इन्हें बुत डराते हैं, चाहे वो अम्बेडकर हों या लेनिन… ये गद्दार हैं. देश बेच देंगे. बैंक झोले में भरकर झोला उठाकर ब्रिटेन भाग जाएंगे

समझिये कि अंग्रेजों के भक्त रहे आरएसएस के लोगों ने किसकी मूर्ति तोड़ी है और वे देशभक्त शहीदों से कितनी घृणा करते हैं...

सत्येंद्र पीएस

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति ही तोड़ी लेकिन विदेशी विचारक कहकर मजदूरों, गरीबों, वंचितों की दुनिया में पहली सरकार बनाने वाले लेनिन की छवि आरएसएस वाले बहुत पहले से खराब करते रहे हैं।

इन संघी दलालों का वश चले तो इंडोनेशिया, थाईलैंड सहित तमाम देशों में राम की मूर्तियां, दुनिया के 2 दर्जन देशों से बुद्ध की मूर्तियां और पचासों देशों से गांधी की मूर्तियां, दर्जनों देशों में कृष्ण का इस्कॉन टेम्पल वहां के लोकल लोगों से यह कहकर तोड़वा दें कि यह सब विदेशी हैं तुम्हारे देश मे इनकी मूर्तियों का क्या काम है ?

पहले संघियों ने अम्बेडकर की मूर्तियां तोड़ीं। उस समय पिछड़ा वर्ग मजे लेता रहा। उन्होंने लेनिन की मूर्तियां तोड़ीं। उस समय भी लोग खामोश रहे, किसी ने नही कहा कि दुनिया के मजदूरों, वंचितों, गरीबों के मसीहा और भगत सिंह के राजनीतिक गुरु लेनिन का विरोध देश द्रोह है। उनके हौसले अब इतने बढ़ गए कि सामाजिक न्याय की धरती तमिलनाडु में ही देश के सामाजिक न्याय के पुरोधा और पिछड़े वर्ग के नेता ईवी रामास्वामी नायकर की भी मूर्ति पर हमला बोल दिया!

अंग्रेजों की दलाल संघियों की औलादें देश द्रोही हैं। ये हर उस व्यक्ति और विचारधारा के दुश्मन हैं जिन्होंने दलितों, पिछड़ों, वंचितों, मजदूरों के हक में बोला है और उनके लिए काम किया है।

''21 जनवरी , 1930 को अभियुक्त अदालत में लाल स्कार्व पहनकर पहुंचे. जैसे ही मेजिस्ट्रेट कुर्सी पर बैठे, उन्होंने 'लेनिन ज़िदाबाद' के नारे लगाने शुरू कर दिए. इसके बाद भगत सिंह ने एक टेलिग्राम पढ़ा जिसे वो लेनिन को भेजना चाहते थे. टेलिग्राम में लिखा था, ''लेनिन दिवस पर हम उन सभी लोगों को दिली अभिभादन भेजते हैं जो महान लेनिन के विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं. हम रूस में चल रहे महान प्रयोग की कामयाबी की कामना करते हैं.''

समझिये कि अंग्रेजों के भक्त रहे आरएसएस के लोगों ने किसकी मूर्ति तोड़ी है और वे देशभक्त शहीदों से कितनी घृणा करते हैं। ये गद्दार हैं। देश बेच देंगे। बैंक झोले में भरकर झोला उठाकर ब्रिटेन भाग जाएंगे।

लेनिन के बारे में कम भारतीय जानते हैं। उनसे जुड़े कुछ तथ्य जान लें कि भारत में लेनिन का इतना सम्मान क्यों रहा है?

ये वही लेनिन हैं जिन्होंने सोवियत संघ का राष्ट्रपति रहते अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में भारतीयों का खुलकर साथ दिया था।

ये वही लेनिन हैं जिनके सोवियत संघ मे भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद की पार्टी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के डॉ गया प्रसाद कटियार के नेतृत्व में HSRA के कार्यकर्ताओं को बम और हथियार बनाने की ट्रेनिंग दी गई।

ये वही लेनिन हैं जिनकी लिखी किताब भगत सिंह जेल में पढ़ रहे थे और जब फांसी के लिए उनको बुलावा आया तो सिपाही से बोले कि इस किताब का एक अध्याय भी नहीं पूरा करने दोगे क्या? अभी ठहरो, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।

अब अंग्रेजों के दलाल हेडगेवार, गोलवलकर, सावरकर के चेलों की सरकार है। वह लेनिन को कैसे बर्दाश्त कर पाएंगे। उन्होंने सत्ता में आते ही त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति ही तोड़ डाली।

इन्हें बुत डराते हैं, चाहे वो अम्बेडकर हों या लेनिन।

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सत्येंद्र पीएस की एफबी टिप्पणियों का समुच्चय

 

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