विकास के दौर में किसानों की बढ़ रही आत्महत्याओें को भी सरकारी तंत्र गंभीरता से नहीं लेता

राष्ट्रीय संकट हो गया है किसान संकट ... समस्याग्रस्त है हमारा कृषि माडल ही... ...

विकास के दौर में किसानों की बढ़ रही आत्महत्याओें को भी सरकारी तंत्र गंभीरता से नहीं लेता

किसान प्रश्न पर कुछ बातें

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

जुलाई 8, 2018 टाईम्स आफ इंडिया में एक चर्चित अर्थशास्त्री का लेख कहता है कि केंद्र सरकार ने खरीफ फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ा कर गलती की है क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा मांग-आपूर्ति के नियमों के विरूद्ध है।

लेख आगे कहता है कि ‘यूरोपीय आर्थिक समुदाय’ ने एक बार फसलों के मूल्य को बढ़ा कर गलती की थी और बाद में उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। यूरोप और भारत के किसानों की तुलना अपने आप में सही नहीं है। भारत का किसान अपनी फसलों का बाजार दाम भी नहीं पाता है जबकि यूरोप के किसान कृषि उपज और बाजार के लिए भी भारी स्तर पर अपनी सरकारों द्वारा सब्सिडी पाते हैं। ए 2, ए 2+एफएल, सी 2 की तकनीकी व्याख्या में जाने की जगह सरल रूप से समझे कि किसी माल की कीमत तय करने के लिए उसमें लगी श्रम शक्ति, पूंजी ब्याज, जमीन रेंट तथा अन्य संसाधनों की कीमत जुड़ती है। लेकिन यहां के किसानों की फसलों की कीमत तय करने में सरकारें जमीन का रेंट और पूंजी ब्याज को नहीं जोड़ती हैं। चाहें किसानों के भूमि अधिग्रहण का मामला हो या उनकी फसलों और अन्य उत्पादों की कीमत तय करने का मामला हो उसकी कीमत बाजार के नियमों के अनुसार नहीं तय की जाती है।

उदारीकरण के इस दौर में भी जहां विदेशी कृषि उत्पाद पर लगे मात्रात्मक प्रतिबंध हटा दिये गये हैं, सीमा शुल्क घटा दिया गया है वहीं अभी भी यहां के ढेर सारे कृषि उत्पादों के निर्यात पर केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा है। उदारीकरण के ये दो नमूने यहां देखने को मिलते है। ग्रामीण क्षेत्र में निवेश घटता जा रहा है जबकि अभी भी भारत का अधिकांश किसान सिंचाई के लिए मानसून पर निर्भर है। कुछ अर्थशास्त्री तो यह भी तर्क देते हैं कि खेती और निवेश पैसे की बर्बादी है। क्योंकि कृषि का जीडीपी में हिस्सा अब घट कर लगभग 17 प्रतिशत रह गया है और अब कृषि विकास दर 2 प्रतिशत से अधिक भी हो जाये तो जीडीपी में खास बढ़ोतरी नहीं होगी। राजकोषीय घाटा को लेकर वे बराबर चिंतित रहते हैं और उसे 3 प्रतिशत से ऊपर न बढ़ने देने के लिए तर्क देते हैं लेकिन कारपोरेट घरानों द्वारा बैंक परिसंम्पतियों की गई लूट और राजस्व वसूली में दी गई लाखों करोड़ की छूट पर चुप्पी साधे रहते हैं। जबकि वित्तीय घाटा न बढ़ने देने के इस तर्क से वे कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मद पर कम हो रहे निवेश को सही ठहराते हैं। ऐसे अर्थशास्त्री यह ध्यान नहीं देते हैं कि कृषि क्षेत्र में विकास के बगैर मैन्यूफैक्चरिंग व सेवा क्षेत्र में विकास दर टिका पाना संभव नहीं होगा। किसानों की बढ़ रही आत्महत्याओें को भी सरकारी तंत्र गंभीरता से नहीं लेता है। कुछ विकास के दौर में ऐसा होना स्वाभाविक मानते हैं और यूरोप के किसानों की खेती से बेदखली का उदाहरण देते हैं। लेकिन यूरोप के किसानों के बारे में उनकी यह गलत समझदारी है। यूरोप के किसानों के पास यह विकल्प था कि वे वहां विकसित हो रहे उद्योगों में जायें या अपने देश के उपनिवेशों में जाकर बस जायें।

हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि कृषि क्षेत्र के उपेक्षा के बावजूद अभी भी जीडीपी बनाने में इसकी भूमिका है और लगभग 50-55 प्रतिशत श्रम शक्ति कृषि क्षेत्र में लगी हुई है।

राष्ट्रीय संकट हो गया है किसान संकट  

किसान संकट ने राष्ट्रीय संकट का स्वरूप ले लिया है, लेकिन कांग्रेस की मनमोहन सरकार से लेकर मोदी सरकार ने किसानों के फसलों के समर्थन मूल्य, उसकी खरीद और समय से भुगतान के लिए भी कोई ठोस पहल नहीं ली है यहां तक कि फसलों की खरीद के लिए कोई राष्ट्रीय कानून भी नहीं बनाया गया है।

मोदी राज में राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने 3 साल से किसानों की आत्महत्याओं के आकड़े भी प्रकाशित करना बंद कर दिया है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को नष्ट करना मोदी राज का स्वाभाव है। बताया यह जा रहा है कि शायद अब अपराध रिकार्ड ब्यूरो किसानों की आत्म हत्याओं का आकड़ा ही न प्रकाशित करे।

समस्याग्रस्त है हमारा कृषि माडल ही

बहरहाल किसान संकट बुनियादी और ढ़ाचागत है और उदारीकरण के इस दौर में यह और गहरा तथा जानलेवा हो गया है। किसानों का संकट बुनियादी इन अर्थों में भी है कि हमारा कृषि माडल ही समस्याग्रस्त है। कुछ लोग कहते हैं कि कृषि विकास का किसान केंद्रित जो अमरीकी माडल है उसके बरक्स मूलतः भूस्वामी केंद्रित प्रशियाई माडल को कृषि विकास के लिए यहां के शासक वर्ग ने चुना है जिसकी वजह से देश में भूमि सुधार कार्यक्रम ईमानदारी से लागू नहीं हुआ। आज भी लगभग 30 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास घर की जमीन को छोड़कर खेती के लिए कोई जमीन नहीं है।

एनएसएसओ का सर्वेक्षण बताता है कि देश में लगभग 10 करोड़ जोते हैं। जिसमें 7 करोड़ जोतों का आकार 2.5 एकड़ से भी कम है। आम तौर पर ग्रामीण आबादी को किसान के रूप में देखने का प्रचलन है। किसानों का राष्ट्रीय आयोग एनसीएफ जिसे स्वामीनाथन कमीशन के बतौर जाना जाता है, ने भी ग्रामीण आबादी को किसान के रूप में ही चिन्हित किया है।

बहरहाल ग्रामीण संरचना में बड़ा बदलाव हो रहा है, एक तरफ किसानों की संख्या घट रही है वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण मजदूरों की संख्या बढ़ रही है जो विभिन्न जगहों पर श्रम शक्ति बेच कर अपना जीवन यापन करते हैं। मजदूर और किसान में शत्रुता पूर्ण नहीं तो भेद का भाव तो रहता ही है। दोनों के परस्पर हित को ध्यान में रखते हुए उनके लिए मुद्दों और नीतियों को सूत्रबद्ध करने और उनके बीच एकता कायम करने की जरूरत है। भूमि अधिग्रहण के विरूद्ध खड़े हुए किसान आंदोलन में इनकी एकता भी दिखी है। जहां किसानों और मजदूरों ने अपनी जमीन और रिहायशी इलाकों को बचाने की लड़ाई मिल कर लड़ी है। ग्रामीण गरीबों की कर्ज माफी, रोजगार, सहकारी समितियों का नये आधार पर गठन के सवाल पर उनकी एकता बढ़ सकती है। ग्रामीण अंचल में वर्गीय सामाजिक भेदभाव के बावजूद इस तरह वित्तीय पूंजी के हमले के विरूद्ध उनके बीच में एकता के पहलू विकासमान है।

किसान संघर्ष का भारत में लम्बा इतिहास रहा है। विस्तार में जाने की जगह यह कहना काफी है कि आर्थिक मुद्दों पर किया गया किसान संघर्ष अपने अंतर्वस्तु में राजनीतिक रहा है। जमीन और पूंजी के बीच के अंतिर्विरोध ने 60 के दशक में राजनीतिक स्वरूप धारण कर कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती दिया। औपनिवेशिक और स्वतंत्र भारत में लगान, मजदूरी और जमीन व फसल के बटंवारे के इर्दगिर्द घूमने वाले किसान आंदोलन ने हरित क्रांति के बाद 80 के दशक में कृषि के लागत मूल्य और फसलों के लाभकारी मूल्य को प्रभावशाली ढ़ंग से उठाया। इस दौर के किसान आंदोलन में कई धारायें थी लेकिन सामान्य दिशा व कार्यक्रम के आधार पर वह एक नहीं हो सकी और बिखर गईं। इस आंदोलन से यह सीख मिलती है कि इसे गैर राजनीतिक नहीं होना चाहिए और बाजारवादी तो कतई नहीं।

