जनविजय जी जैसे विद्वतजन हम जैसे लोगों को अपढ़, अछूत और अयोग्य मानते हैं

जनविजय जी ने कह दिया कि मैंने तारा बाबू या गुरुदत्त को पढ़ा ही नहीं है। यानी उनके मुताबिक मैं अपढ़ और लापरवाह दोनों हूं। हम पलटकर यह नहीं कहेंगे कि उ्नहोंने ताराशंकर को पढ़ा नहीं है। ...

हाइलाइट्स

संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करने वाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों,  यह जरूरी नहीं। आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं। ये लोग ही संघ परिवार के केसरिया अश्वमेध के गुप्त,  घातक सिपाहसालार हैं। जो राजनेताओं से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये ब्रेनवाशिंग रंगरेज हैं।

क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता।

पलाश विश्वास

संदर्भः

Anil Janvijay

July 17 at 3:26am

तारा बाबू का कुछ पढ़ा हो किसी ने तब तो कुछ कहेंगे। पलाश विश्वास ने बिना पढ़े ही सबको संघी घोषित कर दिया,  इसीलिए मैंने इनके इस लेख पर कोई जवाब देना ज़रूरी नहीं समझा। इन्होंने गुरुदत्त को भी नहीं पढ़ा है।  बस,  नाम लिख दिया है

कर्मेंदु शिशिर बंकिम चंद्र के आनंदमठ का हिंदुत्व से कुछ लेना देना नहीं मानते और वे ताराशंकर को क्सालिक मानते हैं और उनके सामंती मूल्यों पर चर्चा से उन्हें आपत्ति हैं। कर्मेंदु एक जमाने में हिंदी के सशक्त प्रतिबद्ध कथाकार माने जाते रहे हैं। इधर के उनके मंतव्यों को देख लें तो समझ में आ जायेगा कि कैसे हमारे तमाम प्रिय लोगों का पक्ष प्रतिपक्ष बदल गया है। मानुषी का स्त्रीपक्ष भी बदल गया है। हम साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में इस कायाकल्प की बात कर रहे थे।

मीडिया के केसरियाकरण पर आम सहमति के बावजूद साहित्य और संस्कृति के केशरिया आधार, गढ़ों, किलों और मठों पर कोई विमर्श क्यों नहीं है, मेरा मुद्दा दरअसल यही है। अपवादों की हम चर्चा नहीं कर रहे, राजनीतिक धर्मनिरपेक्षता की बात भी हम नहीं कर रहे। समता, न्याय और सामाजिक यथार्थ की कसौटी पर जनपक्षधर साहित्य की बात हम कर रहे हैं। हमारे लिए शाखा या संघ संस्थानों से जुड़ाव भी कोई कसौटी नहीं है। मनुस्मृति बहाली के सवाल पर साहित्य में संघ परिवार के एजंडा के मुताबिक साहित्य सांस्कृतिक अखिल भारतीय परिदृश्य के अलावा हम इस उपमाद्वीप के जिओ सोशियो इकानामिक पोलिटिक्स के नजरिये से हमेशा अपनी बात रखते आये हैं।

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असहमति हो सकती है। आप हमारे तर्कों को सिरे से खारिज कर सकते हैं। इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हम सम्मान करते हैं। हिंदुत्ववादियों के गाली गलौज का भी हम खास बुरा नहीं मानते। जगदीश्वर जी शायद मुझे कोलकाता में होने की वजह से थोड़ा बहुत जानते हैं, जिनके फेसबुक मतव्य पर हमने मंतव्य किया है और यह मंतव्य कोई शोध पत्र नहीं है कि संदर्भ प्रसंग सहित प्रमाण फेसबुक पर पेश किया जाये।

