जिन्ना मुस्लिम राष्ट्र के क़ायद-ए-आज़म हो सकते थे, जैसे सावरकर हिन्दू राष्ट्र के

जब भीतर का हिन्दू मुसलमान ज़्यादा ज़ोर मारने लगे तो थोड़ा ठंडा पानी पीकर इतिहास की किताबें पलट लेनी चाहिए, बाक़ी नामवर हों आप या बेनाम गति के नियम सबके लिए एक ही होते हैं।...

मुहम्मद अली जिन्नाह मुस्लिम राष्ट्र के क़ायद-ए-आज़म हो सकते थे, जैसे सावरकर हिन्दू राष्ट्र के

अशोक कुमार पाण्डेय

मुश्किल वक़्त में असल परीक्षा होती है। बाबरी के समय हमने अच्छे-अच्छों को हिन्दू मुसलमान बनते देखा। अभी हाल में कठुआ काण्ड पर अच्छे-अच्छों के घूँघट सरकते देखे।

एक रईस जमींदार के घर जन्में मियाँ इफ्तिखारुद्दीन पंजाब कांग्रेस के सदर हुआ करते थे। वाम के क़रीब फ़ैज़ साहब के दोस्त। शेख़ अब्दुल्ला से नेहरू की पहली मुलाक़ात का श्रेय इन्हें ही है।

बंटवारे के पहले ही मुस्लिम लीग में चले गए। कश्मीर को पाकिस्तान के साथ लाने के लिए हर चंद कोशिश की। शेख़ को समझाने की कोशिश की। ख़ैर, पाकिस्तान में मिनिस्टर बने। सब नॉर्मल सा हुआ तो भीतर का प्रोग्रेसिव फिर जागा। पाकिस्तान में भूमि सुधारों की मांग कर बैठे। हीरो से खलनायक बनना ही था जमींदारों और रियासतदारों से भरी पाकिस्तान की राजनीति में। सत्ता से बाहर कर दिए गए। एक अख़बार निकाला। फ़ैज़ साहब एडिटर बनाये गए। लेकिन अयूब खान के ज़माने में उसे भी उनसे छीनकर सरकारी बना दिया गया।

तो एक बार फिसले तो उभरने की राह नहीं बचती यहाँ। जिन्ना पाकिस्तान के निर्माण को लेकर पछताए या नहीं यह किसी एक किताब के लिखे से अन्तिम नहीं माना जा सकता। लेकिन जो तय है वह यह कि वह फिसले थे तो फिसलते ही जाना था। वह मुस्लिम राष्ट्र के क़ायद-ए-आज़म हो सकते थे, जैसे सावरकर उस फिसलन के बाद हिन्दू राष्ट्र के हीरो हैं। जैसे अपनी साम्प्रदायिक फिसलनों के बावजूद गोविन्द बल्लभ पन्त, पटेल, मालवीय हिंदुस्तान में हीरो हैं और लियाक़त अली ख़ान, भुट्टो जैसे पाकिस्तान में।

एक लोकतांत्रिक सेक्यूलर नागरिक के लिए एक तो ये सब प्रश्नवाचक चिन्ह के भीतर हैं दूसरे ये सबक कि मुश्किल वक़्त में पाँव ज़मीन पर जमाना ज़रूरी होता है। जब भीतर का हिन्दू मुसलमान ज़्यादा ज़ोर मारने लगे तो थोड़ा ठंडा पानी पीकर इतिहास की किताबें पलट लेनी चाहिए, बाक़ी नामवर हों आप या बेनाम गति के नियम सबके लिए एक ही होते हैं।

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अशोक कुमार पाण्डेय की एफबी टिप्पणी

 

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