भारत का ‘दलित स्प्रिंग’’, अन्य पिछड़े वर्ग, तथा हिन्दुत्व मंसूबे

बौद्ध देशों में – चीन, जापान, वेतनाम, कोरिया, म्यांमार – धर्म और धर्मनिरपेक्षता का हमेशा टकराव रहा। इससे या तो साम्यवादी एक पार्टी शासन की स्थापना हुई या फ़िर सैन्य तानाशाही की। ...

अतिथि लेखक

कांचा इलैया

हाल ही में मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, “जिस तरह विश्व अलग अलग समय पर उग्र इस्लामी, उग्र ईसाई तथा उग्र बौद्ध शासन का साक्षी बना, उसी प्रकार, भारत भी इस समय उग्र हिन्दुत्व शासन का साक्षी बन रहा है। किसी भी उग्र धार्मिक दल या संगठन के शासन में लोकतंत्र जीवित नहीं रह पाता।” राज्य पर उग्र धर्म के शासन तथा लोकतांत्रिक संस्थानों से उसके संबंध पर मैंने कुछ अनुसंधान किया। मैंने यह पाया कि मेरा मित्र बिलकुल सही था।

यूरोप पर कैथोलिक पपलडोम के शासन ने लोकतांत्रिक संस्थानों को जीवित नहीं रहने दिया। पोप तथा बिशप्स ने सोचा कि राज्य का शासन धर्मनिरपेक्ष क़ानूनों से नहीं बल्कि बाइबल संबंधी क़ानूनों से होना चाहिए। इसकी वजह से मैकियावेली का सृजन हुआ, जिसने एक अव्यवहारिक काल्पनिक प्रिंस की रचना की, और थॉमस हॉब्स, जिसने उग्र धर्म के प्रति-उत्तर में लेवियथान की रचना की। इन दोनों ही काल्पनिक शासकों ने धर्म की सत्ता को अस्वीकृत किया। इसकी वजह से पोप तथा बिशप द्वारा नियंत्रित राज्य की सत्ता के विरुद्ध अनेक गृह युद्ध हुए। इन गृह युद्धों में से जॉन लॉक, वोल्टेयर तथा रौस्सेऔ का सृजन हुआ, जिन्होने लोकतंत्र के सिद्धांतों का निर्माण किया। इस प्रक्रिया में अधार्मिक (कई बार धर्म-विरोधी) संविधान लिखे गए। इसी प्रक्रिया में ब्रिटिश संसद का निर्माण हुआ जिसने हालांकि मौखिक रूप से, परंतु, संवैधानिक शासन को विकसित किया और संसद में ‘ईश्वर’ शब्द के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।

इस प्रक्रिया में कैथोलिक रूढ़िवादी धर्म का विभाजन हुआ और प्रोटैस्‍टैंटमत का विस्तार हुआ, जो कि अधिक उदार था तथा गरीबों और गुलामों का हितैषी था। यह उत्पादन को आदर देता था तथा श्रम केन्द्रित था, अवकाश केन्द्रित नहीं। लोकतान्त्रिक राजनीति के साथ साथ इस प्रक्रिया ने आधुनिक लोकतन्त्र तथा व्यक्तिगत अधिकारों और कर्तव्यों को स्थिर किया। लोकतन्त्र की वजह से पूंजीवाद उन्नत हुआ।

बौद्ध देशों में – चीन, जापान, वेतनाम, कोरिया, म्यांमार – धर्म और धर्मनिरपेक्षता का हमेशा टकराव रहा। इससे या तो साम्यवादी एक पार्टी शासन की स्थापना हुई या फ़िर सैन्य तानाशाही की। बौद्ध धर्मवैधानिक क़ानूनों ने कभी भी उचित लोकतांत्रिक संविधानवाद को विकसित नहीं किया। म्यांमार में जो संकट है वो एक अच्छा उदाहरण है।

इस्लामी दुनिया में बहुत से देश इस उग्र इस्लामी विचारधारा, कि एक राज्य का आधार कुरान के क़ानूनों पर रखा जाना चाहिए न कि धर्मनिरपेक्ष लिखित संविधान के आधार पर, को वश में नहीं कर सके। हर इस्लामी देश एक बड़े संकट के दौर से गुज़र रहा है। इसने 2010 के दशक में अरब स्प्रिंग को जन्म दिया परंतु वे उग्र इस्लाम की समस्या को वशीभूत नहीं कर पाये हैं, जो कि यह तर्क करता रहता है कि मानव जीवन के हर पहलू को कुरान के क़ानूनों के अनुसार ही नियंत्रित होना चाहिए। ‘मानव अधिकार’ की धारणा को अभी इस्लामी दुनिया में स्थिरता प्राप्त नहीं हुई है।