जनविजय जी ने कह दिया कि मैंने तारा बाबू या गुरुदत्त को पढ़ा ही नहीं है। यानी उनके मुताबिक मैं अपढ़ और लापरवाह दोनों हूं। हम पलटकर यह नहीं कहेंगे कि उ्नहोंने ताराशंकर को पढ़ा नहीं है। विद्वतजन हम जैसे लोगों को अपढ़, अछूत और अयोग्य मानते हैं। जीवन में इसका नतीजा हमें हमेशा भुगतना पढ़ा है। मेरे लिखे का हिंदी जगत या बंग्ला या इंग्लिश इलिट भद्रलोक समुदाय ने कोई नोटिस नहीं लिया है और मुझे अफसोस नहीं है।

चूंकि यह बहस पब्लिक डोमैन पर हो रही है तो मुझे जनविजय जी के इस मंतव्य पर थोड़ा स्पष्टीकरण देना है। कर्मेंदु शिशिर ने यह नहीं लिखा है कि मैंने ताराबाबू को नहीं पढ़ा है, तो इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है। जगदीश्वर जी असहमत हैं।

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जनविजयजी जिस तरह हिंदी वालों का जन्मदिन याद रखते हैं, इससे लगता है कि वे हिंदी वालों को बहुत खूब जानते हैं। मैं चूंकि नोटिस लेने लायक नहीं हूं, वे मुझे नहीं जानते होंगे और जाहिर है कि मुझे कभी पढ़ा भी नहीं होगा। क्योंकि प्रिंट में मुझे कोई छापता भी नहीं है और न मैं पुस्तकें छपवाने में यकीन रखता हूं, तो यह उनका दोष भी नहीं है।

मैंने थोड़ी बहुत पढ़ाई बचपन से लेकर अब तक की है। जनविजय जी को मालूम होना चाहिए कि बंगाली परिवारों में सत्तर के दशक तक रवींद्र नजरुल माइकेल विद्यासागर शरत ताराशंकर का पाठ अनिवार्य दिनचर्या रही है। सत्तर के दशक तक हमने भक्तिभाव से वह सारा साहित्यआत्मसात किया है बंगाली संस्कृति के मुताबिक। यह मेरा कृत्तित्व नहीं है। सामुदायिक, सामाजिक जीवन का अभ्यास है। बाकी सत्तर के दशक में जीवन दृष्टि सिरे से बदल जाने से वह भक्तिभाव नहीं है जो रामचरित मानस, गीता भागवत,  पुराण, उपनिषद पाठ का होता है।

यही मेरा अपराध है।

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जनविजय जी, क्लासिक साहित्य जनपक्षधर होता तो हिंदी में अज्ञेय से बड़ा जनपक्षधर कोई नहीं होता। मुक्तिबोध ने कहा है कि सरल होने का मतलब जनता का साहित्य नहीं होता। कबीर दास की रचनाओं को हम सरल नहीं कह सकते क्योंकि उसका दर्शन बेहद जटिल है। लेकिन उनका पक्ष जनता का पक्ष है, यह कहने में दिक्कत नहीं है। रामचरित रचने वाले गोस्वामी तुलसी दास का रामायण क्लासिक लोकसाहित्य है लेकिन उनका मर्यादा पुरुषोत्तम हिंदू राष्ट्र का अधिनायक और मनुस्मृति अनुसासन लागू करने वाला है। उनका राम स्त्री विरोधी है। इस सच का सामना करने का मतलब यह कतई नही है कि हम संतों के सामंत विरोधी आंदोलन को खारिज कर रहे हैं।

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बहुत कुछ महत्वपूर्ण और क्लासिक लिखा जा रहा है। हमारे समय के दौरान उदय प्रकाश और संजीव ने बहुत कुछ रचा है। संजीव के रचनास्रोतों और उनकी पृष्ठभूमि से मैं परिचित हूं और उदयप्रकाश की रचनाओं की खूब सराहना होने के बावजूद मैंने उसे जनपक्षधर नहीं बताया है। इसी के साथ संजीव को बी मैंने बदलाव का साहित्यकार नहीं माना है।

