समस्या यहीं है . बाहर रणभूमि है और हम फेसबुक- whatsapp का लोगो बदल कर आयुष्मान भवः - आयुष्मान भवः खेल रहे हैं

मैं एक मार्क्सवादी हूँ, मुझे अलग से स्त्रीवादी होने की आवश्यकता नहीं....

अतिथि लेखक

बातचीत

वर्तमान में महिलाओं के ऊपर अत्याचार पर युवा लेखक संजीव ‘मजदूर’ झा से ज्ञान प्रकाश (शिक्षक) की बातचीत.

प्रश्न 1. आज जिस तरह की घटनाएँ ख़ासकर महिलाओं के संदर्भ में देखने को मिल रही है, उसे आप किस रूप में देखते हैं?

जवाब –“ मैं उस वाक्य को बार-बार दुहराने के पक्ष में नहीं हूँ जिसे इस दुनियाँ के लगभग विद्वानों ने बार-बार कहा है कि—आपका समाज कितना प्रगतिशील है, विकसित है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उस समाज में महिलाओं की स्थिति या अधिकार का स्वरुप कैसा है. आज जो स्थितियां हैं उसमें कोई दो राय नहीं कि महिलाओं पर अत्याचार बढे हैं, और सिर्फ अत्याचार ही नहीं बाधा है बल्कि उस अत्याचार को ग्लोरिफाय करने की प्रवृति भी बढ़ी है। मसलन यदि कोई रेपिस्ट है और वह इस बात की पब्लिसिटी भी करता है, उसके पक्ष में एक महौल भी बनता है इसका अर्थ यह हुआ की समस्या सिर्फ उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्या की मूल प्रवृति कहीं न कहीं हमारे समाज में भी फैली हुई है। इसलिए जब तक सामाजिक स्तर पर बहुत बड़ी पहल नहीं होगी तब तक इन समस्याओं से भी हमें मुक्ति नहीं मिल सकती है.

प्रश्न 2.  बलात्कार सम्बन्धी घटनाओं के विरोध में जो विरोध है क्या उसे आप सामाजिक स्तर पर उस तरह की पहल नहीं मानते हैं जिस तरह की पहल की बात अपने कही ?

जवाब- देखिए, विरोध से संतुष्ट होना और विरोध की भूमिका में प्रभावशाली बदलाव की सिफारिश करना दो अलग-अलग बातें हैं . जिसे हम विरोध कह रहे हैं वहाँ भी कई स्तर का विरोध है, कुछ प्रभावशाली विरोध हैं और कुछ विरोध अप्रासंगिक भी हैं जो लोग जमीन पर उतरते थे वे आज भी जमीन पर उतरते हैं और जो दूर से सिर्फ गर्माहट अनुभव कर खुद को प्रतिरोधी समझने में का स्वांग भरते थे वे आज भी जमीन पर उतरने से बचते हुए एक फैशन की तरह खुद को प्रतिरोधी साबित करने में भिड़े हुए हैं . समस्या यहीं आती है कि दूर से देखने पर एक बहुत बड़ी भीड़ प्रतिरोध की भीड़ दिखती है लेकिन जब हम थोड़े नज़दीक आते हैं तब देखते हैं कि जो दूर से एक मुक्कमल प्रतिरोध था वहां वास्तव में एक गुटबाजी भी है. इसलिए मेरा मानना तो यह है कि समस्याओं का  समाधान तो  दूर की बात है पहले हम समस्यों पर एक समझ तो तैयार कर लें.

प्रश्न 3. इसका अर्थ तो यह हुआ कि विरोध हो रहा है उसे आप समाधान के रूप में नहीं देखते ?

  जवाब – देखिए, जो विरोध हो रहा है उसका सम्मान करना एक बात है और उसे मुक्ति के साधन के रूप में स्वीकार करना दूसरी बात है . अगर मैं कम शब्दों में कहूँ तो जो समाज लगातार समस्याओं के आधार पर विचित्र रूप में परिवर्तित होता रहा है वहां आपके उपचार में परिवर्तन न होना अपने आप में गहरी समस्या है. इसलिए आप देखेंगे कि जिन आंदोलनों से समाज में एक धमक पड़ती थी, आज वे सभी आन्दोलन परिणामों के आधार पर बेजान पड़े हैं . ऐसा इसलिए है क्योंकि समस्याएँ तो गंभीर से गंभीर होती गयी लेकिन आन्दोलन के स्वरुप में परिवर्तन नहीं हुआ . इरोम शर्मीला के सोलह-सत्रह वर्ष के भूख हड़ताल का क्या परिणाम निकला ? इससे पहले सैंकड़ों मासूम बच्चों की मौत का क्या परिणाम निकला ? हजारों बलात्कार का आखिर क्या परिणाम निकला ? माफ़ कीजिए जो लोग यह कहने भर से अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझते हैं कि ‘हम कम से कम आवाज़ तो उठा रहे हैं’ मैं इसे पूर्ण नहीं मानता हूँ . दरअसल वे ऐसा कह कर खुद को ठग रहे होते हैं .

