार से ही उम्मीद की जा सकती है कि मीडिया संगठन शुरू करने वालों की बाकायदा जांच हो। जिस तरह से बैंकों को शुरू करने वालों के पूरे इतिहास भूगोल की जांच की जाती है उसके बाद ही अनुमति दी जाती है। हालांकि सरकार के नियंत्रण के खिलाफ सैकड़ों तर्क हैं लेकिन आज की हालत में सरकार ही हस्तक्षेप करके मीडिया को सही ढर्रे पर डालने में मदद कर सकती है।

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