भारतीय संस्कृति के नाम पर मनाए जाने वाले हिंसक ब्राह्मणवाद से संबंद्ध सभी त्योहारों का हो आमूल नाश

महिषासुर आंदोलन का उद्देश्य शव-साधना नहीं है। यह आंदोलन हिंसा और छल के बूते खड़ी की गई असमानता पर आधारित संस्कृति के विरुद्ध है।

अतिथि लेखक
Updated on : 2018-05-26 23:20:53

प्रमोद रंजन

बहुजन परंपराओं को समझने के लिए मैंने पिछले दो वर्षों में अपने साथियों के साथ देश के कई हिस्सों की यात्राएं कीं। इस दौरान छोटानागपुर, बुंदेलखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक में महिषासुर से संबंधित अनेक स्थलों व परंपराओं को देखने का अवसर मिला। उसके कुछ अंशों को मैंने, नवल किशोर कुमार तथा अनिल वर्गीज ने इस किताब में रखा है। लेकिन मेरे लिए सबसे आश्चर्यजनक था हिमालय के दुर्गम इलाके में इस परंपरा के एक बदले हुए रूप को देखना। जून, 2017 में हमने किन्नौर और लाहुल-स्पिति की यात्रा की। उस क्षेत्र के कुछ हिस्से आज भी भारी बर्फबारी के कारण कई महीने तक देश के अन्य हिस्सों से कटे रहते हैं। वहां 'महासू' एक देवी भी हैं और देवता भी। किन्नौर के जिला मुख्यालय रिकांगपिओ से 17 किलोमीटर की दूरी पर किन्नर-कैलाश की चोटियों के निकट बसे गांव रोघी में महासू एक देवी हैं, जो नारायण के साथ रहती हैं। उनसे जुड़े एक त्रैवार्षिक उत्सव में सुर और असुरों का प्रतीकात्मक युद्ध होता है, जिसमें वे अपने गुर के शरीर में आकर भाग लेती हैं। इसमें नारायण के गण असुर के रूप में उनसे युद्ध करते हैं। यह जानना आवश्यक है कि 'नारायण' एक प्राचीन आदिवासी देवता हैं, जिन्हें बाद में विष्णु का पर्याय बनाया गया। उस इलाके में जिस किसी गांव में महासू देवी होती हैं वहीं अनिवार्य रूप से नारायण भी होते हैं। इसी जिले में प्रसिद्ध वास्पा (सांगला) घाटी के कामरू मंदिर में महासू की कोठी है। वहां महासू एक (पुरुष) देवता हैं। हिमाचल के कुछ अन्य इलाकों तथा उत्तराखंड में भी महासू एक लोकप्रिय देवता हैं। इन सबका संबंध हिमालय की बहुजन-श्रमण परंपरा से है। वह यात्रा-वृत्तांत फिर कभी विस्तार से लिखूंगा।

असुर परंपराओं के मूल दार्शनिक तत्त्व तथा इनसे निसृत विश्व-दृष्टि कृषि और श्रम पर आधारित है तथा ब्राह्मण-द्विज परंपराओं से सर्वथा भिन्न है। लेकिन कहने की आवश्यकता नहीं कि परंपराओं का मूल्य सांकेतिक ही होता है। समय के साथ वे परिपाटी बन जाती हैं और अप्रासंगिक हो जाती हैं। महिषासुर से संबंधित परिपाटियों में कुछ जगहों पर महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता। यह उस लोक-स्मृति को सहेजने का एक तरीका रहा है, जिसके अनुसार उनकी हत्या एक रमणी के छल के कारण हुई थी। आज नए 'महिषासुर शहादत/स्मृति दिवस'६ ने तो उस परिपाटी को भी पूरी तरह बदल दिया है। आयोजनों में महिलाएं प्रथम स्थान पर हैं।

महिषासुर आंदोलन का उद्देश्य शव-साधना नहीं है। यह आंदोलन हिंसा और छल के बूते खड़ी की गई असमानता पर आधारित संस्कृति के विरुद्ध है। यह दुर्गा-पंडालों से महिषासुर की मूर्तियां हटवाने, रावण का पुतला जलाने से रोकने, महिषासुर या रावण की 'पूजा' करने के लिए नहीं है। बल्कि सामाजिक घृणा के स्थान पर स्थाई प्रेम की बुनियाद रखने के लिए है। यह सिर्फ धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों को ही जलाए जाने का विरोध नहीं करता, बल्कि विरोध-प्रदर्शनों में पुतला जलाने तक का विरोधी है। यह सुकरात से लेकर गौरी लंकेश तक की परंपरा से अपना रिश्ता जोड़ता है।

1947 में मिली राजनीतिक आजादी के बाद सांस्कृतिक-धार्मिक गुलामी का शिकंजा कसता जा रहा है। कबीर-फुले-आंबेडकर और पेरियार जिस आजादी से अपनी बात रख पा रहे थे, उतनी भी आज़ादी आज संभव नहीं रह गई है। ब्राह्मणवादी संस्कृति ने किन्नौर से लेकर कन्याकुमारी तक अपने पांव पसार लिए हैं और उसकी जकड़बंदी बढ़ती ही जा रही है।

यह आंदोलन सिर्फ द्विजवाद का ही नहीं, हर प्रकार की प्रतिगामी चेतना का विरोधी है और अभिजन के स्थान पर बहुजन संस्कृति की वकालत करता है। यह एक ऐसे आधुनिक समाज की प्रस्तावना करता है जिसमें हिंसा के लिए कोई जगह न हो। यह समझ विकसित करने के लिए है कि संस्कृति व परंपराएं हमारे रोजमर्रा के व्यवहार को नियंत्रित करती हैं। जब हम प्रतीकों के माध्यम से की जाने वाली हिंसा में शामिल होते हैं तो एक दिन वह उन्हीं तर्कों का बाना ओढ़कर प्रत्यक्ष भी प्रकट होती है।

इस आंदोलन की मांग है कि हमारी भारतीय संस्कृति के नाम पर मनाए जाने वाले हिंसक ब्राह्मणवाद से संबंद्ध सभी त्योहारों का आमूल नाश हो और विभिन्न समतावादी सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों द्वारा प्रस्तावित त्योहार-जयंतियां आदि इसकी जगह लें। महिषासुर दिवस समेत आज कई ऐसे त्योहार मौजूद हैं। यह आस्था पर विवेक, अमानवीयता पर मानवीयता और परंपरा पर ज्ञान की विजय का अभियान है।

महिषासुर : मिथक और परंपराएंसंपादकीय का अंश

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