बनिया बक्कालों का कुटीर उद्योग है पत्रकारिता : पत्रकारिता में भगवा रंग चमकने के साथ-साथ पत्रकारिता के पेशेवर रुख में भी जबरदस्त परिवर्तन

कोबरा पोस्ट ने पत्रकारिता धर्म भलीभांति निभाया, लेकिन यह कोई रहस्योद्घाटन नहीं है। भारत के अखबार मालिक हाल में ही अखबार को गन्ना मान कर नहीं निचोड़ रहे हैं।...

हिंदुस्तान की पत्रकारिता

राजीव मित्तल

पत्रकारिता बनिया बक्कालों का कुटीर उद्योग है, जिसमें ब्राह्मण संपादक की चापलूसी भरी भूमिका पत्रकारिता को भ्रूण में ही नष्ट कर देती है... और खास तौर पर हिंदी संपादक उसी अंदाज़ में पत्रकारिता करते हैं जैसे ब्राह्मण पुरोहित राजाओं के यहां चू..यापे किया करता था और मूर्ख राजा पूरी तरह मगन रहते थे, लेकिन अब बनिया मालिक सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है लाभ में कमी नहीं बर्दाश्त कर सकता, इसलिए अब वो दुलत्ती झाड़ना भी सीख गया है।

कोई नया रहस्योद्घाटन नहीं

कोबरा पोस्ट ने पत्रकारिता धर्म भलीभांति निभाया, लेकिन यह कोई रहस्योद्घाटन नहीं है। भारत के अखबार मालिक हाल में ही अखबार को गन्ना मान कर नहीं निचोड़ रहे हैं।

देश की आजादी के बाद से ही अखबार मालिकों की सोच पत्रकारिता को धंधा बनाने और पत्रकार को गुलाम बनाने की रही है। हां इस सोच में हिंदी और अंग्रेजी को थोड़ा पोटेंसी का फर्क ज़रूर रहा, क्योंकि अंग्रेजी अखबार कमाई में हिंदी से बहुत आगे थे, तो इसका असर दोनों भाषाओं के संपादकों पर दिखा। जहां अंग्रेजी के संपादक अपने काम और अपने स्टाफ के भले को लेकर मालिकों से भिड़ जाया करते थे तो हिंदी के संपादक सबसे पहले अपनी कुर्सी बचाने और फिर अपने तलवा चाटुओं की भलाई में लगे रहते।

दूसरे विश्वयुद्ध को खत्म हुए कुछ ही साल हुए थे। यह विश्वयुद्ध भले ही दुनिया के लिये तबाही लेकर आया हो, कई देशों की सत्ताओं के धुर्रे उड़ा गया हो, इंग्लैंड का चांद-सूरज एक कर गया हो, लेकिन वरदान साबित हुआ अमेरिका के लिये, और भारतीय मुख्यधारा में स्थापित बनियों के लिये, या उन्हीं की तरह पैसे से पैसा बनाने वालों के लिये, जिनकी आटे की चक्की या फुटपाथिया कपड़े की दुकान देखते ही देखते औद्योगिक साम्राज्य में बदल गईं।

बीसवीं सदी के इस धनपति वैश्य समाज ने परम्पराओं का निर्वाह करते हुए अपने पूर्वजों के नाम पर मंदिर बनवाए, धर्मशालाएं बनवाईं, स्कूल-कॉलेज खोले। धंधे को चोखा करने को अखबार भी शुरू कर दिए। गुलामी के दौर में दो-चार बैंक बैलेंसियों ने अंग्रेजों तक अपनी बात पहुंचाने को अंग्रेजी के अखबारों के बोर्ड तो पहले से ही मार्केट में टांग दिये थे, आजादी का सदुपयोग करने को हिंदी को लेकर भी उथल-पथल शुरू हो गई।

