लोकतंत्र में निर्दलीय, सन्दर्भ उ.प्र. नगर निकाय चुनाव

ऐसा लगता है कि उनकी चुनावी असफलता के बाद खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली पार्टियों से मुसलमानों का भरोसा कम हो रहा है।...

वीरेन्द्र जैन

उत्तर प्रदेश में हाल ही में सम्पन्न नगर निकाय चुनावों में भले ही भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तरह अपना वर्चस्व बना होने का गलत प्रचार कर रही हो, व उसका समर्थक मीडिया उनकी प्रतिध्वनि रच रहा हो, किंतु सच यह है कि राजनीतिक दृष्टि से जनता ने प्रदेश के किसी भी दल में अपना विश्वास व्यक्त नहीं किया है। यह स्थिति एक अच्छा संकेत नहीं है। अब इन सदस्यों की बोलियां लगायी जायेंगीं। जब पार्टी आधार पर चुनाव होते हैं तो दलबदल के बारे में भी वही नियम लागू होने चाहिए जो लोकसभा और विधानसभा के सदस्यों के लिए बनाये गये हैं।

चुनावी प्रबन्धन में सिद्धहस्त भाजपा गुजरात में चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है ऐसा उसकी आम सभाओं में अपेक्षाकृत कम उपस्थिति, पूरी ताकत झौंक देने के बाद भी रैलियों में कम भीड़, और नेताओं की बातचीत के लीक होने की खबरों से पता चलता है। इसके बाबजूद भी लोगों को आशंका है कि भाजपा साम दाम दण्ड भेद का स्तेमाल करके स्थिति अपने पक्ष में कर लेगी। उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनावों की वास्तविकता को भिन्न तरीके से प्रस्तुत करना भी ऐसी ही तरकीबों में से एक है। विपक्षियों का तो यह भी आरोप है कि गुजरात में चुनावों को विलम्बित कराने के पीछे भी ऐसा ही प्रयास है। चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में बतलाना भी एक कूटनीति का हिस्सा है। 

उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम का सच यह है कि सम्पूर्ण नगर निकाय चुनावों अध्यक्ष के कुल 652 पद थे जिसमें से 225 पर निर्दलीय जीते हैं और 184 पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। समाजवादी पार्टी ने 128 सीटें जीती हैं तो बहुजन समाज पार्टी ने 76 पर जीत दर्ज की है। काँग्रेस ने 26 , आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, और राष्ट्रीय लोक दल ने दो-दो सीटें जीती हैं। ओवैसी की एआईएमआईएम ने भी नगर पंचायत की एक सीट जीत कर उत्तर भारत में प्रवेश कर लिया है। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी को एक, आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक को एक, तदर्थ पंजीकृत पार्टी को एक, तथा अमान्यता प्राप्त दल को दो सीटें मिली हैं।

उल्लेखनीय है कि कुल मतदान लगभग चार करोड़ वोटों का हुआ। जिन नगर निगम के चुनावों में भाजपा 16 में से 14 सीटें जीत कर पूरे उत्तर प्रदेश में झंडा फहराने का प्रचार कर रही है उनमें कुल 35 लाख वोट पड़े हैं। नगर पालिका परिषदों के लिए हुए चुनावों में लगभग एक करोड़ वोट पड़े हैं, वहीं नगर पंचायतों के लिए दो करोड़ पैंसठ लाख के लगभग वोट पड़े हैं। 

कुल मिला कर भाजपा को एक करोड़ तेईस लाख वोट मिले हैं जो कुल मतदान का लगभग तीस प्रतिशत हैं। वहीं निर्दलियों को लगभग 41 प्रतिशत वोट मिले हैं।  कुछ अपवादों को छोड़, बीजेपी बस्‍ती, गोंडा, चित्रकूट, इलाहाबाद, मिर्जापुर, बाराबंकी, आज़मगढ़, जौनपुर, कौसाम्‍बी, फतेहपुर, फर्रुखाबाद, फिरोज़ाबाद इत्‍यादि में लगभग सभी सीटें हार गई है।

सभी निकायों के पार्षदों के चुनावों में भी लगभग साठ प्रतिशत पार्षद निर्दलीय हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि भाजपा के ध्रुवीकरण का प्रभाव यह भी हुआ है कि पहली बार ओवैसी की एआईएमआईएम के 29 पार्षद जीते हैं जिनमें से ग्यारह तो फिरोजाबाद से जीते हैं जहां से उनकी मेयर पद की उम्मीदवार ने विजेता को कड़ी टक्कर दी और दूसरे नम्बर पर रही। इसके अलावा उनके उम्मीदवार सम्भल, अमरोहा, मेरठ, बागपत, डासना [गाज़ियाबाद] कानपुर, सीतापुर, बिजनौर और इलाहाबाद से भी जीते हैं। चिंताजनक यह है कि जिस कट्टरवाद को समाप्त समझा जा रहा था, वह फिर अपना स्थान बनाता जा रहा है जिसका परोक्ष लाभ भाजपा के कट्टरवादी तत्वों की मजबूती में प्रकट होगा। ऐसा लगता है कि उनकी चुनावी असफलता के बाद खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली पार्टियों से मुसलमानों का भरोसा कम हो रहा है।

निर्दलीय उम्मीदवार की विजय का मतलब होता है कि सम्बन्धित व्यक्ति मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल से जनता में अधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय है। ऐसे लोग भी प्रायः मान्यता प्राप्त पार्टियों से टिकिट मांगते हैं किंतु टिकिट न मिलने पर वे निर्दलीय के रूप में खड़े हो जाते हैं। जीतने के बाद पार्टियां अपनी जरूरत के अनुसार उनसे सौदा करती हैं। यह स्थिति भ्रष्टाचार की भाव भूमि तैयार कर देती है। पूरे देश में फैली गन्दगी और अतिक्रमण इसी के परिणाम हैं। नगर निकायों, सहकारिता के विभागों, और विकास प्राधिकरणों के भ्रष्टाचार से नित प्रति आम आदमी का सामना होता है इसीलिए वह भ्रष्टाचार समाप्ति की घोषणाओं पर भरोसा नहीं करता। असम के बाद मणिपुर और गोआ राज्यों में जिस तरह से सरकारें बनायी गयी थीं उसने उनके वादों पर से लोगों के विश्वास को कम किया है। गुजरात चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में भी व्यापक स्तर पर खरीद फरोख्त होगी।

जरूरत है कि या तो नगर निकायों में दलीय आधार पर चुनाव न हों, और अगर हों तो दलबदल कानून भी उन पर लागू हो। ईवीएम मशीन पर शंकाएं की जा रही हैं किंतु उसके लिए स्वीकार्य सबूत और विधि के साथ सामने आना होगा, अन्यथा पराजय के बाद ऐसी शंकाएं व्यक्त करना सन्देहास्पद लगता है।  

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