कौन सच्चा, गोलवरकर या भागवत : आरएसएस का ‘ग्लासनोस्त’ क्षण !

आरएसएस के सरसंघचालक, एकचालिकानुवर्तित्त्व के संघ संचालन के सिद्धांत के शिखर पुरुष। उनका इस प्रकार अपनी एक धुन में पितरों के पथ से इतनी दूर तक बहक जाना पूरे संघ परिवार को बुरी तरह से विचलित भी कर सकता ...

कौन सच्चा, गोलवरकर या भागवत : आरएसएस का ‘ग्लासनोस्त’ क्षण !

-अरुण माहेश्वरी

नई दिल्ली में भविष्य का भारत विषय पर आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत के तीन भाषणों की श्रृंखला में उन्होंने भारतीय राष्ट्र के स्वरूप के बारे में जो तमाम बातें कही, आरएसएस के सर्वोच्च नेतृत्व की जुबान से ऐसी बातें सचमुच बेहद चौकाने वाली थी। ‘विविधता  में एकता’ के एक बीज सूत्र को पकड़ कर भागवत इतना आगे चले जायेंगे, आरएसएस के मूलभूत नजरिये से बाकायदा परिचित और समाज में उसकी अब तक की तमाम सांप्रदायिक विभाजनकारी गतिविधियों पर नजर रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिये वह कुछ हद तक अविश्वसनीय भी हो सकता है !

भारतीय राष्ट्रवाद के बारे में गोलवलकर के विचार

Golwalkar's views about Indian nationalism

आरएसएस के अब तक के सर्वप्रमुख सिद्धांतकार रहे हैं उसके द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर। भारत के वैविध्यपूर्ण राष्ट्रीय स्वरूप पर आधारित भारतीय राष्ट्रवाद के बारे में उनका यह बिल्कुल साफ कथन था कि

“यह एक प्रकार का विकृत राष्ट्रवाद है जिसमें जान फूंकी जा रही है। यह वैसा ही है जैसे एक बंदर के सिर, बैल के पैर और हाथी के शरीर को मिला कर एक नया प्राणी तैयार किया जाए। इसका परिणाम सिर्फ एक सड़ी हुई लाश हो सकता है। यह जीवित शरीर नहीं हो सकता। इस शरीर में यदि कोई हलचल दिखाई भी देती है तो वह सड़ी हुई लाश में बिलबिलाते हुए कीड़ों-मकोड़ों की हलचल भर है।”

(वी आर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड, पृष्ठ - 197-198)।

भारतीय राष्ट्र की लाश को इस सड़ांध से मुक्त कराने के लिये गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘बंच आफ थाट्स’ में लिखा था कि

“इसके लिये सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कदम हमारे संविधान के संघीय ढांचे की तमाम बातों को भगवान के लिये बहुत गहरे दफना देना होगा, एक राज्य भारत के अंदर सभी ‘स्वायत्त या अर्द्ध स्वायत्त’ राज्यों के अस्तित्व को खत्म कर देना होगा और “एक देश, एक राज्य, एक विधायिका और एक कार्यपालिका” की घोषणा करनी होगी...संविधान का पुनर्निरीक्षण किया जाना चाहिए तथा इस प्रकार की एकात्म सरकार की स्थापना के लिए उसका पुनर्लेखन किया जाना चाहिए।”

(बंच आफ थाट्स, 1966,पृ : 435-436)