हिंदी बेल्ट वाले राज्यों में घी-तेल-नून-लकड़ी बेचने वाला कोई दिमागी बनिया या तो अपने भाई-बंधुओं या समान विचारों वाले दो दोस्तों के साथ यह ऐतिहासिक कार्य कर रहा था। रात-रात भर ट्रेडिल पर भुजाएं तोड़ कर, लीड वाले अक्षरों में आंखें फोड़ कर, सुबह कोई साइकिल पर, कोई तांगे पर तो कोई ठेले पर अखबार बेच रहा था। चूंकि आजाद देश की सत्ता लोकतांत्रिक थी, जिसके चलते जन प्रतिनिधि, जनसेवक और इसी तरह जन से अन्य शब्द मिलाकर बनीं कई प्रजातियां देश की हरितिमा में चार चांद लगाने में जुट चुकी थीं।

लोकम्पियाड

चूंकि इस आजाद लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र को सबल बनाने को लोकम्पियाड (लोकतंत्र+ओलम्पियाड) युग अब शुरू होने को था, जिसमें खेल बहुत सारे थे। पहला लोकम्पियाड नजदीक आ गया था। चार-छह राष्ट्रीय टीमें, 30-40 लोकल टीमें उसमें हिस्सा ले रही थीं। इधर, मुख्यधारा में छप रहे अंग्रेजी अखबारों के कई मालिक भी अब हिंदी में भी खुल कर उतर आए थे। उनके तम्बू-कनात पहले से ही विराजमान थे।

आजादी की लड़ाई के दौरान खादी ने उन्हें वंदेमातरम कहना सिखा दिया था और अक्सर रघुपति राघव राजा राम की धुन उन्हीं के यहां सुनायी पड़ती थी, तो उनकी नींदों और उनके ख्वाबों में गहाराई और संभावनाओं का असीम सागर लहरा रहा था। कमोबेश यही हाल मीडिया (आधा-अधूरा..क्योंकि तब इलेक्ट्रॉनिक के नाम पर रेडियो था, जिसमें सिलोन शब्द मीठी-मीठी उत्तेजना जगाता) क्षत्रपों का था। जनप्रतिनिधियों का सांस्कृतिक पुनरोद्धार शुरू हो चुका था और इस पुनरोद्धार कार्यक्रम में हिंदी मीडिया बहुत सहायक साबित हुआ। खास कर प्रदेश स्तर पर। कोलम्पियाड शुरू होने तक रिक्शे-तांगे वाले बग्घी और कारों में बेठने की अदा सीख चुके थे।

पत्रकारिता में भगवा रंग

जन प्रतिनिधि बन नेताई झाड़ने की शुरुआत 1936 में प्रांतीय चुनावों में हो चुकी थी, लेकिन चोला पूरी तरह बदला 1952 के आम चुनावों ने। और जन प्रतिनिधि नेता बन गया और जन सेवक अफसर। लेकिन खेला दाल में नमक के बराबर था। अखबारी क्षत्रप भी डैने फैलाने लगे थे। पैसा और रसूख दोनों हाथों में थे अब हनक की इच्छा भी जोर मारने लगी। नेता जी को बुला कर नवजात की नाल कटवाने का फैशन चलन में आ चुका था। उस चुनाव में कांग्रेस का वर्चस्व था, लेकिन मीडिया क्षत्रपों को लोकल स्तर पर पार्टी में गुटबाजी परोसी हुई मिल गई। कुल मिला कर अगले तीन कोलम्पियाड कांग्रेस ने अपनी जड़ों में मट्ठा चुआते हुए जीते। 77 तक आते-आते मट्ठे की रासायनिक क्रिया का चक्र शुरू हुआ और छठे लोकम्पियाड में सत्ता में परिवर्तन हुआ और हिंदी पत्रकारिता में भगवा रंग लहलहाने लगा।

पत्रकारिता में भगवा रंग चमकने के साथ साथ पत्रकारिता के पेशेवर रुख में भी जबरदस्त परिवर्तन आया...

जारी

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