अभी तक के अनुभव से यह स्पष्ट है कि मौजूदा विश्व व्यापार और कृषि उत्पादन के संतुलन में यहां की निर्यातोन्मुखी कृषि टिक नहीं सकती क्योंकि यह अमेरिका ओर यूरोप के पक्ष में है। जहां विकसित देश अपने किसानों के उत्पाद और निर्यात पर भारी सब्सिडी देते हैं वहीं यहां के किसानों के लिए खाद, बीज, कीटनाशक, परिवहन, स्टोरेज आदि की लागत कीमतों को अधिक अदा करना पड़ता है।

केंद्र सरकार चाहें जितनी डींग मारे सचाई यह है कि भारत अभी भी विकसित देशों की पूंजी, व्यापार और तकनीक पर निर्भर है और अपने किसानों के हितों की रक्षा नहीं कर पाता हैं। भारत सरकार ने कृषि उत्पाद के निर्यात के नाम पर विश्व व्यापार संगठन के तहत ‘कृषि विषयक समझौता’ पर हस्ताक्षर किया परिणाम स्वरूप इस देश के बाजार विदेशी कृषि उत्पाद से भर गये। दूसरी तरफ यहां का किसान चीनी, गेहूं, बासमती चावल के अलावा अन्य चावल आदि का निर्यात सरकारी प्रतिबंध के कारण नहीं कर पा रहा है। हालांकि कृषि उत्पादों के निर्यात के सवाल को बहुत महत्व नहीं दिया जाना चाहिए और जैसे तैसे विश्व व्यापार में घुसने की नीति पर भी बहुत जोर नहीं देना चाहिए क्योंकि कपास, सोयाबीन और केरल के मसालों के निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं है बावजूद इसके इन उत्पादों में लगे किसान भी भारी पैमाने पर आत्महत्या कर रहे है।

विश्व व्यापार पर मनसांटो, कारगिल जैसी कम्पनियों का कब्जा है और वहीं बाजार मूल्य भी तय करते है। हमें अपने कृषि बाजार को संरक्षण देने और बढ़ाने पर जोर देना होगा और केन्द्र सरकार पर दबाब डालना होगा कि वह विदेशी कृषि उत्पाद पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाए, सीमा शुल्क बढ़ाए और वायदा कारोबार पर रोक लगाए।

यह याद रखना होगा कि अमेरिका अभी डब्लूटीओं की कोई भी शर्त मानने के लिए तैयार नहीं है जबकि पहले से ही अमेरिका और यूरोप अपने किसानों को सब्सिडी देने के लिए बहुत सारे मदों में छूट लिए हुए है। डब्लूटीओं में इस छूट के खिलाफ तीसरी दुनिया के देशों को गोलबंद करना होगा।

मंदसौर हत्याकांड के पश्चात उभरा किसान आंदोलन स्वतंत्र और संयुक्त रूप से क्रियाशील है। कर्जमाफी, लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य और कृषि लागत कमी लाने जैसे मुद्दे बेहद जरूरी होते हुए भी पर्याप्त नहीं है। किसान आंदोलन को आर्थिक मुद्दों के विमर्श से आगे बढ़ना होगा और उसे सरकार की आर्थिक नीतियों के भी विरूद्ध खड़ा होना होगा। कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए 3 प्रतिशत राजकोषीय घाटे की शर्तों की अनिवार्यता को ठुकराना होगा।