प्रश्न 4. आपने फैशन की बात कही लेकिन हमने देखा कि आपने भी अपने Whatsapp और Facebook  पर ‘जस्टिस फॉर आसिफा’ का लोगो लगाया है . तो क्या आप फैशन में नहीं हैं ?

जवाब – बिल्कुल मैं इस बात से इनकार नहीं करता . मेरे विश्वविद्यालय के मित्रों ने यह फैशन चलाया और मैं भी उन्हें कहीं न कहीं उन्हें खुश करने की कवायद में इस फैशन में शामिल हो गया . लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं इस फैशन की सच्चाई से अनभिज्ञ  हूँ .

प्रशन 5 . तो क्या है सच्चाई ?

जवाब – देखिये, महाभारत का एक प्रसंग है . कर्ण के निर्णायक युद्ध से पहले जब गांधारी उसे अपने शिविर में बुलाती है तब वह कर्ण के समक्ष तो उसकी चिंता करती है लेकिन अर्जुन जीवित रहे कामना इस बात की करती है . इस लम्बे प्रसंग के अंत में कुछ बातें ध्यान देने योग्य है . कर्ण जब पूछता है कि ‘हे माते आज मुझे और अर्जुन में से आप किसे सूर्यास्त देखना का आर्शीर्वाद देंगी ?’ गांधारी अस्पष्ट उत्तर देती है . और जब जाते हुए कर्ण को ‘आयुष्मान भव’ का आशार्वाद देती है तब कर्ण कहता है कि ‘हे माते इस रणभूमि में अब इस आशीर्वाद का कोई मूल्य नहीं है . यह आशीर्वाद तो आपने अपने प्रिय दुःशासन को भी दिया होगा, जिसका रक्तपान भीम कर चुका है.’

समस्या यहीं है . बाहर रणभूमि है और हम और आप फेसबुक और whatsapp का लोगो बदल कर आयुष्मान भवः-आयुष्मान भवः खेल रहे हैं . स्वाभाविक है आज की रणभूमि में इस खेल का कोई औचित्य नहीं है .

प्रश्न 6 . तो आज जो विश्वविद्यालयों में विरोध हो रहा है उसे भी आप मूल्यहीन समझते हैं ?

जवाब- मैं इसे मूल्यहीन ही नहीं समझता बल्कि इसके साथ मैं विश्वविद्यालयी समाज की भूमिका को अरुंधती रॉय के ‘क्लास पोर्नोग्राफी’ से भी जोड़कर देखता हूँ .

प्रशन 7 (जवाब के बीच में हस्तक्षेप करते हुए प्रश्न) आपका संबंध वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय से रहा है वहाँ के शिक्षक और शिक्षिका भी विरोध कर रहे हैं तो आप इसे जोड़ते हुए अपना जवाब दें .

जवाब – बिलकुल, देखिए बात समझने की है . विश्वविद्यालय में कई प्रकार के शोषण होते हैं . आप ध्यान दें तो पाएंगे कि अधिकांश शोषण जिन शिक्षक-शिक्षिकाओं की सहमति और कहीं कहीं उनके हस्ताक्षर से होते हैं यदि वही  शिक्षक-शिक्षिका किसी एक घटना में समाज के पक्ष में खड़े हों तो यह बात चिंता के साथ  साथ सतर्क होने की भी बात है .

