सीनाजोरी का जलवा - अब नोटबंदी के बाद जुबां पर तालाबंदी की तैयारी!

सहिष्णुता की बात करने पर अंजाम कलबुर्गी, पानेसर, दाभोलकर, रोहित वेमुला या नजीब का है या शहीद की इक्कीस साल की बेटी को रेप की धमकी है या राष्ट्रद्रोह का तमगा है...

हाइलाइट्स
  • इतिहास, भूगोल, विज्ञान के बाद अब अर्थशास्त्र पर भी फासिस्ट हमला!
  • बेइंतहा बेदखली, दमन, उत्पीड़न, अत्याचार, नरसंहार के खिलाफ आवाज उठाना, विविधता बहुलता, सहिष्णुता की बात करने पर अंजाम कलबुर्गी, पानेसर, दाभोलकर, रोहित वेमुला या नजीब का है या शहीद की इक्कीस साल की बेटी को रेप की धमकी है या राष्ट्रद्रोह का तमगा है।

 

पलाश विश्वास

इन दिनों राजनीति और राजकाज में सीनाजोरी का जलवा है।

नोटबंदी के मारे किसानों ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में गन्ने को हथियार में तब्दील करके दंगाई राजनीति की तबीयत हरी कर दी है और यूपी में दो चरण का मतदान बाकी रहते रहते रिजर्व बैंक, अर्थशास्त्र और अर्थशास्त्रियों, रेटिंग एजंसियों के आकलन के खिलाफ विकास दर के झूठे आंकड़े पेश करके नोटबंदी से विकास तेज होने का जो दावा पेश किया गया है, वह तो हैरतअंगेज है ही, चुनाव प्रचार अभियान में जिस तरह सता पर काबिज शीर्षस्थ राष्ट्र नेता अपने संवैधानिक पद से अर्थशास्त्र और अर्थशास्त्रियों की जो बेशर्म खिल्ली उड़ाई है, वह भारत ही नहीं, दुनिया के इतिहास में बेनजीर कारनामा है।

सीनाजोरी का जलवा!

इतिहास, भूगोल, विज्ञान के बाद अब अर्थशास्त्र पर भी फासिस्ट हमला!

ट्रंप कार्ड के इस्तेमाल की भारत में तैयारी

अर्थव्यवस्था से किसानों, जनपदों, गांवों, मेहनतकशों , खुदराबाजार, कारोबारियों, युवाओं और स्त्रियों, बहुसंख्य बहुजन जनता का बहिष्कार!

हाल में इसी तर्ज पर अमेरिकी अलोकप्रिय राष्ट्रपति डान डोनाल्ड ने मीडिया को खारिज करने का अभियान छेड़ दिया है और इसी ट्रंप कार्ड के इस्तेमाल की भारत में तैयारी हो रही है।

देश में फासिज्म के राजकाज में वित्तीय आपदायों के सृजनशील कलाकार और झोलाछाप विशेषज्ञों के सरताज भोपाल गैस त्रासदी के पीडितों के वंचित करने वाले यूनियन कार्बाइड के मशहूर कारपोरेट वकील ने बाबुलंद आवाज में ऐलान कर दिया है कि अब अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस होनी चाहिेए।

नागरिक और मनवाधिकार, मेहनतकशों के हकहकूक, जल जंगल जमीन पर्यावरण पहले से निषिद्ध विषय हैं।

बेइंतहा बेदखली, दमन, उत्पीड़न, अत्याचार, नरसंहार के खिलाफ आवाज उठाना, विविधता, बहुलता, सहिष्णुता की बात करने पर अंजाम कलबुर्गी, पानेसर, दाभोलकर, रोहित वेमुला या नजीब का है या शहीद की इक्कीस साल की बेटी को रेप की धमकी है या राष्ट्रद्रोह का तमगा है।

अब नोटबंदी के बाद जुबां पर तालाबंदी की तैयारी है।

आला सिपाहसालार नोटबंदी पर यूपी का जनादेश जीतने का दावा कर रहे थे और उनकी जीत के लिए राम की सौगंध नाकाफी साबित होने लगी तो बाकायदा अर्थशास्त्र के खिलाफ युद्ध घोषणा कर दी गयी है।