भारतीय जनता पार्टी का सृजन अपने आप नहीं हुआ है। यह उग्र हिन्दू संस्था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही अंकुरित हुई है। उग्र इस्लाम, उग्र ईसाई तथा उग्र बौद्धों की ही तरह इस संस्था का यह विश्वास है कि वेद, कौटिल्य का अर्थशास्त्र और मनुवादी शास्त्र के अलावा किसी भी धर्मनिरपेक्ष संविधान की कोई आवश्यकता नहीं है।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मार्गदर्शन में भारतीय जनता पार्टी ने अब तक लगभग 10 साल तक भारत का प्रशासन संभाला है (वाजपेयी शासन को मिलाकर)। इन दस सालों में इसके लोकतान्त्रिक संविधान से काफी बार मतभेद हुए हैं। अपने शासन में इसने काफी ऐसे कार्य किए जो प्रत्यक्ष रूप से संविधान विरोधी थे और मनुधर्म के सिद्धांतों को स्थापित करने की कोशिश थे।

ईसाई, इस्लामी और बौद्ध देशों से भिन्न – भारत में – जिसे वे एक हिन्दू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करते हैं – जातिवाद की स्थापना है, जिसने इस धर्म के मूलभूत आध्यात्मिक अधिकारों को भी नकार दिया है। हिन्दू ग्रन्थों ने दलितों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा आदिवासियों को जिन राजनैतिक अधिकारों से वंचित किया था, संवैधानिक शासन ने कम से कम वे उन्हें प्रदान किए। तीन समुदायों को लगता है कि संवैधानिक शासन ने उन्हें कमज़ोर कर दिया – ब्राह्मण, बनिया, और क्षत्रिय। ये ताक़तें आरक्षण, क्रूरता विरोधी कानून, पुरुष-स्त्री समानता की विरोधी हैं। अनेक समानता संबंधी कानून, अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों तक धर्मनिरपेक्ष क़ानूनों और शासन की वजह से पहुंचे।

संविधान विरोधी तथा उग्र हिन्दू ताक़तें काँग्रेस में भी शक्तिशाली थी/हैं पर पंडित नेहरू, हालांकि ब्राह्मण थे किन्तु सिद्धान्त के रूप में उग्र हिन्दू व्यवस्था के विरोधी थे। दूसरा, काँग्रेस एक स्वतंत्र राजनैतिक दल था, जो कि आर. एस. एस. की तरह किसी उग्र हिन्दू संगठन के वशीभूत नहीं था। हिन्दू महासभा ने इसे वशीभूत करने की कोशिश की परंतु महात्मा गांधी और नेहरू ने वह नाता तोड़ दिया।

काफी लोग ऐसा सोचते थे कि आर. एस. एस./ भा. ज. पा. शासन केवल ईसाई और इस्लाम लोगों का विरोधी होगा किन्तु अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के लोगों ने यह पाया है कि यह शासन उनके अधिकारों का अधिक विरोधी है। ईसाई और इस्लाम लोगों के साथ विश्व भर के ईसाईओं और मुसलमानों का समर्थन है क्यूंकि बहुत से देशों में इन धर्मों के लोगों का बहुमत है। अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के पास किसी बाहरी ताकत का साथ नहीं है जो कि दबाव बना सके।

2014 के चुनावों के पश्चात, इन ताकतों ने नरेंद्र मोदी पर इसलिए विश्वास किया क्यूंकि वह दावा करते थे कि वे अन्य पिछड़े वर्ग से हैं और उनके विकास के लिए खड़े होंगे। परंतु सम्पूर्ण व्यवस्था को स्वयं के बल पर चला सकें, वह नेहरू या इन्दिरा गांधी नहीं हैं। न ही भा. ज. पा. काँग्रेस है जो कि एक व्यक्ति के दिशा निर्देशों पर चलाई जा सके। यह एक उग्र हिन्दू तंत्र द्वारा संचालित है जो ज़्यादातर ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रियों से बनता है।

क्षत्रियों में से केवल वी. पी. सिंह अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के साथ खड़े हुए और कोई भी प्रधान मंत्री उनकी तरह सामाजिक न्याय के प्रति दृढ़ नहीं है/था।