विश्वविद्यालय स्तर पर मैं एक बात स्पष्ट कर दूँ कि जे.एन.यू. और उसी सरीखे एक दो अन्य विश्वविद्यालयों की भूमिका और वर्धा विश्वविद्यालय की भूमिका अलग-अलग रूप में है . इनके रूप को समझने के लिए आपको नव-उपनिवेशवादी खेल को समझना होगा . आप देखिये कि जहाँ जे.एन.यू. के शिक्षकों को गलत लगता है वहां वे सिर्फ राज्य के विरोध में ही नहीं खड़े होते, बल्कि अपनी-अपनी भूमिका स्पष्ट रूप में तय करते हुए क्लास लेना भी बंद करते हैं और सही दिशा में पूरे देश को एक मेसेज देने में सफलता हासिल करते हैं. क्या यही स्थति अन्य विश्वविद्यालयों की है ? आप देखिये कि आज तक तथाकथित शिक्षक और शिक्षिकाओं ने (सभी नहीं) वर्धा विश्वविद्यालय में दोहरी नीति अपनाई है. वे एक तरफ फीस बढ़ोतरी के दस्तावेज पर साइन भी करेंगे और दूसरी तरफ काना-फूसी करते हुए छात्रों को प्रशासन के खिलाफ भी करेंगे. यह कैसी भूमिका है? विश्वविद्यालय के अंदर सैंकड़ों किस्म की समस्याएँ हैं लेकिन वहां उनकी भूमिका आप शून्य देखेंगे . बात यहाँ के स्त्रीवाद की चली तो मैं यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि जो अधिकार देश की उन महिलाओं के लिए भी हैं जहाँ शोषण अपने चरम पर है वहाँ यदि अधिकार का एक अंश भी नहीं पहुँचता है तो उसके पीछे इस तरह के लोगों की अपनी अकर्मण्यता, स्वार्थीपन और अवांछित संलिप्तता भी मुख्य कारण है. स्त्रीवाद की समझ यदि बदला लेने की भूमिका से है तो आप वहां लोकतांत्रिक तरीके से बात भी नहीं कर सकते.

जो लोग आज इस घटना पर बाहर निकले हैं क्या इससे पहले इसी विश्वविद्यालय के अंदर की सैंकड़ों घटनाएँ जो दलितों और स्त्रियों से संबंधित थी, उस पर अपनी भूमिका तय कर पाए ? देखिए शिक्षकों का समाज खाया पिया बौराया समाज है वहां से अधिक उम्मीद रखना बेवकूफी से कम नहीं है. हाँ जब मैं यह बात कह रहा हूँ तब मैं यह भी कह रहा हूँ कि ऐसा हरेक शिक्षक पर लागू नहीं होता.

संक्षेप में यदि सर्वेश्श्वर दयाल सक्सेना की भाषा में कहूँ तो ‘यह एक फर्जी लडाई है जहाँ घुटते हुए गले की आवाज को ही सुर समझ लिया जाता है .

खैर, हिंदी विश्वविद्यालय में स्त्रीवाद की समझ दुनिया के किसी भी आश्चर्य से कम नहीं. इसलिए मैं कहूँगा कि उसपर बात करना एक तरह से समय को जाया करना है.

प्रश्न :- लोग तो आपको भी ‘स्त्रीवाद’ का  विरोधी मानते हैं.

जवाब –: समस्या यहाँ यही है. किसी स्त्री का विरोध जब स्त्रीवाद का विरोध हो जाए और किसी मार्क्सवादी का विरोध जब मार्क्सवाद का विरोध समझ लिया जाए तो ऐसी स्थिति में आप उनके दिए अलंकारों पर समय जाया न करें यही एक मार्ग अनुसरण करने को आपके पास बचता है.

प्रश्न -: तो क्या आप खुद को स्त्रीवादी मानते हैं?

जवाब --: मैं एक मार्क्सवादी हूँ, मुझे अलग से स्त्रीवादी होने की आवश्यकता नहीं.

प्रश्न:- आपने ‘हिंदी का नारीवाद’ से लेकर ‘बी. एच. यू.’ की घटना पर ख़ासकर ‘सिंहासन ख़ाली करो’ जैसे कई लेखों में बार-बार आंदोलनों के स्वरुप पर बात की है, तो क्या आपके पास कोई रूप-रेखा है?

जवाब;- नहीं. ऐसा नहीं है. लेकिन ऐसा हो और हम इसकी तैयारी करें कि बार-बार हमें असफ़ल न होना पड़े. इसलिए मानसिक स्तर पर हमें तैयार तो रहना ही चाहिए. हाँ, मैं इतना जरुर कहूँगा कि टुकड़ों में हो रहे आंदोलनों को एकजुट होने की आवश्यकता तो है ही साथ ही स्त्री,दलित और मुस्लिमों की एकजुटता भी अनिवार्य है.

प्रश्न:- आप कोई मेसेज देना चाहेंगे.

जवाब;- मैं उस स्थिति में तो नहीं हूँ बस इतना ही कहूँगा कि जो सड़क पर आंदोलनरत हैं मैं उनका सम्मान करता हूँ और जो फैशनबाज हैं उनके प्रति मेरे अंदर कोई सम्मान का भाव नहीं है. 

  धन्यवाद. 

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