दो जघन्य पाशविक अपराध : न्यायपालिका के ऐतिहासिक निर्णय

सच पूछा जाए तो इन दोनों घटनाओं के विवरण के लिए किसी भी भाषा के शब्दकोष में उपयुक्त शब्द नहीं है) घटनाओं के संबंध में न्यायपालिका के निर्णय घोषित हुए हैं। ये दोनों निर्णय मई 2017 में घोषित किए गए।...

एल.एस. हरदेनिया

पिछले सप्ताह दो अत्यधिक दिल दहला देने वाली पाशविक (शायद इन दोनों घटनाओं का विवरण देने के लिए ये शब्द कम ही पड़ते हैं।

सच पूछा जाए तो इन दोनों घटनाओं के विवरण के लिए किसी भी भाषा के शब्दकोष में उपयुक्त शब्द नहीं है) घटनाओं के संबंध में न्यायपालिका के निर्णय घोषित हुए हैं।

ये दोनों निर्णय मई 2017 में घोषित किए गए।

पहले निर्णय का संबंध गुजरात के वर्ष 2002 के नरसंहार के दौरान 19 वर्षीय बिलकीस बानो के सामूहिक बलात्कार से है।

दूसरे निर्णय का संबंध वर्ष 2012 में 23 वर्षीय युवती के साथ हुए बलात्कार और बाद में उसकी निर्मम हत्या से है। दोनों घटनाओं ने न सिर्फ देश की बल्कि सारी दुनिया की आत्मा को झकझोर दिया था।

वर्ष 2002 की इस घटना को सर्वोच्च न्यायालय ने नृशंस और बर्बर बताया है। बिलकीस बानो मामले में बंबई की हाईकोर्ट ने 18 लोगों को सज़ा सुनाई है। इन अपराधियों ने न सिर्फ गर्भवती बिलकीस के साथ बलात्कार किया था वरन उसके परिवार के सदस्यों की हत्या भी की थी। कुल मिलाकर इस मामले में 18 लोगों को सज़ा दी गई है।

हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट द्वारा 11 व्यक्तियों को दी गई सज़ा को सही करार दिया है और उसके साथ ही सात लोगों के संबंध में निचली अदालत के निर्णय को निरस्त करते हुए उन्हें सज़ा सुनाई है। इस तरह कुल 18 लोगों को अपराधी माना गया है। इनमें गुजरात पुलिस के अधिकारी तो शामिल हैं ही उसके साथ ही कुछ डॉक्टरों को भी अपराधी पाया गया है। ये डॉक्टर गुजरात के सरकारी अस्पतालों में काम करते थे। हाईकोर्ट  अपने निर्णय में कहा है कि हमें इस बात का दुःख है कि इस मामले का निर्णय होते-होते 15 वर्ष लग गए। इस मामले के सभी आरोपी उस समय से ही जेल में हैं।

हाईकोर्ट ने अभियोजन की ओर से दी गई अपील को सही माना है।

इस अपील के अनुसार पांच पुलिसकर्मियों और दो डॉक्टरों को सज़ा सुनाई गई है। अपने निर्णय में हाईकोर्ट कहती है कि इस मामले में सच और झूठ को इस तरह गड्डमगड्ड किया गया कि सच का पता लगाना एक कठिन काम था। झूठ के पर्दे के पीछे बार-बार सच को छुपाने का प्रयास किया गया। पुलिस और डॉक्टरों ने जांच के दौरान एक नहीं सैंकड़ों गलतियां जानबूझकर कीं। यह उजाले की तरह साफ है कि पुलिस ने पूरा प्रयास किया था कि बलात्कार की घटनाओं को छुपाया जाए।

बिलकीस के बयानों को भी और खासकर अतिरिक्त बयानों को साफ ढंग से ईमानदारी से रिकार्ड नहीं किया गया और बिलकीस के मुंह पर लगभग ताला लगा दिया गया, जिससे वह न तो सच बात बता सके और न्याय को पुकारने वाली उसकी चीखें न सुनी जा सकें।

जिस दिन घटना हुई थी उस दिन बिलकीस की मेडिकल जांच नहीं करवाई गई। यद्यपि बिलकीस साफ-साफ कह रही थी कि उसके साथ बलात्कार किया गया है और उसके शरीर पर अनेक चोटें हैं। उसे रात भर पुलिस स्टेशन पर रोककर रखा गया जो स्वयं एक अत्यधिक जघन्य अपराध था। फिर दूसरे दिन उसकी मेडिकल जांच कराई गई।

