हास्य और गुस्से का साथ कितना संभव?

सीधे सोशल मीडिया पर कार्टून पोस्ट करना एक नया चलन है. यहां अच्छी-बुरी प्रतिक्रियाएं तुरंत आती हैं. कोई रोकटोक नहीं है. प्रिंट के मुकाबले सोशल मीडिया पर अधिक आजादी है लेकिन इसके साथ खतरे भी जुड़े हैं...

एक अच्छे कार्टून को हंसी के साथ-साथ विचार भी पैदा करना चाहिए

एन. पोनप्पा

29 अक्टूबर को तमिलनाडु के जी. बाला को गिरफ्तार किया गया. उन्होंने एक कार्टून बनाया था. इसमें तीन लोगों को नंगा दिखाया गया था. ये तीनों सिर्फ टाई पहने हुए थे और अपने जननांग को नोट से ढंके हुए थे. उनके पैरों के पास एक बच्चा था जिसकी तस्वीर 2015 में भूमध्य सागर के पास मृत पाए गए बच्चे आयलन कुर्दी की याद दिला रही थी. यह कार्टून उस घटना से प्रभावित थी जिसमें एक मजदूर ने खुद को, अपनी पत्नी को और अपने दो बच्चों को तिरुनवेल्ली के जिलाधिकारी के दफ्तर के बाहर जला लिया था. साहूकारों से परेशान होकर इस व्यक्ति ने छह बार शिकायत की लेकिन फिर भी कुछ नहीं होते देख यह कदम उठाया.

बाला ने अपना कार्टून सोशल मीडिया पर पोस्ट किया. वे सोशल मीडिया पर खासे लोकप्रिय हैं. तमिल में की गई उनकी टिप्पणी के दो अनुवाद हैं. पहले में कहा गया है कि यह कार्टून बेहद आक्रामक था. दूसरे में कहा गया है कि मैंने यह कार्टून बेहद गुस्से में बनाया था. एक अच्छा कार्टून वही है जो हास्य के साथ विचार भी पैदा करे. हास्य के कई पक्ष हैं लेकिन इनमें गुस्सा नहीं है. ये दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते.

त्रासदी को कार्टून में दिखाना बेहद मुश्किल काम है. कई बार परोक्ष रूप से यह काम करना पड़ता है. बाला का कार्टून सीधा वार करता है. उन्होंने बच्चे को जलते हुए दिखाया है. बाकी तीन लोग सरकारी अधिकारी हैं. जो पैसे से अपने निजी अंगों को ढंके हुए हैं. यह कार्टून के लिए सही नहीं है.

साहूकार बहुत अधिक ब्याज दर पर पैसा उधार देते हैं. यह दुर्घटना भी साहूकार द्वारा किए गए अत्याचार का नतीजा है. इसके बावजूद साहूकार को कहीं जिम्मेदार नहीं ठहराया जा रहा है. अगर कार्टून बनाने वाले ने थोड़ा और दिमाग लगाया होता तो और बेहतर तरीके से इसी बात को कहा जा सकता था. इससे बाला विवाद में पड़ने से बच जाते और जेल भी नहीं जाते. साथ ही वे अपनी बात भी कह पाते.

कार्टून सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ. सोशल मीडिया पर ऐसी चीजें बहुत तेजी से फैलती हैं. क्योंकि यहां कोई संपादित करने वाला नहीं है. बाला ने खुद माना है कि यह कार्टून उन्होंने गुस्से में बनाया था और ऐसा करने में उन्होंने सीमाओं का लांघा है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सही इस्तेमाल इस मामले में नहीं हुआ.

सीधे सोशल मीडिया पर कार्टून पोस्ट करना एक नया चलन है. यहां अच्छी-बुरी प्रतिक्रियाएं तुरंत आती हैं. कोई रोकटोक नहीं है. प्रिंट के मुकाबले सोशल मीडिया पर अधिक आजादी है लेकिन इसके साथ खतरे भी जुड़े हुए हैं.

बड़ी तस्वीर देखने से पता चलता है कि प्रिंट मीडिया में अधिक आजादी और सहनशीलता थी. अगर किसी को कुछ साल पहले प्रकाशित कार्टून को फिर से प्रकाशित करना हो तो इसे जांच की एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. विचारों के धु्रवीकरण के बजाए एक व्यापक दायरा पर जोर होता है. इस देश के लोगों को टुकड़ों में बांटा गया है और उन्हें अलग-अलग तरीकों से उकसाना आसान हो गया है.

एक कार्टून की व्याख्या अलग-अलग ढंग से की जा सकती है. इसलिए मौजूदा वक्त में कार्टून बनाते वक्त और अधिक विचार करने की जरूरत है. प्रिंट मीडिया में संपादक होने की वजह से यह कार्टून बनाने वालों के लिए अधिक सुरक्षित है. संपादक किसी कार्टून को प्रकाशित होने से रोक सकता है. कुछ साल पहले तमिल पत्रिका आनंद विकत्तन में एक कार्टून प्रकाशित हुआ था जिसमें विधायकों पर टिप्पणी थी. इससे पत्रिका के संपादक मुश्किल में पड़ गए थे. कार्टून बनाने वाले बच गए थे. इसलिए एक अच्छे संपादक की उपयोगिता को कम करके नहीं आंका जा सकता!

एन. पोनप्पा जाने-माने कार्टूनिस्ट हैं और ईपीडब्ल्यू से जुड़े हुए हैं.

 

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली 

(Economic and Political Weekly, )

हस्तक्षेप मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। आप भी मदद करके इस अभियान में सहयोगी बन सकते हैं।

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।