गुजरात चुनाव : झूठ के पांव नहीं होते... बढ़ रही भाजपा की हताशा

गुजरात और उसके बाद पूरे देश में मोदी जी और संघ परिवार ने झूठ का जो कारोबार फैलाया है, उसका सच अब लोगों को समझ में आ जाना चाहिए।...

अतिथि लेखक

गुजरात और उसके बाद पूरे देश में मोदी जी और संघ परिवार ने झूठ का जो कारोबार फैलाया है, उसका सच अब लोगों को समझ में आ जाना चाहिए।

  • मनोज कुमार झा

गुजरात चुनाव के दिन जैस-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, भाजपा नेताओं की हताशा भी बढ़ती जा रही है। इस चुनाव में भाजपा ने प्रचार में सारी ताकत झोंक दी है, फिर भी प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की रैलियों में भीड़ जुट नहीं पा रही है। वहीं, राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं की सभाओं में अच्छी-खासी संख्या में लोग जुट रहे हैं। इससे 22 साल से गुजरात की सत्ता पर कुंडली मार कर बैठे भाजपाइयों को दिन में ही तारे नजर आ रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी मतदाताओं को लुभाने के लिए क्षेत्रीयतावाद को हवा दे रहे हैं और गुजराती बनाम गैर-गुजराती का मुद्दा खड़ा कर रहे हैं। वे खुद को गुजरात का बेटा बता रहे हैं, पर यह भूल रहे हैं कि उन्होंने सांसद का चुनाव वाराणसी से लड़ते हुए कहा था कि उन्हें मां गंगा ने बुलाया है। पर अब वे अपने आपको गुजराती पहचान के साथ पेश कर रहे हैं और सभाओं में गुजराती में ही भाषण दे रहे हैं।

गुजारत चुनाव में मोदी ने तमाम केंद्रीय मंत्रियों के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को भी कई बार बुलाया। इसका साफ मकसद था उनकी हिंदूवादी छवि यानी गेरुआ बाने से मतदाताओं को प्रभावित करना। पर कई जगहों पर यह देखने में आया कि योगी की सभाओं में भी भीड़ नदारद रही। प्रचार का असर फीका देख कर मोदी और उनकी मंडली दुष्प्रचार पर उतर आई और राहुल को लेकर कई आपत्तिजनक बातें की। मोदी ने यहां तक कहा कि उन्होंने कइयों को मंदिर तक पहुंचा दिया।

उल्लेखनीय है कि अपने गुजरात दौरे में राहुल गांधी ने कई मंदिरों में जाकर दर्शन किए। राहुल जब सोमनाथ मंदिर दर्शन करने गए तो मोदी आपा खो बैठे और यह कहने के साथ कि नेहरू सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के विरोध में थे। उन्होंने यह भी कह डाला कि क्या यह मंदिर राहुल के नाना ने बनवाया था। प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की ऐसी छिछली और स्तरहीन बात का काफी विरोध हुआ। पर प्रधानमंत्री और उनके समर्थक यहीं नहीं रुके, उन्होंने राहुल गांधी की धार्मिक पहचान का सवाल भी खड़ा किया। उनके पिता फिरोज गांधी को संघ और भाजपा के लोगों ने अज्ञानता या कुटिलतावश मुसलमान तक बताने की कोशिश की, जिसका लोगों ने काफी मजाक उड़ाया, क्योंकि सभी जानते हैं कि फिरोज गांधी पारसी थे। यही नहीं, जब राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरा तो उन्हें वंशवादी बताने के साथ शाहजहां के उत्तराधिकारी के रूप में औरंजगेब तक बताया। इसके पीछे कोशिश यह थी कि मतदाताओं को हिंदू-मुसलमान के लाइन पर विभाजित किया जाए। पर विकास की बातें करने वाले मोदी की यह चाल इसलिए असफल मानी जा सकती है कि राहुल की सभाओं में बेशुमार भीड़ उमड़ती रही, वहीं स्वयं मोदी और उनके चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह की सभाओं में कुर्सियां खाली नज़र आती रहीं।

इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या राममंदिर मुद्दे की सुनवाई से मोदी और उनकी मंडली को ये उम्मीद बंधी कि इससे सांप्रदायिक प्रचार और ध्रुवीकरण का मौका मिलेगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने डाक्युमेंट्स पूरे नहीं होने की वजह से 8 फरवरी तक सुनवाई टाल दी। यद्यपि सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की तरफ से मामले की पैरवी कर रहे कपिल सिब्बल ने राजनीतिक असर को लेकर सुनवाई 2019 के इलेक्शन तक टालने की दरख्वास्त सुप्रीम कोर्ट से की, पर कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया, फिर भी फिलहाल सुनवाई टल जाने से इस मुद्दे को खड़ा कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का मौका भाजपा खो बैठी है। बावजूद प्रधानमंत्री मोदी के तेवर देखकर लगता यही है कि वे सरसाम की हालत में आ चुके हैं। राहुल के मंदिर में जाकर दर्शन करने से उन्हें काफी तकलीफ है। जबकि मंदिर को लेकर जैसी राजनीति भाजपा ने की है, उसे कौन नहीं जानता है।

राममंदिर के लिए बाबरी मस्जिद का ध्वंस आधुनिक इतिहास की बर्बरतम घटनाओं में एक है। इसके नाम पर भाजपा पिछले ढाई दशकों से राजनीति करती आ रही है और इस नाम पर हुए दंगों में कितने निर्दोषों की बलि ले चुकी है, ये कौन नहीं जानता। वहीं, राहुल के मंदिर में दर्शन करने को लेकर वे बार-बार सवाल उठा रहे हैं और तंज कसते हुए कह रहे हैं कि मंदिर-मंदिर जाने से बिजली नहीं आती, मैंने गुजरात में काम किया है। बात सही है, फिर उन्हें देखना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में जिस महंत गेरुआधारी को मुख्यमंत्री बना दिया है, वहां बिजली क्यों नहीं आती और उनके शहर गोरखपुर में जहां उनका मठ भी है, ऑक्सीजन के बिना अस्पतालों में सैकड़ों की संख्या में शिशु क्यों काल के गाल में समाते रहे हैं।

आखिर भाजपाई किस आधार पर राहुल गांधी को कभी औरंगजेब तो कभी बाबर का वंशज बता रहे हैं। ताजा ट्वीट तो भाजपा के एक प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने किया है। उन्होंने राहुल को बाबर भक्त और अलाउद्दीन खिलजी का रिश्तेदार बताया है। उनके इस ट्वीट पर बवाल मच रहा है।

जीवीएल नरसिम्हा राव ने लिखा है, "अयोध्या में राम मंदिर का विरोध करने के लिए राहुल गांधी ने ओवैसिस, जिलानिस से हाथ मिला लिया है। राहुल गांधी निश्चित रूप से एक 'बाबर भक्त' और 'खिलजी के रिश्तेदार' हैं। बाबर ने राम मंदिर को नष्ट कर दिया और खिलजी ने सोमनाथ को लूट लिया। नेहरू वंश दोनों इस्लामी आक्रमणकारियों के पक्ष में!"

जाहिर है, इस तरह की बयानबाजी महज उकसावे के लिए की गई है और इसके माध्यम से अंतिम समय में मतदाताओं को कांग्रेस के खिलाफ भड़काने की कोशिश की गई है। पर मतदाता इतना बेवकूफ नहीं है।

अगर गुजरात में विकास हुआ है तो मोदी और भगवा मंडली को विकास की बात पर कायम रहना चाहिए। इधर-उधर की बात करने से उन्हें कोई लाभ होने वाला नहीं है।

राहुल मंदिर विरोधी हों या समर्थक, इससे न तो गुजरात और न ही देश के लोगों की किसी समस्या का समाधान होने वाला है। फिर राहुल को बाबर भक्त और खिलजी का रिश्तेदार कहे जाने से भाजपा और मोदी की ही किरकिरी होनी है और वह हो रही है।

गुजरात में चुनाव परिणाम क्या आत है, यह जल्दी ही पता चल जाएगा, पर मोदी के विकास की हवा वहां निकल चुकी है, यह तो चुनाव प्रचार के दौरान पूरे देश को पता चल गया। कहावत है – झूठ के पांव नहीं होते। गुजरात और उसके बाद पूरे देश में मोदी जी और संघ परिवार ने झूठ का जो कारोबार फैलाया है, उसका सच अब लोगों को समझ में आ जाना चाहिए। 

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