बिलकीस की कई भूमिकाएं थीं। वह स्वयं तो पीड़ित थी ही अपने परिवार के लोगों की हत्या की सूचना देनी वाली भी थी। बिलकीस को उस जगह नहीं ले जाया गया जहां हत्याएं हुईं थीं। न सिर्फ बिलकीस बल्कि जिनकी हत्याएं हुईं थीं उनके अन्य संबंधियों को भी घटनास्थल पर नहीं ले जाया गया। मृत व्यक्तियों का अत्यधिक जल्दबाजी में पोस्टमार्टम कराया गया और बिना किसी देरी के उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। लाशों के साथ नमक से भरी बोरियां रख दी गईं, जिससे मृत शरीर पूरी तरह से गल जाएं।

डॉक्टरों का रवैया तो पूरी तरह दुर्भाग्यपूर्ण और भर्त्सना के योग्य था। उन्होंने पोस्टमार्टम से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण सूचनाओं को दबाकर रखा। वैसे यह कहा जा सकता है कि डॉक्टरों का किसी भी जांच से क्या लेना देना। परंतु यह बात यहां लागू नहीं होती है क्योंकि इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि डॉक्टरों ने सभी शवों का पोस्टमार्टम न तो ठीक से किया और कुछ मामलों में तो किया ही नहीं। एक मामले में तो डॉक्टरों ने सिर्फ इतना ही कहा कि मृत व्यक्ति के प्रायवेट अंगों को चोट पहुंची है। परंतु इस मृत महिला के फोटो देखने से स्पष्ट लगता है कि पहले उसके साथ बलात्कार किया गया और फिर उसकी हत्या की गई। इतने महत्वपूर्ण तथ्य को डॉक्टरों ने छुपाया।

गोधरा में हुए अग्निकांड के तीन दिन बाद बिलकीस बानो अपने परिवार के लगभग 17 सदस्यों के साथ एक ट्रक में बैठकर अपनी जान बचाने के लिए भाग रही थी। उस समय उसकी आयु 19 वर्ष थी और वह पांच महीने से गर्भवती थी। इस ट्रक के पीछे एक हिंसक भीड़ दौड़ रही थी। थोड़ी दूर जाने पर इस हत्यारी भीड़ ने ट्रक को रोक लिया और उसमें बैठे बिलकीस के परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी। इसमें बिलकीस की बच्ची, मां, उसके सौतेले भाई भी शामिल थे। मरने वालों में एक दो साल की बच्ची भी थी। इसके बाद बिलकीस के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और यह सोचकर उसे वहीं छोड़ दिया गया कि वह जिंदा नहीं है।

किसी ढंग से बची बिलकीस ने स्थानीय पुलिस में रिपोर्ट करने का प्रयास किया। परंतु उसकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। उसके बाद उसने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया और सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की।

सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को आदेश दिया कि वह इस मामले की पूरी जांच करे। परिवार के बचे हुए सदस्यों को आए-दिन धमकियां मिलती थीं, इसलिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया कि उनका मामला गुजरात के बाहर ट्रांसफर कर दिया जाए। उनका अनुरोध मंजूर हुआ और बाद में महाराष्ट्र में यह मामला चला।

मुंबई की ट्रायल कोर्ट में 19 लोगों के विरूद्ध अपराध कायम किया गया। माह जनवरी 2008 में 11 लोगों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। इन पर सामूहिक बलात्कार और हत्या का आरोप लगाया गया था। सीबीआई ने अपील दाखिल की कि कम से कम तीन व्यक्तियों को तो मृत्युदंड दिया जाए। सज़ा बढ़ाने के अनुरोध को निरस्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि बिलकीस से संबंधित पूरे मामले को गुजरात में हुए दंगों और गोधरा की घटना के बाद बने मुस्लिम विरोधी वातावरण के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

सीबीआई ने यह पाया कि स्थानीय पुलिस ने लापरवाही तो बरती ही परंतु जानबूझकर अनेक सबूतों को समाप्त होने दिया और झूठी सूचनाएं थीं। जिन पुलिसकर्मियों और डॉक्टरों को सज़ा दी गई हैं उनके नाम हैं, नर्पत सिंह, इदरीस अब्दुल सैयद, बीकाभाई पटेल, रामसिंह भाभौर, रमनभाई भगोरा, डॉ. अरूण कुमार प्रसाद और डॉ. संगीता कुमार प्रसाद।

