शिवराज ने ये उपवास किसानों की समस्याएं हल करने के लिए किया था या उनका उपहास उड़ाने के लिए ?

ये कैसे संभव हो सकता था जो पार्टी बापू के हत्यारे नाथू राम गोडसे को अपना आदर्श मानती हो वो अचानक से गांधी जी के बताये मार्गों पर चलने लगे, वो भी पूरे मन से।...

देशबन्धु
हाइलाइट्स
  • उपवास या अन्नदाता का उपहास?
  • अचानक से गांधी जी के बताये मार्गों पर कैसे चलने लगे
  • सोचिये माननीय मुख्यमंत्री जी ने 28 घंटे पहले ये घोषणा की कि अपने एसी कमरों से बाहर निकलकर सरकार मैदान में आएगी और किसानों से खुली चर्चा करेगी लेकिन शिवराज जी ने वही किया जो वे अभी तक करते आये हैं उन्होंने इस उपवास को भी मेगा इवेंट में बदल दिया, बड़े-बड़े पंडाल, मीटिंग के लिए एसी कमरे, आराम करने के लिए एसी कमरा और डाइनिंग रूम भी बनाया गया, ये समझ से परे है कि भूख हड़ताल में डाइनिंग रूम की क्या आवश्यकता थी।  

योगेन्द्र सिंह परिहार

मध्यप्रदेश में 1 जून से 7 जून तक विभिन्न किसान संघों के आवाहन पर किसानों ने प्रदेश व्यापी आंदोलन आरम्भ किया था इस आंदोलन की अनेक मांगें थी जिनमें सब्जियों को सरकार द्वारा समर्थन मूल्य निर्धारित कर खरीदा जाना, मंडियों व सहकारी समितियों से अनाज की बिक्री पर त्वरित नगद भुगतान की व्यवस्था होना व ऋ ण माफ करना प्रमुख मांगें थी।

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किसान संघ का प्रदर्शन शुरू के 4-5 दिन शान्ति पूर्ण चला लेकिन सरकार ने किसानों के शान्ति पूर्ण प्रदर्शन को हल्के में ले लिया और किसानों का मज़ाक उड़ाते हुए सरकार के वित्त मंत्री जयंत मलैया ने ये तक कहा कि मुट्ठी भर किसान आंदोलन कर रहे हैं, मध्यप्रदेश के किसान इसमें शामिल नहीं हैं।

सरकार ने चतुराई पूर्ण आरएसएस से जुड़े किसान संघ से बात-चीत कर आंदोलन को पंचर करने के उद्देश्य से पूरे प्रदेश में ये सन्देश फैला दिया कि हमने किसानों की मांगे मान ली है और किसान संघ ने आंदोलन खत्म कर दिया है। उसी दौरान पत्रकारों ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष से पूछा कि राष्ट्रीय किसान संघ के अध्यक्ष शिव कुमार शर्मा 'कक्का जी’ ने कहा है कि सरकार ने मांगे नहीं मानी है और आंदोलन खत्म नहीं हुए हैं तो नंदू भैया ने उपहास उड़ाते हुए कहा कि कौन कक्का और कौन चच्चा। ये सभी छोटी-छोटी बातें आंदोलन को भड़काने में आग में घी की तरह काम करने लगी।

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पश्चिम मध्यप्रदेश के किसानों को लगा कि हमारी ओर से किसने सरकार से बात कर ली और किन मांगों पर चर्चा हुई इस बात का पता ही नहीं लगा तो किसानों के बच्चे जिनकी उम्र 17 साल से 35 साल रही होगी वे सभी गुस्से में आ कर उत्पात मचाने लगे, रोड पर सब्जियों को फेंकना, दूध उड़ेलना आदि काम शुरू कर दिए और जाने कब व किन परिस्थितियों में आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया ये किसी को समझ नहीं आया और उसी दौरान मन्दसौर की पिपलिया मंडी में प्रशासन की नाकामी सामने आयी और सामने आया पुलिस का बेरहम चेहरा, जब जवानों ने किसी की इज़ाजत लिए बगैर किसानों पर फायरिंग करना शुरू कर दी जिससे 6 किसानों की अकाल मृत्यु हो गयी।