इतिहास के खिलाफ तो वे भारत में संस्थागत फासिज्म के जनमकाल से लड़ रहे हैं। सारा इतिहास दोबारा लिख रहे हैं। मिथकों और किंवदंतियों के अलावा अब सफेद झूठ को धर्म जाति नस्ल की रंगभेदी राजनीति के हिसाब से इतिहास बताया जा रहा है।

भूगोल का बड़ा करना उनका सबसे प्रिय खेल है और इसमें उनकी मेधा बेमिसाल है। भारत विभाजन का किस्सा अभी आम जनता के लिए अबूझ पहेली है और भारत विभाजन से लेकर गांधी की हत्या और फिर फिर गांधी की हत्या के जरिये देश के बंटवारे से भूगोल के खिलाफ, राष्ट्रीय एकता और अखंडता के खिलाफ, संप्रभुता के खिलाफ उनका अविराम युद्ध धरअसल भारतीय जनता के दिलोदमिामाग में महाभारत के अश्वत्थामा का रिसता हुआ सदाबहार जख्म है, जिसका इलाज निषिद्ध है।

इतिहासकारों को कूढ़े के ढेर में फेंकने के बाद अर्थशास्त्र बदलने और अर्थशास्त्रियों को भी खारिज कर देने का यह अभियान इतिहास के खिलाफ युद्ध की ही निरंतरता है और इसे हैरतअंगेज भी नहीं माना जा सकता।

हैरतअंगेज इसलिए भी नहीं है कि भारतीयता और भारतीय संस्कृति के नाम राजनीति, राजकाज, राजधर्म की विचारधारा सभ्यता, विज्ञान, आध्यात्म, धर्म, मनुष्यता और प्रकृति के विरुद्ध है, ईश्वर की अवधारणा और तमाम पवित्र धर्म ग्रंथों में निहित बुनियादी मूल्यों, सामाजिकता, उत्पादन संबंधों, मनुष्यता, विवधता, बहुलता के विरुद्ध है।

यह ध्यान देने की बात है कि वे विज्ञान, उच्च शिक्षा, शोध, विश्वविद्यालय के खिलाफ हैं लेकिन वे विध्वंसक परमाणु ऊर्जा के पक्ष में हैं। जनसंहार के तमाम उपकरणों और आयुधों के वे कारोबारी हैं।

वे ऐप्पस, तकनीक और मशीनीकरण, रोबोटीकरण, तेज शहरीकरण, महानगरीकरण और औद्गोगीकीकरण के नाम बाजारीकरण के पक्षधर है, जो श्रम और उत्पादन संबंधों की बुनियादी सामाजिक आर्थिक शर्तों की मनुष्यता का खुल्ला उल्लंघन ही नहीं जनसंहार संस्कृति है। गैरजरुरी जनसंख्या का सफाया करके वे अपने धर्म कर्म एजंडे के हिसाब पसंदीदा जनता के अलावा बाकी सबको टरमिनेट कर देंगे।

कारपोरेट एकाधिकार के लिए खेती और खुदरा कारोबार को खत्म करने के लिए नरसंहारी अश्वमेध के नस्ली एजंडा को लागू करने के लिए उनका संविधान मनुस्मृति है। नोटबंदी के जरिये मुक्तबाजार में आम जनता को नकदी से वंचित करके किसानों, कारोबारियों और मेहनतकशों के सफाया अभियान को जायज बताने के लिए इतिहास और विज्ञान के बाद अर्थशास्त्र पर यह अभूतपूर्व हमला है।

मजे की बात तो यह है कि मनमर्जी आधार वर्ष, अवैज्ञानिक पद्धति, सुविधा के हिसाब से पैमाना और फर्जी आंकड़ों के इस खेल में सिर्फ औपचारिक और संगठित क्षेत्र और सच कहें तो शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों के विकास को इस विकास दर का आधार बनाया गया है जो भारतीय अर्थव्यवस्था का एक फीसद का भी प्रतिनिधित्व नहीं करता है।

