संयुक्त विपक्ष भाजपा का सिर दर्द, लेकिन क्या विपक्ष जीतना भी चाहता है

संप्रग-2 में लालू जैसे वफादार दोस्त के साथ कांग्रेस ने अच्छा सुलूक नहीं किया था। इस बार भी अगर वह यह गलती दोहराएंगे तो उन्हें बहुत मंहगा पड़ेगा I...

अतिथि लेखक

संयुक्त विपक्ष भाजपा का सिर दर्द, लेकिन क्या विपक्ष जीतना भी चाहता है

चुनावी तैयारी में भाजपा सब से आगे

उबैदउल्लाह नासिर

विगत लोक सभा चुनाव में हिंदी पट्टी के राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात आदि राज्यों में लगभग 99% सीटें जीत कर भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक सफलता दर्ज की थी लेकिन इस बार 2014 जैसी मोदी लहर नहीं है। इस के अलावा तब विपक्ष बिखरा हुआ था, जबकि इस बार विपक्ष किसी न किसी तरह एकजुट हो रहा है, जबकि भाजपा के पूर्व साथी उस से छिटक रहे हैं। शिव सेना और तेलगु देशम पार्टी ने अलग होने का एलान कर ही दिया है। बिहार में उपेन्द्र कुशवाहा भी अलग होने का मूड बना ही चुके हैं। राम विलास अंतिम क्षणों में क्या फैसला करेंगे, कुछ नहीं कहा जा सकता। फ़िलहाल वह देख रहे हैं ब्रेड में किस तरफ ज्यादा मक्खन लगा है I

बिहार में तेजस्वी यादव की लोकप्रियता जिस तेज़ी से बढ़ी है, नीतीश की लोकप्रियता उसी अनुपात में नीचे आ रही है। वहां लालू यादव का MY अर्थात मुस्लिम यादव फैक्टर, नीतीश द्वारा लालू प्रसाद यादव को धोखा दिए जाने और एक जैसे जुर्म में पंडित जगन्नाथ मिश्र को बरी करने और लालू को लम्बी सज़ा दिए जाने से यह फैक्टर तेजस्वी के पीछे और मज़बूत से लामबंद हुआ है। विगत मध्यवर्ती चुनावों में केंद्र और राज्य की सत्ता को टक्कर देते हुए तेजस्वी ने सब सीटें जीत कर दिखा दिया था कि वह अब अपने पिता की सियासी विरासत को संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं। जीतन राम मांझी के तेजस्वी के साथ आ जाने से महादलितों का वोट भी काफी बड़ी संख्या में उस ओर आ रहा हैI

अगर कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, मांझी की भारतीय अवाम पार्टी  और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का मोर्चा बन जाता है तो पूरी आशा है कि जिस प्रकार पिछले चुनाव में मोदी लहर के चलते यहाँ की 40 सीटों में से भाजपा को 35 सीटें मिली थीं अबकी यह गिनती उलट भी सकती है। मगर कांग्रेस के कुछ खुदगरज और मतलब परस्त नेता जिस प्रकार नीतीश जैसे अविश्वसनीय नेता के साथ हाथ मिलाने की बात कर रहे हैं, वह कांग्रेस के अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने वाली बात होगी।

संप्रग-2 में लालू जैसे वफादार दोस्त के साथ कांग्रेस ने अच्छा सुलूक नहीं किया था। इस बार भी अगर वह यह गलती दोहराएंगे तो उन्हें बहुत मंहगा पड़ेगा I

इधर उत्तर प्रदेश में हुए उप चुनावों में सपा और बसपा के गठ जोड़ के चलते गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की लोक सभा और नूरपुर की असम्बली सीट हार से भाजपा के अविजेय होने का भ्रम टूट गया और यह पक्का हो गया कि अगर यहाँ सपा, बसपा, कांग्रेस और लोक दल एक मोर्चा बनाने में सफल हो गए तो जिस प्रकार 2014 में मोदी लहर के चलते उसे यहाँ की 80 सीटों में से 73 पर सफलता मिली थी, इस बार यहाँ से उसे गत जोड़ के मुकाबले में 10 सीटें मिलना दुर्लभ हो जायेगाI

