जापानी बुखार से मौतें : बच्चे मतदाता नहीं हैं और गरीबों की परवाह कौन करता है

टीकाकरण के मामले में, भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल से भी पीछे है। नेपाली मामलों के जानकार वरिष्ठ विशेषज्ञ पुष्परंजन के मुताबिक नेपाल में इंसेफ्लाइटिस वैक्सीन देने का लक्ष्य 75 प्रतिशत तक पूरा हो चुका है...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

देश के सरकारी अस्पतालों की खराब स्थिति की वजह से ही निजी अस्पतालों की चांदी है। सरकारी अस्पताल के प्रांगण में निजी अस्पताल बनाने की सरकारी अनुमति से स्वास्थय के कारोबार में और इजाफा होगा। सरकार को भारत में चिकित्सा सुविधाओं को पुनर्जीवित करने के लिए गंभीर होना होगा ताकि खराब इलाज, सुविधाओं के अभाव में सालाना 52 लाख लोगों को मौत से  बचाया जा सके।

जापानी बुखार से मौतें : बच्चे मतदाता नहीं हैं और  गरीबों की परवाह कौन करता है

जापानी बुखार : बचाव पर सवाल

 

डॉ मुजफ्फर हुसैन गज़ाली

 इंसेफ्लाइटिस (जापानी बुखार) मच्छर जनित रोगों में से एक है। सबसे पहले, जापान के लोगों ने 1871 में इस रोग को जाना , जो जेई (जैपनिज़ इंसेफ्लाइटिस) के नाम से दुनियाभर में कुख्यात है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिमी प्रांत क्षेत्र के 24 देशों के तीन अरब लोग इस की चपेट में आये अधिकांश समय पर इलाज और सतर्कता  के कारण बच गये। भारत में जापानी बुखार के लक्षण तमिलनाडु के एक गांव के कई बच्चों में पहली बार 1955 में देखे गये थे। यह वायरल बुखार 1973 में पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम सहित धान की खेती करने वाले 22 राज्यों में देखते ही देखते फैल गया था। 

जापानी बुखार क्यों होता है इस का जवाब विश्व स्वास्थ्य संगठन के उस सर्वेक्षण से मिला जिसमें पाया गया कि जिन क्षेत्रों में 1970 के बाद किसान गन्ने की खेती छोड़ धान की फसल उगाने लगे, इन क्षेत्रों में जापानी बुखार तेजी से फैला। जापानी इंसेफ्लाइटिस (जेई) 'क्यूलेक्स स्पीशीज़' के कारण होता है। इससे प्रभावित सूअरों और जल में विचरण करने वाले पक्षियों को मच्छर काटते हैं, फिर वही मच्छर इंसान को काटते हैं, इससे इंसेफ्लाइटिस का खतरनाक वायरस शरीर में प्रवेश कर जाता है।

डब्लूएचओ के मुताबिक जेई के 68 हजार मामले दुनिया भर में सामने आते हैं, जिनमें से 13,600 से 20,400 के आस पास बच्चें बडों की मृत्यु हो जाती है। सितंबर 2016 में भारत में 694 बच्चों की मृत्यु हुई थी। बाकी आयु के लोगों को मिला कर देश में कितने लोग इंसेफ्लाइटिस से मर जाते हैं, नीति आयोग और स्वास्थय मंत्रालय को बताना चाहिए लेकिन 2000 के बाद इसके आंकड़े जारी नहीं किये गये हैं। जबकि देश के 11 जिले इंसेफ्लाइटिस से सबसे अधिक प्रभावित हैं।

