आवारा विपक्ष के नाम गुफरान सिद्दीकी की चिट्ठी : सामाजिक न्याय के नाम पर बुआ-बबुआ की नौटंकी फूहड़ ही नहीं अश्लील भी

हमें याद है गुजरात और मुज़फ्फरनगर से लेकर शामली तक कैम्पों में नवजात बच्चों की मौत, बेखौफ और खुलेआम हुए बलात्कार, शहीद डीएसपी ज़ियाउल हक़ के इंसाफ का सवाल और आपकी साम्प्रदायिक मुआवज़ा नीति...

अतिथि लेखक
आवारा विपक्ष के नाम गुफरान सिद्दीकी की चिट्ठी : सामाजिक न्याय के नाम पर बुआ-बबुआ की नौटंकी फूहड़ ही नहीं अश्लील भी

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गुफरान सिद्दीकी

प्रिय अखिलेश यादव, बहन मायावती और राहुल गांधी सामाजिक न्याय की लड़ाई आप नहीं लड़ सकते। आप साम्प्रदायिक राजनीति में ही अपना हाथ आज़माइश करते रहिए। आपकी चेतना एक तरफ तो पांच करोड़ के मुआवज़े की मांग करती है, वहीं दूसरी तरफ अलीगढ़ से लेकर लखनऊ तक दोहरे हत्याकांड में बोलने तक से कांपने लगती है।

हमें याद है गुजरात और मुज़फ्फरनगर से लेकर शामली तक कैम्पों में नवजात बच्चों की मौत, बेखौफ और खुलेआम हुए बलात्कार, शहीद डीएसपी ज़ियाउल हक़ के इंसाफ का सवाल और आपकी साम्प्रदायिक मुआवज़ा नीति, जिसने हज़ारों लोगों को बेघर कर दिया। साम्प्रदायिक हिंसा, फ़र्ज़ी एनकाउंटर और इंसाफ के लिए संघर्ष करने वालों के दमन को भी हम नहीं भूले हैं। उस समय भी विपक्ष के नाम पर बीएसपी और कांग्रेस साम्प्रदायिक हिंसा में पीड़ित लोगों को कैसे सिर्फ वोट के रूप में देख रही थीं जबकि पीड़ितों के इंसाफ का सवाल किसी के लिए कोई सवाल ही नहीं था।

मौजूदा दौर में साम्प्रदायिकता, जातिवाद, महिला हिंसा और संविधान पर लगातार हमले हो रहे हैं। किसान, मजदूर, महिला, छात्र, नौजवान सब के सब संघर्ष कर रहे हैं और पुलिस की गोली-लाठी के निशाने पर हैं, लेकिन विपक्ष की भूमिका में कोई नहीं है। सबके सब बेशर्मी से चुनाव का इंतज़ार कर रहे हैं और निश्चिंत हैं क्योंकि जानते हैं जनता एक से परेशान होती है तो दूसरे को चुन लेती है।

देश में महिलाओं के खिलाफ लगातार हिंसा बढ़ती जा रही है। बालिका गृहों में बालिकाएं सुरक्षित नहीं हैं। बर्बरता की सारी हदें पार हो चुकी हैं, यहां तक कि मूक बधिर बच्चियों तक को इसका शिकार बनाया गया, लेकिन इनके इंसाफ के लिए लड़ने के लिए विपक्ष बाहर नहीं निकला इसका कारण सिर्फ इतना है कि मौजूदा दौर में महिलाओं के लिए किसी भी पार्टी में कोई लाइन ही नहीं है। होगी भी कैसे जब बलात्कारियों को संसद और विधान सभा पहुंचाने की ज़िम्मेदारी इन्हीं राजनीतिक दलों ने उठा रखी है।

सामाजिक न्याय के नाम पर जो नौटंकी आप लोग करते हैं वो सिर्फ फूहड़ ही नहीं अश्लील भी है। सामाजिक न्याय का मतलब सभी को बराबरी और न्याय है, जबकि आप लोगों ने इसका मज़ाक बना कर रख दिया है। सत्ता में रहते हुए आपमें से किसी ने भी यह प्रयास नहीं किया कि संविधान, साम्प्रदायिक सौहार्द, बराबरी और सामाजिक समावेश के मूल्यों को बचाये रखा जाए। आपकी राजनीति सिर्फ और सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए है जिसमें समाजवाद का तड़का है।

विपक्ष में रहते हुए आपने कभी देश के संविधान के खिलाफ हो रहे कुकर्मों के लिए आवाज़ नहीं उठाई लिंचिंग, गौहत्या, फ़र्ज़ी एनकाउंटर, महिला हिंसा जातिवादी और साम्प्रदायिक हिंसा से किनारा करते हुए अपनी मूक सहमति देते रहे।

मेरा सवाल उनसे भी है जो महागठबंधन की वकालत कर रहे हैं उनको जवाब देना चाहिए कि महागठबंधन की नींव का आधार क्या होगा और वो देश के प्रति कितना जवाबदेह होगा ? क्या वो जल, जंगल, ज़मीन की लड़ाई पर अपनी स्थिति साफ करेगा ? बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार, भूमि अधिग्रहण पर लगाम लगाएगा ? जेलों में फ़र्ज़ी मुकदमों में बंद निर्दोषों को रिहा करेगा ? साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी बिल और महिला आरक्षण बिल पास होगा?

साम्प्रदायिकता, जातिवाद, गैरबराबरी, सामंती पूंजीवाद और फासीवाद के केंद्रबिंदु के रूप में बीजेपी को देख रहे हैं लेकिन इससे इतर महागठबंधन क्या करेगा इसका जवाब इसके पैरोकारों को इसलिए देना चाहिए क्योंकि इससे पहले यही सवाल कांग्रेस की सरकार में बने रहे थे।

इस आवारा और गैर संवेदनशील विपक्ष के पास अगर इन सवालों के जवाब नहीं हैं तो इनका समाप्त हो जाना ही देश हित में है क्योंकि तब जनता नए उत्साह, ऊर्जा और विकल्प के साथ उठ खड़ी होगी और इस सामंती निज़ाम के खिलाफ अपनी दावेदारी पेश करेगी जो देश के संविधान की मूल भावना से ओत-प्रोत होगा।

(लेखक गुफरान सिद्दीकी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। रिहाई मंच से जुड़े हैं।)

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