बांग्ला में अस्सी के दशक के बाद जो कोलकाता केंद्रित साहित्य लिखा जा रहा है, उसके मुकबले हमने हमेशा बांग्लादेश के जनपद केंद्रित या असम, त्रिपुरा, बिहार में लिखे जा रहे बांग्ला साहित्य को बेहतर माना है। इसलिए सुनील गंगोपाध्याय समूह के लेखकों और कवियों के पक्ष में मैं कभी नहीं रहा हूं।

बांग्ला में माणिक बंद्योपाध्याय, महाश्वेता या नवारुण दा को भद्रलोक समाज क्लासिक नहीं मानता और वह ताराशंकर के बाद सीधे सुनील संप्रदाय का महिमामंन करता है जैसे आज भी धर्मवीर भारती अज्ञेय के वंशज हिंदी में मठों के मालिकान हैं।

सलाखों के पीछे आजादी

सत्तर के दशक में हिंदी,  बांग्ला, मराठी, पंजाबी साहित्य का जो जनप्रतिबद्ध कृषि क्रांति समर्थक धारा है, वह मुक्तबाजार में किस तरह कारपोरेट मीडिया की तर्ज पर कारपोरेट हिंदुत्व के मूल्यों के अबाध पूंजी प्रवाह में तब्दील है, मेरी मुख्य चिंता इस सांस्कृतिक सामाजिक कायाक्लप की है, जिसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति निरंकुश रंगभेदी मनुस्मृति सत्ता है और जिसका धारक वाहक संघ परिवार है।

जरूरी नहीं है कि साहित्य और संस्कृति की यह धारा सीधे तौर पर गुरु गोलवलर और सावरकर विचारधारा से प्रेरित है। सरकारी खरीद, सरकारी अनुदान और पाठ्यक्रम के मुताबिक प्रकाशन तंत्र की वजह से हिंदी में राजभाषा होने की वजह से भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा पूंजी खपने की वजह से एक अदृश्य सर्वशक्तिमान सवर्ण जातिवादी माफिया तंत्र हैं, जिसमें प्रकाशक, आलोचक और संपादक वर्ग समाहित है। पाठ्यक्रम में किताबों की खरीद तय करने वाले प्राध्यापकों का एक शक्तिशाली तबका भी हिंदी पर कंडली मारे हुए है। लघु पत्रिका आंदोलन के अवसान के बाद इसलिए सरकारी पूंजी से हिंदी में केसरियाकरण या केसरिया कायाकल्प निःशब्द रक्तहीन क्रांति है और इस सच का सामना विद्वतजन करना नहीं चाहते।

संघ की विचारधारा का मूलाधार हिन्दुत्व के रूप में फासिज्म है, हिन्दू तो आवरण है

जगदीश्वरजी ने संघ की विचारधारा से जुड़ी रचनाधर्मिता पर सवाल उठाया है, क्लासिक साहित्य पर नहीं। लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति के मुताबिक गोस्वामी तुलसीदास बेजोड़ हैं, लेकिन उनका राम स्त्रीविरोधी, अनार्य सभ्यताविरोधी, द्रविड़ विरोध, अस्पृश्यता का समर्थक और हिंदू राष्ट्र की नस्ली विचारधारा का मूल स्रोत है, यह लिखने से आप कहेंगे कि हमने रामायण भी है।

संघी विचारधारा और एजंडे के लिए काम करनेवाले शाखाओं में निक्कर पहनकर प्रशिक्षित हों, यह जरुरी नहीं। आयातित हाइब्रिड जल जगंल जमीन से कटी प्रजाति के साहित्यकार बुद्धि्जीवी शाखाओं में गये बिना ही मुक्तबाजारी हिंदुत्व एजंडे के तहत साहित्य संस्कृति पर सवर्ण एकाधिकार वर्चस्व बनाये हुए हैं। ये लोग ही संघ परिवार के केसरिया अश्वमेध के गुप्त,  घातक सिपाहसालार हैं। जो राजनेताओं से ज्यादा खतरनाक हैं क्योंकि ये ब्रेनवाशिंग रंगरेज हैं। 

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