Dr. M H Ghazali

Dr. M H Ghazali

Sr. Journalist & Columnist

 उत्तर प्रदेश में पहली बार जापानी बुखार का मामला 1978 में सामने आया था। जो क्षेत्र इस से प्रभावित हुए, गोरखपुर उनमें से एक है, हर साल यहां बच्चे और बड़े मरते हैं लेकिन मीडिया ने इस पर इतना ध्यान नहीं दिया जितना कि पांच दिनों में 70 बच्चों की मृत्यु के बाद। जापानी बुखार देश भर में चर्चा का विषय बना। इसके दो बड़े कारण हैं एक इस क्षेत्र से सांसद रहे, वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ  बीआरडी मेडिकल कॉलेज और गोरखपुर में स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हाली का अक्सर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने सांसद के रूप में 2003 से 2014 तक खराब चिकित्सा सुविधाओं और जेई से बच्चों की मृत्यु का मामला 20 बार संसद के सामने रखा। अगर उनकी उपस्थिति में चिकित्सा कर्मियों की लापरवाही होगी तो सवाल उठना स्वभाविक है। दूसरे, वह 2014 से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को यूपी में इंसेफ्लाइटिस की रोक थाम के लिए सचेत करते रहे हैं। क्या केंद्र ने उनकी बात को महत्व नहीं दिया या वह अपनी बात समझा नहीं पाये। जिस प्रकार के सवाल वह उठाते रहे हैं जब उसी तरह के सवाल उनके सामने आए तो वह जिम्मेदारी से बचते नजर आये। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 12 राज्यों में 367 लोगों की मौत के बाद, जिन में से 228 मौतें केवल उत्तर प्रदेश में हुई थीं उस समय की एनडीए -1 सरकार ने गोरखपुर को टीकाकरण के लिए चुनाव था। 

योगी आदित्यनाथ ने 13 जुलाई 2009 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को संबोधित करते हुए संसद में कहा था कि देश में इंसेफ्लाइटिस से 2005 में 1682 जानें गई थीं, उनमें से 1500 लोग यूपी में मरे थे। बीआरडी कॉलेज में मरने वालों की संख्या 937 थी, 2006 में 431, 2007 में 516, 2008 में 410 और 200 9 में अब तक 98 मौतें हो चुकी हैं। उनका कहना था कि केंद्र सरकार जो संसाधन राज्य सरकार को दे रही है वह उसे अच्छी तरह उपयोग नहीं कर रही जिसके कारण बीआरडी कॉलेज की खराब स्वास्थ्य व्यवस्था का वजन पूर्वी यूपी के लोगों पर पड़ रहा है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2009 में 784, 2010 में 514 और 2011 में 618 मौतें हुई थीं। वर्तमान में, केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार है, फिर राज्य का नेतृत्व उस व्यक्ति के हाथ में है जो मामले की जानकारी रखता है। ऐसे में जनता को स्थिति के बदलने की उम्मीद करनी ही चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं है। मृतक या तो बच्चे हैं या फिर गरीब लोग, जो शायद सरकार की प्राथमिकता में नहीं हैं। बच्चे मत दाता नहीं हैं और  गरीबों की परवाह कौन करता है

वायरस और बैक्टीरिया जनित बीमारियों से रक्षा के लिए, टीकाकरण  कम लागत वाला प्रभावी और सुरक्षित तरीका है। जेई से बचाव के टीके की बात करें तो इसे बनाने में भारत को 82 साल  लगे। इंसेफ्लाइटिस की रोक थाम के लिए 1930 में ' जेई वैक्स '  के नाम से वैक्सीन विकसित हुआ, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुरक्षित माना था। इसकी मार्केटिंग  फ्रांस के लियो शहर में सानोफी पास्टर नामक कंपनी ने शुरू की थी। वहीं चीन 1 9 68 में अपने नागरिकों के लिए 'पेइचिंग-थ्री' जैसी इंसेफ्लाइटिस वैक्सीन उपलब्ध करा चुका था। 1988 में दूसरी पीढ़ी की वैक्सीन ' एसए.14 'और' चीमेरीवैक्स-जेई ' चीन ने अपने लोगों को उपलब्ध कराना आरंभ कर दिया था। हर साल, चीन में दो करोड़ बच्चों को अनिवार्य रूप से इंसेफ्लाइटिस से बचाव के टीके लगाये जाते हैं। 2012 में भारत की बायोलॉजिकल ई लिमिटेड नामक फार्मा कंपनी ने 'जीव' ब्रांड से वैक्सीन निकाली, जिसकी कीमत 9 85 रुपये  थी। इसे केवल एक बार लेना था, जो मूलतः भारत आने वाले पर्यटकों के लिए तैयार की गई थी। 2013 में कर्नाटक के कोलार जिले में 'भारत बायोटेक इंटरनेशनल' भी  वैक्सीन तैयार करने में सफल रही। सभी ट्रायल के बाद पाया गया कि यह वैक्सीन बच्चे से लेकर 50 वर्ष तक के लोगों के लिए सुरक्षित है। इस वैक्सीन को दो बार दिया जाना था। पहला 9 से 12 महीनों के बीच और दूसरा 16 से 24 महीनों के बीच 'डीपीटी-ओपीवी ' के साथ। सवाल यह है कि प्रभावित जिलों में यह टीका कितने लोगों को दिया गया। 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक, एक से पन्द्रह साल तक के 75 प्रतिशत बच्चों को दूसरी खुराक मिली ही नहीं। इस मामले में राज्य केंद्र के और केंद्र राज्य के सर पर ठीकरा फोड़ते नज़र आते हैं। 