भा. ज. पा. में शासन का प्रबंध मोहन भागवत चलाते हैं, जो संवैधानिक सुरक्षा-उपायों में विश्वास नहीं रखते। अरुण शौरी जैसे उग्र हिन्दू बौद्धिक हालांकि मोदी से खुश नहीं है पर उग्र हिन्दुत्व, जो कि संवैधानिकता के विपरीत है, से प्रसन्न हैं।

अनुसूचित जाति/जनजाति क्रूरता अधिनियम के विपरीत होकर, उग्र हिन्दू अन्य पिछड़े वर्गों और दलितों को एक-दूसरे के खिलाफ करना चाहते हैं। उग्र हिंदुओं का यह मानना है कि अन्य पिछड़े वर्गों और ब्राह्मण, बनियों और क्षत्रियों की मदद से यदि वे एक और चुनाव जीत लेते हैं तो वे धीरे-धीरे संवैधानिक संस्थानों को विघटित करके तानाशाही उग्र हिन्दू शासन की स्थापना कर सकते हैं।

फिर वे सभी आरक्षण तथा रक्षात्मक क़ानूनों को समाप्त कर देंगे। शूद्र/ अन्य पिछड़े वर्ग खुद को एक क्लासिक स्थिति में पाते हैं। जिस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का निर्माण कर दिया गया है वह ध्वस्त हो जाएगी पर उग्र हिन्दू इससे परेशान नहीं होते क्यूंकि दूसरी दुनिया – स्वर्गसुख – यह हिन्दू सिधान्त उनकी रक्षा करता रहेगा।

मुस्लिम तानाशाहों की तरह वे भी अतिरिक्त धन संचित करेंगे। अर्थ व्यवस्था के रूप में पूंजीवाद न हिन्दू है न मुस्लिम, पर प्रोटेस्टंट ईसाई है। लीबिया के गद्दाफ़ी या पाकिस्तान के तानशाह ज़िया-उल-हक या परवेज़ मुशर्रफ की तरह, हिन्दू तानशाह और ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रिय ताक़तें अतिरिक्त धन संचय कर सकेंगी।

साधारणतः, उग्र धार्मिक शासक उत्पादन, वितरण और लोक कल्याण के विषय में नहीं सोचते। भारत में, अशोक को छोड़कर किसी भी शासक ने अच्छे उत्पादन, वितरण और लोक कल्याण की चिंता नहीं की। उग्र हिंदुओं के मन में अशोक के लिए कोई इज्ज़त नहीं है।

इसी वजह से नेहरू अशोक के चिन्हों को वापिस लाये। पर उग्र हिन्दू, राज्य के ढांचे में उन सभी चिन्हों के खिलाफ हैं – झंडे में अशोक चक्र, नोटों पर तीन सिंहों का प्रतीक चिन्ह, इत्यादि।

आरक्षण प्रणाली से जो दलित बौद्धिक और मध्यम वर्ग सृजित हुए हैं, उन्होंने ये समझ लिया है। 2 अप्रैल, 2018 का बंद और ‘दलित स्प्रिंग’, इसी बड़े डर की वजह से आयोजित हुए। एक बार अगर संविधान समाप्त कर दिया गया तो वे आज़ादी से पूर्व की स्थिति पे दोबारा पहुँच जाएंगे। अपने खिलाफ अनुसूचित जाति/जनजाति क्रूरता अधिनियम के अंतर्गत अधिक मामले दर्ज होने के कारण, अन्य पिछड़े वर्ग, उग्र हिन्दू कार्यावली का साथ देने के लिए तैयार हैं। देश में कोई भी सुविकसित शूद्र/ अन्य पिछड़े वर्ग की ताकत नहीं है जो भविष्य का पूर्वानुमान लगा सके। परंतु एक बार अगर संविधान समाप्त कर दिया गया, तो शूद्र/ अन्य पिछड़े वर्ग की स्थिति आज़ादी से पूर्व जैसी स्थिति की तरह हो जाएगी।

शासन के हर पहलू में उग्र हिंदुओं की बढ़ती सफलताओं के चिन्ह स्पष्ट हैं। विधायी और कार्यकारी निकाय पूरी तरह से उग्र हिंदुओं के वश में हैं। न्याय व्यवस्था धीरे धीरे उस ओर अग्रसर है।

इस स्थिति को कैसे संभाला जाए? यह बताना मेरी क्षमता से बाहर है।

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This is a Hindi translation of Kancha Ilaiah's excellent article. It was translated by Nivedita Dwivedi published on

https://countercurrents.org/2018/04/09/indias-dalit-spring-the-obcs-and-the-hindutva-game-plan-kancha-ilaiah/

India’s Dalit Spring, The OBCs And The Hindutva Game Plan – Kancha Ilaiah

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