हम सब जानते हैं कि आज तक आरएसएस भारतीय राष्ट्र की विविधता के खिलाफ इसी एकात्म राज्य की स्थापना के लिये काम करता रहा है और विविधता में एकता के हर विचार का, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सभी धर्म, जाति और समुदाय की एकता पर टिके संघर्ष का तीव्र विरोध करते हुए भारत को पूरी तरह से एक हिंदू धर्मावलंबियों के अधीन राष्ट्र के रूप में तैयार करने के लिये काम करता रहा है। गोलवलकर ने ही इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये हिटलर का पथ अनुसरण करने, जर्मनी में जिस प्रकार यहूदियों का सफाया किया गया, उस रास्ते पर बढ़ कर राष्ट्रीय गौरव की रक्षा करने, भारत के सभी अन्य धर्मावलंबियों को, खास तौर पर जिनकी पूण्य भूमि भारत के बाहर स्थित है इस देश के हिंदू बहुसंख्यकों की इच्छा का गुलाम समझने और हर मुस्लिम बस्ती को मिनि पाकिस्तान मान कर उसे उजाड़ने के काम को स्वयंसेवकों का पवित्र कर्त्तव्य मानने की तरह की वे तमाम बातें और तदनुरूप काम करने का जो एक पूरा कार्यक्रम तैयार किया था, उनका अब तक अपना एक विशाल इतिहास बन चुका है। इन सबमें ही गांधी, नेहरू और आजादी की लड़ाई के सभी नेताओं के खिलाफ लगातार जहर उगलना भी संघ के कारखाने में निर्मित होने वाले चरित्रों की एक मौलिक विशेषता रही है, जो उन्हें दूसरे देशभक्त भारतवासियों से अलगाती और विशिष्ट बनाती है।

आरएसएस की अब तक की इस पृष्ठभूमि में मोहन भागवत का गांधी जी का और स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस के ‘सर्वस्वत्यागी’ नेताओं का उल्लेख और किसी के लिये हो या न हो, खुद संघ के कारख़ाने में निर्मित ‘चरित्रों’ के लिये एक असंभव और अबूझ पहेली या पागल का प्रलाप ही रही होगी !

जो सारे तत्त्व एक प्रकार से जन्मजात ‘गोडसे-पूजक’ होते हैं, आस्था और विश्वास के स्तर तक गांधी जी को आज के भारत की सारी समस्याओं के लिये मुख्य रूप से दोषी मानते हैं, वे अचानक जब अपने ही मुखिया से गांधी जी की प्रशंसा के शब्द सुनेंगे या हिंदुत्व के एकात्म राज्य के बजाय वैविध्यमय भारत को स्वीकारने और वैविध्य का उत्सव मनाने की तरह की बात सुनेंगे तो क्या ऐसी बिरादरी को उनकी बात का एक अक्षर भी समझ में आ सकता है ?

इस सवाल पर विचार करने पर हमें लगता है कि मोहन भागवत भी इस बात को जानते नहीं है, ऐसा नहीं है। इसीलिये उनकी ये बातें कहते हैं वास्तव में उनकी अपनी संघ बिरादरी को संबोधित नहीं होती हैं। वे जानते हैं कि यह बिरादरी तो इतनी चिकनी हो चुकी है कि उनकी इन बहकी हुई बातों की एक बूँद भी उन पर ठहरने वाली नहीं है। संघ की तरह के सात पर्दों के पीछे से काम करने वाले एक रहस्यपूर्ण संगठन के मुखिया के नाते वे सचेत रूप में इन बातों से अपने सच पर महज एक और पर्दा भर डालने का दायित्व निभा रहे हैं !

गांधी-आरएसएस के संबंध

Relationships of Gandhi-RSS

दरअसल, गांधी जी के साथ आरएसएस के संबंध पर जब भी हम सोचते हैं, किसी भी मनोरोगी के मनोजगत में उसके पिता की जो स्थिति होती है, उसे बिल्कुल वैसा ही पाते हैं। मनोचिकित्सकों ने अपने गहरे पर्यवेक्षणों से इस बात को नोट किया है कि किसी भी मनोरोगी के मनोजगत में उसके पिता के लिये कोई स्थान नहीं होता है। फ्रायड की शब्दावली में, उसका दमन नहीं, बल्कि उसे ख़ारिज करके पूरी तरह से काट कर फेंक दिया जाता है। ‘फोरक्लोज्ड’ कर दिया जाता है। जब किसी तत्त्व को दबाया जाता है, वह आदमी की बातों में, उसके विचारों की श्रृंखला में, चित्त में लौट कर आ सकता है। लेकिन जब किसी तत्त्व को ख़ारिज कर दिया जाता है तो वह इस साधारण कारण से ही उसके चित्त में लौट कर नहीं आ सकता है, क्योंकि वह उसके शुरू में ही कहीं नहीं था, उसे ख़ारिज कर दिया गया था, निष्कासित।