टीकाकरण के मामले में, भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल से भी पीछे है। नेपाली मामलों के जानकार वरिष्ठ विशेषज्ञ पुष्परंजन के मुताबिक नेपाल में इंसेफ्लाइटिस वैक्सीन देने का लक्ष्य 75 प्रतिशत तक पूरा हो चुका है। नेपाल जैसे गरीब देश  ने राष्ट्रीय इमुनाइजेशन प्रोग्राम (एनआईपी) के 2011 से 2016 तक के आंकड़े उपलब्ध करा रखे हैं। एनआईपी के अनुसार, देश के 75 जिलों में  से 31 जिलों के 75% बच्चों को जेई वैक्सीन दी जा चुकी है। इस संबंध में नेपाल ने चीन से मदद ली थी। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 से 5.0 प्रतिशत के बीच खर्च होना चाहिए, लेकिन भारत इस बुनियादी जरूरत के लिए 1.2% ही खर्च कर रहा है। स्वास्थय साधन जुटाने के मामले में भारत बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पीछे है। इस कारण चिकित्सक और पैरा-मेडिकल के हजारों पद खाली पड़े हैं। जिस तेजी से स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ रही है उस तेजी से इस क्षेत्र के बजट में वृद्धि नहीं  हो पा रही जबकि भारत में स्वास्थ्य सेवा का व्यवसाय 22% की उच्च गति से आगे बढ़ रहा है। सभी प्रमुख अस्पताल शहरों में हैं इसलिए ग्रामीण इलाकों की हालत और गंभीर है। चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच के मामले में भारत 195 देशों में 154 वें स्थान  है। डॉक्टरों की बात की जाए तो 1700 लोगों पर एक डॉक्टर है जबकि एक हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। डॉक्टरों की कमी में चिकित्सा परिषद का फरमान भी आडे आ रहा है, जिसके तहत एमबीबीएस डॉक्टर इलाज के योग्य नहीं हैं, जब तक कि वह स्नातकोत्तर न हो जायें। जबकि पोस्ट ग्रेजुएशन की सुविधा देश में आसानी से उपलब्ध नहीं है। महाराष्ट्र ने सीपीएस डिप्लोमा को मंजूरी दे कर डॉक्टरों की कमी को दूर और सेवाएं लेने का जो तजुर्बा किया वह सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में बहुत उपयोगी साबित हुआ। 

देश के सरकारी अस्पतालों की खराब स्थिति की वजह से ही निजी अस्पतालों की चांदी है। सरकारी अस्पताल के प्रांगण में निजी अस्पताल बनाने की सरकारी अनुमति से स्वास्थय के कारोबार में और इजाफा होगा। सरकार को भारत में चिकित्सा सुविधाओं को पुनर्जीवित करने के लिए गंभीर होना होगा ताकि खराब इलाज, सुविधाओं के अभाव में सालाना 52 लाख लोगों को मौत से  बचाया जा सके। बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए इमुनाइजेशन का 100 प्रतिशत का लक्ष्य  प्राप्त करना होगा, चाहे इसके लिए बाहर की सहायता ही क्यूं न लेनी पडे।

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