भारतीय अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि आधारित है, यह संसाधनों के लिहाज से ही नहीं, प्राकृतिक और पर्यावरण के सच के हिसाब से भी नहीं, बल्कि बहुसंख्य जनता के नैसर्गिक रोजगार और आजीविका होने की वजह से है।

भारत आजाद होने के सत्तर साल में भूगोल का सच भी बदला नहीं है। कुछ महानगरों, उपनगरों और चुनिंदा शहरों में उपभोक्तावादी अंधाधुंध विकास के बावजूद, गांव गांव बिजली और उपभोक्ता बाजार पहुंचने के बावजूद, हर हाथ में मोबाइल, एटीएम पेटीएम, जीजीजीजजीजी संचार क्रांति के बावजूद डिजिटल कैशलैस इंडिया का सच यही है कि हमारा यह स्वदेश जनपदों का देश है।

जाहिर है कि गांवों, देहात, किसानों और कृषि के विकास के बिना भारत के विकास का दावा झूठ के पुलिंदा के सिवाय कुछ नहीं है।

औद्योगिक उत्पादन लगातार गिर रहा है क्योंकि तमाम देशी उद्योग, कल कराखाने बंद हो रहे हैं, उनका निजीकरण और विनिवेश बाजार में हुए अबाध विदेशी पूंजी के हितों के मुताबिक अंधाधुंध है।

तमाम सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण हो जाने और यहां तक कि मीडिया पर कारपोरेट पूंजी का वर्चस्व कायम हो जाने की वजह से पढ़ी लिखी नई पीढी व्यापक पैमाने पर बेगोजगार है।

जिस पैमाने पर स्त्री शिक्षा और स्त्री चेतना का विकास हुआ है, उस अनुपात में स्त्री रोजगार और पितृसत्तात्मक समाज में घर बाहर और कार्यस्थल पर उनकी सुरक्षा की गारंटी एक फीसद भी नहीं है।

नई आर्थिक नीतियों के नवउदारवादी मुक्तबाजार बन जाने के बाद कृषि विकास दर शून्य से नीचे पहुंच गयी है।

कृषि संकट सुलझाये बिना आंकडो़ं की बाजीगरी से कृषि विकास दर में ढाई फीसद तक विकास की उपलब्धि पर छप्पन इंच का सीना न जाने कितने इंच का हो गया और सुनहले दिन के सपनों के तहत कृषि विकास दर चार से पांच फीसद बढ़ाने के दावे के बीच जल जंगल जमीन और पर्यायावरण, किसानों और मेहनतकशों, कारोबारियों और खुदरा बाजार, खेत खलिहानों और जनपदों के खिलाफ एकाधिकार कारपोरेट वर्चस्व का डिजिटल कैशलेस फर्जीवाड़ा नरमेध अभियान है।

विकास दर में असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार कृषि को शामिल नहीं किया गया है।

जाहिर है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने राष्ट्रीय आय का जो दूसरा अग्रिम अनुमान पेश किया, उतना इंतजार हाल में शायद ही किसी आंकड़े का किया गया हो। इसलिए कि इनसे न केवल पूरे वर्ष के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्घि के अनुमान मिलते हैं बल्कि तीसरी तिमाही के जीडीपी अनुमान भी ये आंकड़े बताते हैं।  

इन आंकड़ों में अहम बात यह है कि वृद्घि पर नोटबंदी के प्रभाव से काफी हद तक निपटा जा चुका है। विभिन्न क्षेत्रों पर इसका बेहद कम असर हुआ है। इस प्रक्रिया में सीएसओ ने सरकार से बाहर के हर व्यक्ति को चकित कर दिया है।

यानी हिंदुत्व के एजंडे के तहत राम की सौगंध के साथ जिस अर्थव्यवस्था की विकास दर पर संस्थागत फासिज्म का राजकाज और कारपोरेट वित्तीय प्रबंधन बल्ले बल्ले हैं, उससे कृषिजीवी भारतीय बहुसंख्य बहुजन जनता का सीधे बहिष्कार हो गया है।

असंगठित क्षेत्र में जो मेहनतकश और नौकरीपेशा लोग हैं, वे भी हिंदुत्व के झोला छाप अर्थ शास्त्र के दायरे से बाहर हैं और बाहर हैं खुदरा बाजार और कारोबार में शामिल तमाम छोटे और मंझोले वर्ग के कारोबारी।

