मोदी का जाना तय पर जाते-जाते भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर पश्चिम के शिकंजे को और ज्यादा कस कर जायेंगे

पूरी मोदी सरकार अब जल्द ही विश्व बैंक के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी दिखाई देगी। भारत की तमाम परिसंपत्तियों को औने-पौने दाम पर विदेशियों को बेचने की एक नई होड़ शुरू होगी।...

हाइलाइट्स

पूरी मोदी सरकार अब जल्द ही विश्व बैंक के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी दिखाई देगी। आगे की भारत की आर्थिक नीतियाँ शीघ्र ही जिंग योंग किम तय करते दिखाई देंगे। भारत की तमाम परिसंपत्तियों को औने-पौने दाम पर विदेशियों को बेचने की एक नई होड़ शुरू होगी।

विश्व बैंक के अध्यक्ष का नया पासा

अरुण माहेश्वरी

विश्व बैंक ने द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद उजड़े हुए पश्चिम को उठ खड़े होने के लिये उनमें आपसी समन्वय के जरिये वित्त मुहैय्या कराने का बड़ा काम किया था। लेकिन बाद में वह व्यवहारिक अर्थ में दुनिया पर पश्चिम के दबदबे का, खास तौर पर अमेरिकी दबदबे का औज़ार बन कर रह गई।

दुनिया का कोई ई भी देश आर्थिक संकट में पड़े तो विश्व बैंक की उस पर गिद्ध दृष्टि रहती है और वह उसके उद्धार के लिये ऐसे सभी नुस्ख़ों के साथ तैयार रहती है जिनसे इन देशों की अर्थ-व्यवस्था में पश्चिमी देशों की वित्तीय पूँजी के प्रवेश का रास्ता सुगम हो सके। आज दुनिया में विश्व बैंक और उसकी सहोदर अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) उपनिवेशोत्तर  काल में पश्चिमी देशों की वित्तीय पूँजी के निवेश के मध्यस्थ, अर्थात दलाल की भूमिका अदा कर रही है।

दुनिया के विकासशील ग़रीब देश बार-बार मजबूरी में इसके द्वारस्थ होते रहे हैं और बदले में विश्व बैंक-आईएमएफ़ उन्हें कुछ संसाधन जुटा कर देने के साथ ही एक घुटे हुए महाजन की तरह उनकी आगे की आर्थिक नीतियों पर नाना प्रकार की शर्तें भी लादती रही है।

आज तक का दुनिया का अनुभव यही है कि विश्व बैंक- आईएमएफ के सुझाये गये ढाँचागत समायोजन के नुस्ख़ों पर अमल करके दुनिया के किसी देश का कोई भला नहीं हुआ है। सारी दुनिया बहु-राष्ट्रीय निगमों के लिये खुले चारागाह का रूप जरूर लेती चली गई है।

बहरहाल, भारतीय अर्थ-व्यवस्था को मोदी के तुगलकीपन ने अभी गर्त की ओर ढकेल दिया है। ऐसे में विश्व बैंक का भारत के प्रति एक खास प्रकार का आकर्षण पैदा होना स्वाभाविक है। वह भारत में आगे अपनी काफी बड़ी भूमिका को देख पा रहा है।

मोदी सरकार का वित्तीय घाटा, तेजी से बिगड़ता हुआ व्यापार संतुलन, निवेश में गिरावट और बढ़ते हुए एनपीए के कारण बैंकिंग प्रणाली पर बढ़ रहा दबाव - विश्व बैंक के भावी हस्तक्षेप और भूमिका के लिये इससे अधिक आदर्श स्थिति और क्या हो सकती है !

यही वजह है कि विश्व बैंक के अध्यक्ष जिंग योंग किम ने दुनिया के बाक़ी सभी अर्थ-शास्त्रियों और संस्थानों की तुलना में मोदी के तुगलकीपन के प्रति काफी नरम रुख़ अपनाया है। उन्होंने कहा है कि अभी अर्थ-व्यवस्था में जो भी गड़बड़ी हुई है, यह मामूली एक भटकन (aberration) भर है। आगे सब ठीक हो जायेगा।

किम की इस बात पर मोदी सरकार सहित भाजपा के सारे लोग उछल पड़े हैं। ‘चिंता की कोई बात नहीं है, रोगी मरेगा नहीं, ठीक हो जायेगा - दुनिया के सबसे बड़े डाक्टर ने कह दिया है।’

किम तो यही चाहते थे। मरते हुए रोगी को जीने की आशा बँधाने वाला डाक्टर तो भगवान होता है ! जाहिर है कि पूरी मोदी सरकार अब जल्द ही विश्व बैंक के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी दिखाई देगी। आगे की भारत की आर्थिक नीतियाँ शीघ्र ही जिंग योंग किम तय करते दिखाई देंगे। भारत की तमाम परिसंपत्तियों को औने-पौने दाम पर विदेशियों को बेचने की एक नई होड़ शुरू होगी।

मोदी जाते-जाते भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर पश्चिम के शिकंजे को और ज्यादा कस कर जायेंगे।

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