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उसके बाद जो हुआ वो अभी तक मध्यप्रदेश के इतिहास में नहीं हुआ, किसान गुस्से में आ गए और बसें जलाई जाने लगी, पुलिस की गाडिय़ां जला दी गई और ये सब सिर्फ गैर जिम्मेदराना गोली चालन की वजह से हुआ। अचानक से सरकार को होश आया कि बात हद से ज्यादा बढ़ गई है और जब गृह मंत्री से पूछा गया कि पुलिस ने गोली क्यों चलाई तो उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई।

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बाद में बीजेपी अध्यक्ष सहित सभी ने स्वीकारा कि गोली पुलिस ने ही चलाई थी। गौर करने वाली बात ये थी कि चुनाव प्रचारों में गली मोहल्लों में पहुँचने वाले मध्यप्रदेश के किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मृतक किसानों के परिवारों से संवेदना तक व्यक्त करने नहीं पहुंचे और उनके बयानों में एक ही चीज प्रमुखता से प्रकट हुई कि किसान आंदोलन को सख्ती से निबटा जाये। लेकिन सख्ती का मतलब पुलिस ने गलत समझ लिया और इस बेरहम सख्ती ने निर्दोष किसानों की जान ले ली।

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मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जो अपने आप को मामा कहलवाने में गौरव् महसूस करते हैं वे अपने भांजों की मौत से विचलित नहीं हुए, बल्कि विचलित इसलिये हुए कि उनकी प्रतिमा खंडित हो रही है तो उन्होंने मृतक किसानों के नाम से मुआवजों की बोली लगाना शुरू कर दी 5 लाख, 10 लाख फिर 1 करोड़ रुपये। हमने तो आज तक इस तरह के मुआवजे की घोषणा नहीं सुनी।

हाँ, एक बात ज़रूर समझ आयी कि मुख्यमंत्री अपनी छवि को सुधारने लिए 1 करोड़ रुपए के मुआवजे की बात कर रहे थे। आश्चर्य तब हुआ जब मुख्यमंत्री 1 करोड़ रुपए पीड़ित किसानों के परिवार को देने की बात कर रहे थे और मन्दसौर के एसपी व कलेक्टर मृतक किसानों को असामाजिक तत्व घोषित करने की होड़ लगा रहे थे। पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय सही कहते हैं कि ब्यूरोक्रेसी ने योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं किया लेकिन साथ में ये भी कहना होगा कि ब्यूरोक्रेसी तभी हावी और बेलगाम हो जाती है जब नेतृत्व कमजोर हो जाता है।

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जब सरकार चारों खाने चित्त हो गयी तब मुख्यमंत्री को लगा कि अब सारे दांव फेल हो चुके हैं तो उन्होंने लीक से हटकर शान्ति उपवास नाम से एक स्वांग रचा, जिसमें उन्होंने वो सब किया जो आप, बीजेपी या किसी आरएसएस समर्थक से सपने में भी उम्मीद नहीं कर सकते।

माननीय मुख्यमंत्री जी ने शान्ति स्थापित करने के लिए अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी जी की तस्वीर मंच पर लगा दी और वो भी तब, जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमान अमित शाह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी को गांधी एक चतुर बनिया था कह कर संबोधित कर रहे थे।