बेरोजगार युवा और पढ़ी लिखी स्त्रियां भी इस अर्थव्यवस्था के बाहर हैं।

उत्पादन प्रणाली में किसान और मजदूरों का सिरे से सफाया है। इसके बावजूद मीडिया और सर्वदली कारपोरट राजनीति जनविरोधी आर्थिक नीतियों की मनुस्मृति बहाल करने में लगी है।

साठ के दशक से अमेरिका में अमेरिका मीडिया और राजनीति का समर्थ पुलसिसिया अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था के पक्ष में था जिसका नतीजा तेलयुद्ध से लेकर सीरिया का संकट है।

य़ह अमेरिकी वसंत अब मध्यपूर्व और अरब अफ्रीकी देशों, पश्चिम यूरोप के बाद भारत का बदला हुआ मौसम है और तापमान तेलकुंओं की दहकती आंच है।

भोपाल गैस त्रासदी के बाद परमाणु विध्वंस कर्मफल नियतिबद्ध है।

अमेरिकी मीडिया को अपने धतकरम का अंजाम ट्रंप की ताजपोशी से समझ में खूब आ गया है। लेकिन 2014 के बाद भारतीय मीडिया अपने कारपोरेट अवतार में पूरी तरह फासिज्म के अंध राष्ट्रवाद के शिकंजे में है और इसीलिए अंधियारे का तेज बत्तीवाला कारोबार इतना निरंकुश है।

इस लोकतंत्र में फासिज्म के राज में आम जनता कितनी असहाय है, यूपी जैसे निर्णायक चुनाव के मध्य रातोंरात रसोई गैस की कीमत में 86 रुपये की वृद्धि इसका सबूत है। यहीं नहीं, नोटबंदी को जायज ठहराते हुए भुखमरी, बेरोजगारी और मंदी के चाकचौबंद इंतजाम के बीच कैशलैस डिजिटल इंडिया में बैंकों और एटीएम से नकदी की निकासी पर भारी सर्विस टैक्स ऐसे लगा दिया गया है कि उसमें बचत पर ब्याज खप जाये और आगे बैंकों में जमा पूंजी रखने की सजा बतौर अलग से जुर्माना लगाने का इंतजाम है।

नागरिकों को अपनी कमाई, अपनी बचत और जमापूंजी बैक से निकालने के लिए आयकर और दूसरे तमाम टैक्स चुकाने के बाद लेन देन टैक्स चुकाने होंगे।

एक से बढ़कर एक जनविरोधी नीति रोज संसद और संविधान को हाशिये पर रखकर झोलाछाप बिरादरी की सिफारिश पर लागू हो रही है। जरूरत के मुताबिक जब चाहे तब पैमाने, परिभाषा और आंकड़े गढ़कर मीडिया में पेड न्यूज के तहत हर गलत नीति को विकास का गेमचेंजर बताया जा रहा है।

यही नहीं, जेएनयू, जादवपुर, हैदराबाद समेत देश भर के विश्वविद्यालयों में मनुस्मृति राजकाज के तीव्र विरोध के बावजूद बजरंगी सेना ने ऐन यूपी चुनाव के बीच जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में ऊधम मचाकर धार्मिक ध्रुवीकरण का माहौल बनाया है, एक इक्कीस साल की शहीद की बेटी के खिलाफ बेशर्म बलात्कारी अभियान चलाकर जिसतरह महिलाओं और छात्र युवाओं पर हमले किये हैं तो इसके पीछे के राजनीतिक समीकऱण को समझना भी जरूरी है।

यह सारा खेल बुनियादी मुद्दों और समस्य़ाओं को किनारे करके हिंदुत्ववादी सुनामी फिर 2014 की तर्ज पर पैदा करने की सुनियोजित साजिश है ताकि हारे हुए यूपी जीतकर सत्ता पर ढीली हुी पकड़ मजबूत की जा सके।

सत्ता के लिए यह धतकरम जघन्य राष्ट्रद्रोह है।

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