संविधान की अवमानना से ही सारे देश में आरएसएस जैसे संगठनों, आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के हौसले बुलंद

कांग्रेस ने आपातकाल के लिए देश से माफी मांगी। यह भी कहा आपातकाल लगाना गलत था। इसके विपरीत भाजपा ने बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद देश से माफी नहीं मांगी।...

संविधान की अवमानना से ही सारे देश में आरएसएस जैसे संगठनों, आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के हौसले बुलंद

आज है आपातकाल की बरसी

जगदीश्वर चतुर्वेदी

आज आपातकाल की बरसी है। भारत के इतिहास में यह असाधारण दिन है। इस दिन श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान प्रदत्त समस्त किस्म के लोकतांत्रिक अधिकारों को संविधान के जरिए ही छीना था। जनता के हकों पर इतना बड़ा हमला पहले कभी नहीं हुआ। समूचे विपक्ष को जेल में बंद कर दिया गया। सन् 1977में जब आपातकाल हटा तो सारे देश को पता चला कि आपातकाल के दौरान किस तरह के अत्याचार हुए। इसके बाद कांग्रेस ने आपातकाल के लिए देश से माफी मांगी। यह भी कहा आपातकाल लगाना गलत था। कांग्रेस ने आपातकाल से गहरे सबक हासिल किए।

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इसके विपरीत भाजपा ने बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद देश से माफी नहीं मांगी। आपातकाल और बाबरी मसजिद विध्वंस से लेकर विगत चार सालों के मोदी शासन तक एक चीज साझा है वह है, संविधान का अपमान, और न्यायालय की अवमानना। ये दोनों भिन्न की घटनाएं हैं लेकिन बेहद महत्वपूर्ण हैं इनसे देश की सारी राजनीति का परिदृश्य बदला है।

आपातकाल का सबक : संविधान को हर हालत में मानो

संविधान की अवमानना के गर्भ से ही सारे देश में आरएसएस जैसे संगठनों, आतंकी और पृथकतावादी संगठनों के हौसले बुलंद हुए हैं। उनका जनाधार बढ़ा है। इस तरह के संगठनों की शक्ति में इजाफा हुआ है। आपातकाल का एकमात्र सबक है संविधान को हर हालत में मानो, संविधान की रक्षा करो, संविधान पर होने वाले हमलों का मुँहतोड़ जवाब दो।

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जो मंत्री संविधान की रक्षा करता है उस पर साइबर गुण्डे खुलकर हमले करते हैं

संघियों के साइबर सेल का मन और दिमाग सिर्फ पीएम और संघ के घृणा अभियान से मिलता है। जो मंत्री संविधान की रक्षा करता है उस पर ये साइबर गुण्डे और संविधान विरोधी संघीगण खुलकर हमले करते हैं। इन लोगों का ताजा शिकार हैं, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज‌। अफसोस की बात है हिंदी के कई लेखक भी इस पतनलीला में शामिल हैं।

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असल में हिंदी लेखकों के लिए यह पतनलीला में शामिल होने और पतनगंगा में डुबकी लगाने का समय है। क्रमशः ऐसे हिंदी लेखकों की संख्या बढ़ रही है जो अपने विवेक की बजाय साइबर ट्रोल के इशारों पर नाच रहे हैं, पतनगंगा में डुबकी लगा रहे हैं।

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