आज भी भारत वर्ष में किसानों का बहुतायत जीवनयापन और उपभोग के लिए खेती करता है। महज 7-8 प्रतिशत ही किसान है जो बाजार के लिए कृषि उत्पाद पैदा करता है। लगभग 80 प्रतिशत सीमांत, छोटे किसानों की खेती अलाभकारी और मंहगी होती जा रही है। कृषि मशीन, बीज, तकनीक आदि इतना मंहगी होती जा रही हैं कि इनका उपयोग इनके लिए कर पाना संभव नहीं होगा। कृषि क्षेत्र को बचाने के लिए रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाओं, महंगे संसाधनों के ऊपर निर्भरता कम करनी पडेंगी, सरकार के ऊपर जल-जमीन उपयोग की वैज्ञानिक नीति बनाने के लिए दबाब डालना होगा और सहकारीकरण की तरफ बढ़ना होगा। पानी का संकट गहरा होता जा रहा है इसके वैज्ञानिक उपयोग पर जोर बढ़ाना होगा और कृषि योग्य खेती को बचाए रखना होगा।

सहकारी खेती

सहकारीकरण की अवधारणा कोई नई नहीं है। आजादी के आंदोलन के दौर से ही सहकारी खेती के लिए हमारे देश में बाते उठती रही हैं। कम्युनिस्टों के अलावा समाजवादियों और लोकतांत्रिक ताकतों ने भी इसकी जोरदार वकालत की है। जय प्रकाश ने अपनी पुस्तक समाजवाद क्यों ? में सहकारी खेती की बात जोरदार ढ़ंग से उठाई है। 1970 से सहकारीकरण का यहां प्रयोग भी हुआ है हालांकि अधिकांश सहकारी समितियां भ्रष्टाचार की शिकार हो गईं। फिर भी इससे सहकारिता के मूल सिद्धांत को खारिज नहीं किया जा सकता है। लोकतांत्रिक संस्थायें भी भ्रष्ट हो रही हैं लेकिन उसके लोकतंत्रीकरण के लिए किये जा रहे संघर्ष से किनारा नहीं किया जा सकता है।

फसल की पैदावार को कोआपरेटिव बनाने का मतलब यह नहीं है कि किसान अपनी जमीन का मालिकाना हक छोड़ देंगे। सब लोग सामूहिक आधार पर काम कर के संसाधन और मेहनत के हिसाब से उत्पादन का लाभ लेंगे। कृषि प्रसंस्करण इकाईयां बनाई जा सकती हैं। जिसमें किसानों की श्रम शक्ति को खेती के अलावा अन्य उत्पादक गतिविधियों में लगाया जा सकता है। ग्राम सभाओं के निर्देशन में चलने वाली सहकारी समितियां सहकारीकरण के पहले चरण में ऐसे केंद्रों के रूप में विकसित होंगी जहां से किसान सस्ते दर पर खाद, बीज, कीटनाशक खरीद सकें और लाभकारी मूल्य के आधार पर फसलों की खरीद की गारण्टी, ग्राम सभा स्तर पर उसका रख-रखाव, सस्ते दर पर ग्रामीणों को कर्ज, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों को अनाज आदि मुहैया कराने की जिम्मेदारी वहन करने लायक सहकारी समितियों के गठन में सरकार को पूंजी निवेश करना पड़ेगा। केरल का ‘कुटुम्ब श्री’ भी सहकारीकरण का ही प्रयोग है जिसे सीखने की जरूरत है। सहकारी समितियों के वर्गीय चरित्र को भी ध्यान में रखना होगा और वर्गीय आधार पर इसका गठन भी होगा।

सहकारी कृषि आंदोलन जातीय विषमता, लिंग विभेद, पर्यावरण संरक्षण के प्रश्नों को हल करेगा और एक नये राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जागरण का केंद्र बन सकता है। छोटे, बिखरे किसान सामंती अवशेष और निरंकुश राजनीतिक तंत्र, सांस्कृतिक पिछड़ापन को टिकाये रखने में जहां एक आधार का काम करते हैं वहीं नये जागरण से एक लोकतांत्रिक भारत के निर्माण का क्रियाशील आधार भी बन सकते हैं। भारत वर्ष में मौजूदा लोकतंत्र टिकेगा, उसकी जड़े गहरी होंगी, वह जनोन्मुखी होगा या एक निरंकुश राजनीतिक तंत्र, तानाशाही व्यवस्था विकसित होगी यह बहुत कुछ इन्हीं असंगठित बिखरे किसानों के रूख पर निर्भर करता है। लोकतंत्र बचाने में इसलिए कृषि सहकारी आंदोलन एक बड़ी भूमिका निभायेगा और असंगठित क्षेत्र के लोगों और नौजवानों को गोलबंद करने में प्रेरक की भूमिका भी निभा सकता है।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह

सदस्य, राष्ट्रीय कार्यसमिति, स्वराज अभियान

 

हस्तक्षेप से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.
"हस्तक्षेप"पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।