निर्णय के बाद मीडिया को जारी एक वक्तव्य में बिलकीस ने कहा ‘‘एक इंसान के रूप में, एक नागरिक के रूप में, एक महिला के रूप में और एक मां के रूप में मेरे समस्त अधिकारों को अत्यधिक निर्दयी तरीके से कुचला गया था। परंतु मुझे अपने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पूरी आस्था थी। मुझे विश्वास है कि अब मैं और मेरा परिवार बिना किसी भय और शंका के साधारण जीवन बिता पाएंगे। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि वे सभी अधिकारी जिन्होंने दुस्साहस करके अपराधियों को बचाया था, जिन्होंने पूरी कौम को नष्ट करने का प्रयास किया था, वे अब कानून के कटघरे में खड़े हैं और उन्हें दंडित किया गया है। यह निर्णय उन अधिकारियों के लिए सबक है जो अपने कर्तव्यों की उपेक्षा कर नागरिकों की रक्षा नहीं करते हैं"।

दूसरा ऐतिहासिक निर्णय

दूसरी घटना का संबंध 23 वर्ष की पैरामेडिकल छात्रा के साथ दिल्ली में हुए जघन्य अपराध से है।

16 दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड की रात को एक चलती हुई बस में इस छात्रा के साथ अत्यधिक निर्मम पाशविक अपराध किया गया था। न सिर्फ उसके साथ बलात्कार किया वरन उसकी अत्यधिक क्रूर तरीके से हत्या भी की गई। इस मामले में लिप्त सभी अपराधियों को सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्यु दंड दिया है। इन अपराधियों उच्च न्यायालय पहले ही सजा सुना चुका था परंतु उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर अपने को निर्दोष बताने का प्रयास किया था। उच्चतम न्यायालय ने उनकी अपील को रद्द किया और उनकी सज़ा को कायम रखा।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और अशोक भूषण की बेंच ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि

‘‘इस मामले में जो बर्बरता और क्रूरता बरती गई थी वह एकदम स्पष्ट है। जिस ढंग से इस छात्रा के साथ व्यवहार किया गया उसकी अत्यधिक तीव्र शब्दों में भर्त्सना करनी चाहिए। ऐसा लगता है कि यह घटना किसी दूसरे विश्व में हुई है। एक ऐसे विश्व में जहां मानवीयता के गुण पाए नहीं जाते हैं। सेक्स की भूख और हिंसा का रौद्र रूप ऐसा था जिसने दुनिया की आत्मा को झकझोर दिया था।"

सर्वोच्च न्यायालय ने अत्यधिक कड़े शब्दों में बार-बार इस घटना की निंदा की है। इस घटना के बाद पूरे देश में भर्त्सना की सुनामी आ गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अपराधियों के तमाम तर्कों को निरस्त करते हुए उनकी सज़ा कायम रखी। अपराधियों ने अपनी अपील में कहा था कि वे गरीब हैं, विवाहित हैं और उनके छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनके वृद्ध मां-बाप हैं और इतने वर्ष जेल में रहने के बाद उन्होंने स्वयं को सुधार लिया है और अब वे इस तरह का अपराध नहीं करेंगे। परंतु उनकी इस अपील को सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं माना।

पीड़िता के माँ-बाप उस समय अदालत में थे जब यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया गया।

स्वाभाविक है उनके चेहरे पर प्रसन्नता थी और वह एक-दूसरे से गले मिल रहे थे। पीड़िता के पिता ने कहा कि मुझे पहले से ही भरोसा था कि सर्वोच्च न्यायालय मौत की सजा के आदेश को कायम रखेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह निर्णय उन सभी के लिए एक संदेश और सबक भी है जो इस तरह के जघन्य अपराध आए-दिन करते हैं।

दिल्ली पुलिस के अधिवक्ता ने कहा कि हमारे देश में कभी-कभी इस तरह के अपराधियों के साथ नरमी बरती जाती है जो उचित नहीं है। पीड़िता की माँ ने भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया और कहा कि यह न्याय मेरे लिए ही नहीं है बल्कि सारे देश के लिए है। सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली पुलिस की प्रशंसा की है जिसने अत्यधिक आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर पूरे मामले की जांच की थी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं)  

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