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और उससे भी बड़ा आश्चर्य बीजेपी के मंच पर तब हुआ जब वैष्णव जन तो तेरे कहिये और रघुपति राघव राजा राम जैसे गांधी जी के प्रिय भजनों को स्वयं शिवराज जी द्वारा गाया जा रहा था! ये कैसे संभव हो सकता था जो पार्टी बापू के हत्यारे नाथू राम गोडसे को अपना आदर्श मानती हो वो अचानक से गांधी जी के बताये मार्गों पर चलने लगे, वो भी पूरे मन से। ये इसीलिए संभव हुआ कि बीजेपी के नेता ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके पास ऐसे किसी आदर्श महापुरुष का नाम नहीं है जिसने कभी अहिंसा और शान्ति की बात की हो तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जमीनी हकीकत को टटोलते हुए आन्दोलन की आग को ठंडा करने के लिए जन-मानस के हृदय में बसे बापू की आड़ ले ली।

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शिवराज जी ने बड़े जोशो खरोश से उपवास शुरू किया, पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी ने भाल पर तिलक कर उन्हें उपवास पर बिठाया। सरकारी उपवास में बीजेपी नेता अपने क्षेत्रों से बसों में भरकर लोगों को लेकर आये।

शिवराज जी के इस 28 घंटे के स्वांग में सरकार ने करोड़ों रुपये पानी में बहा दिए। प्रदेश सरकार के मंत्री उपवास कार्यक्रम में मुख्यमंत्री की शान में कसीदे पढ़ने लगे, उन्हें किसानों का सबसे बड़ा हितेषी बताने में भी पीछे नहीं हटे। उपवास की सार्थकता उसी वक्त संशय में आ गयी जब एक बूढ़ी महिला मुख्यमंत्री से मिलने की गुजारिश करती रही लेकिन पुलिस ने उन बुज़ुर्ग महिला को मुख्यमंत्री से मिलने नहीं दिया, ये वही बूढ़ी महिला थी जिन्हें सिहोर में उपद्रवियों के नाम से बुरी तरह पुलिस ने पीटा था तथा उनके परिवार के बच्चों को जबरदस्ती पुलिस कस्टडी में रखा गया। अब समझ में ये नहीं आ रहा था कि मुख्यमंत्री जी ने ये उपवास किसानों की समस्याएं हल करने के लिए किया था या उनका उपहास उड़ाने के लिए ?

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उपवास के दौरान छाई मायूसी से ये लगने लगा कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को मुख्यमंत्री का उपवास रास नहीं आया और एक ही दिन में 3-4 मुख्यमंत्री के दावेदारों की उपस्थिति में शिवराज जी का उपवास तुड़वाया गया।

उपवास तुड़वाने में गांधी जी की तस्वीर ने क्या और किस रूप में भूमिका निभाई ये तो वक्त ही बताएगा।

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सोचिये माननीय मुख्यमंत्री जी ने 28 घंटे पहले ये घोषणा की कि अपने एसी कमरों से बाहर निकलकर सरकार मैदान में आएगी और किसानों से खुली चर्चा करेगी लेकिन शिवराज जी ने वही किया जो वे अभी तक करते आये हैं उन्होंने इस उपवास को भी मेगा इवेंट में बदल दिया, बड़े-बड़े पंडाल, मीटिंग के लिए एसी कमरे, आराम करने के लिए एसी कमरा और डाइनिंग रूम भी बनाया गया, ये समझ से परे है कि भूख हड़ताल में डाइनिंग रूम की क्या आवश्यकता थी।

खैर बिना किसी नतीजे के किसानों की मौजूदगी के बावज़ूद भी अपने ही नेताओं के हाथ से चांदी के गिलास में नारियल का पानी पीकर उपवास तोड़ा गया। हाई लेवल ड्रामा बहुत जल्दी खत्म हो गया और पीछे रह गयी किसानों की मांगे जिनके कारण मासूम किसानों की हृदय विदारक मौत हुई।

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सनद रहे कि मुख्यमंत्री जी का उपवास खत्म हुआ है किसान आंदोलन नहीं। किसान अभी भी अपनी जायज मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं ये और बात है कि पहले किसान आंदोलन की खबरें दिखाई दे रही थी अब दिखाई नहीं जा रही हैं।

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