मोहन भागवत अपने संघी चरित्रों की इस मनोदशा को जानते हैं, इसीलिये शायद दूसरों के सामने इधर-उधर की हाँकने से नहीं डरते ! उन्होंने अपने इन चरित्रों के बारे में कहा भी कि वे तो उनके लिये परीक्षापत्र के ‘उन आसान प्रश्नों की तरह है जिन्हें विद्यार्थी सबसे पहले सुलझा कर अपने नंबर सुरक्षित कर लेता है’ ! उनको खुश करने के लिये उन्होंने अपने भाषण में जो एक वाक्य कहा, वही काफी था - ‘भारत हिंदू था, हिंदू है और हिंदू रहेगा’। भारत के संविधान के प्रति निष्ठा की कसमें खाने के बावजूद अंतिम दिन उन्होंने राम मंदिर, धारा 370, धारा 35 ए के बारे में संघ के पुराने स्वाद वाले लालीपॉप को भी उन्हें थमाया। इसीलिये बाकी, गांधी जी, स्वतंत्रता आंदोलन, वैविध्यमय भारत आदि से जुड़ी सारी बातें संघ जगत के लिये बेमाने थी।

उन्होंने अपने तरीके से इन भाषणों में विविधता का जो उत्सव मनाया, हमारा मानना है कि निश्चय ही वह आरएसएस के कॉडर के सर पर से निकल गया होगा। तथापि भागवत इस कॉडर के अभी परम पूजनीय है, आरएसएस के सरसंघचालक, एकचालिकानुवर्तित्त्व के संघ संचालन के सिद्धांत के शिखर पुरुष। उनका इस प्रकार अपनी एक धुन में पितरों के पथ से इतनी दूर तक बहक जाना पूरे संघ परिवार को बुरी तरह से विचलित भी कर सकता है।

आगे देखने की यही दिलचस्प बात होगी कि आरएसएस का संपूर्ण सांगठनिक और वैचारिक ढांचा अपने शिखर संचालक व्यक्ति की इन बहकी-बहकी बातों को कैसे ग्रहण करता है या इनको किस प्रकार ठुकराता है ? या खुद मोहन भागवत अपने कॉडरों में हिंदुत्व के आक्रामक एकात्म भाव की जगह वैविध्यमय एकता के सहिष्णु भाव से पैदा होने वाले भारी दिग्भ्रमों को निष्प्रभावी करने वाले कौन से निवारक कदम उठाते हैं ?

जहां तक आरएसएस के मंच पर में उठे इन सवालों का विषय है, उसे इस प्रकार के वैचारिक संकट का कभी न कभी सामना तो करना ही पड़ेगा क्योंकि वे भारत की जिस झूठी और विकृत समझ के आधार पर अपना वैचारिक महल तैयार किये हुए हैं, वह पूरी तरह से भारत-विरोधी होने के नाते अंदर से खोखला और अचल हो चुका है। इसी के चक्कर में उनकी पहले वाजपेयी सरकार और अब मोदी सरकार बुरी तरह से विफल साबित हुई है। आज उनके श्रेष्ठ प्रचारक सोशल मीडिया पर मां-बहन की गालियां देने वाले ट्रौल किस्म के लोग नजर आते हैं। इसीलिये उनका यह अंदुरूनी संकट, अस्तित्व पर आया संकट किसी भी रूप में बाहर व्यक्त होना ही था। संभवत: वह अभी भागवत के भाषण के जरिये भी कुछ व्यक्त  हुआ हो !

अगर भागवत की बातों में जरा भी ईमानदारी होगी तो यह आरएसएस का एक ‘ग्लासनोस्त क्षण’ भी साबित हो सकता है !

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