संघ और भाजपा के बेहतरीन दिमागों को भी अंदाजा है कि इस बार बयार उनके पक्ष में नहीं है। इस लिए वह उत्तर प्रदेश में उभर रहे मोर्चा को तोड़ने की हर सम्भव कोशिश कर रहे हैं। पहले ख्याल था कि वह मायावती को किसी न किसी प्रकार मोर्चे से अलग रखने का कार्ड खेलेगी, लेकिन लगता है वहां से मायूसी के बाद उस ने अमर सिंह द्वारा समाजवादी पार्टी में सेंध मारी कर दी और चचा शिवपाल यादव को भतीजे अखिलेश यादव से अलग करने में सफल रही शिवपाल यादव ने सेक्युलर समजवादी मोर्चा गठित कर के प्रदेश की सभी अस्सी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है। लेकिन यह खेल कुछ इस फूहड़पन और जल्द ज़ी में खेला गया है कि पहले दिन से ही लोग इसे आरएसएस का खेल समझ गए। इस लिए मुस्लिम वोट का इस और जाना तो असम्भव है। संघ भी यह जानता है इस लिए इस बार उस ने यादव वोट को भ्रमित करने और उसे तितर बितर करने के लिए शिवपाल यादव पर दांव लगाया हैI यह सही है कि समाजवादी पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं पर शिवपाल यादव की पूरी पकड़ है। यह भी सही है कि उनके पास पैसों की भी कमी नहीं है, लेकिन उनके पास अपना कोई वोट बैंक नहीं है, जो है वह मुलायम का है और बाप का वारिस बेटा ही होता है भाई नहीं। इसलिए मुलायम का वोट बैंक अखिलेश की ओर ही जायगा। वैसे भी समाजवादी पार्टी के युवा कार्यकर्ता अखिलेश के साथ हैं और कई वरिष्ठ नेता भी उन्हीं के साथ रहे कहीं और नहीं गएI

वैसे आरएसएस के खेल बहुत निराले होते हैं। उसे जब मुलायम और वीपी सिंह में फूट डलवानी थी तो मुलायम के जलसों मे खूब भीड़ बढवायी। संघ के कार्यकर्ता उनके जलसों मे भर जाते थे। मुलायम उसे अपनी लोकप्रियता समझ बैठे और VP सिंह से अलग हो गए जनता दल बंट गया और जब मुलायम ने अलग हो के चुनाव लड़ा तो मात्र 33 सीटें जीत पाए थे। यही खेल शिवपाल के साथ भी होगाI  यह तो तय है कि शिवपाल यादव का यह मोर्चा खुद भले ही दो एक सीटों से ज्यादा न जीत पाए लेकिन वह कई सीटें हरवा देगा जिसका सीधा फायदा भाजपा को होगाI

मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान में असम्बली चुनाव इस साल होंगे और अब तक के सभी सर्वे के अनुसार यहाँ भाजपा को बड़ी हार का सामना करना पड़ेगा। गुजरात जैसा उसका मज़बूत किला भी दरक चुका है। अगर इन राज्यों में भाजपा हार जाती है तो फिर 2019 उस के लिए बहुत बड़ा सवाल खडा करने जा रहा है, लेकिन भाजपा के तरकश में तीरों की कमी नहीं। सबसे बड़ी बात उसके पास 3M (मनी मीडिया और मैनपावर) का होना है। दूसरे मुसलमान पाकिस्तान शमशान कब्रिस्तान आदि उस के ATM हैं। उसके कार्यकर्ताओं में भी जो जोश है वह अन्य किसी पार्टी के कार्यकर्ताओं के पास नहीं। प्रधान मंत्री और पार्टी अध्यक्ष समेत उसका हर छोटा बड़ा नेता ह्मेशा चुनावी मूड में होता है। चुनावी तैयारी के मामले में वह अभी से सभी पार्टियों से आगे निकल चुकी हैI विपक्ष अभी गठबंधन को ही अंतिम स्वरुप नहीं दे सका है।

यह सही है कि जनता इस बार भाजपा को हराना चाहती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या विपक्ष जीतना चाहता है। इसी सवाल के जवाब में 2019 के चुनाव नतीजे छुपे हैं I  

ज़रा हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।