कर्नाटक : फिर से भारतीय राजनीति का सामंतीकरण

भाजपा ने कर्नाटक में जैसा चुनाव प्रचार किया, उससे लगता है कि वह हर कीमत पर जीतना चाहती थी... भाजपा के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान में संयत भाषा के लिए कोई जगह नहीं

इकाॅनोमिक ऐंड पाॅलिटिकल वीकली
Updated on : 2018-05-22 11:10:48

भाजपा ने कर्नाटक में जैसा चुनाव प्रचार किया, उससे लगता है कि वह हर कीमत पर जीतना चाहती थी

कर्नाटक चुनावों के नतीजों की व्याख्या कई तरह से हो सकती है। कांग्रेस और जनता दल सेकुलर के लिए सैद्धांतिक नाकामी की राजनीति के तौर पर इसे देख सकते हैं। अगर दोनों पार्टियों ने चुनाव से पहले गठबंधन कर लिया होता तो नतीजों के बाद सुरक्षित स्थिति में होते। ये चुनाव कर्नाटक के लोगों के लिए महत्वपूर्ण थे लेकिन भाजपा इसे अलग ढंग से देखती है। भाजपा यह चुनाव जीतकर पूरे भारत पर अपनी जीत के भाव को मजबूत करना चाहती थी। पार्टी के कुछ नेता कहते भी हैं कि देश के 80 फीसदी हिस्से में भाजपा सरकार है। प्रिंट मीडिया ने भारत के नक्शे के जरिए इस बात को और मजबूती देने का काम किया। राजनीति की हिंदुत्ववादी विचारधारा में चुनावी जीत को साम्राज्य विस्तार के तौर पर देखा जाता है।

लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव जीतकर सत्ता में आने की भाजपा की इच्छा में कोई बुराई नहीं है। लेकिन मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश में कुछ सिद्धांत तो होना चाहिए। यहां इसका तात्पर्य इस बात से है कि भाजपा बताती कि 2014 के लोकसभा चुनावों में उसने जो वादे किए थे, उनमें से कितने पूरे हुए हैं। लेकिन भाजपा ने यह बताने के बजाए चुनाव प्रचार को निचले स्तर पर ले जाने का काम किया।

भाजपा के कांग्रेस मुक्त भारतअभियान में संयत भाषा के लिए कोई जगह नहीं

नेताओं को सभ्य और संयत भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। लेकिन भाजपा के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान में इसके लिए कोई जगह नहीं है। भाजपा कांग्रेस को अपना दुश्मन साबित करते रहना चाहती है। इस वजह से इसके नेता आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस नेताओं पर निजी हमले किए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस के खिलाफ युद्ध में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा के जरिए हल्ला बोला। दरअसल, भाजपा यह चाहती थी कि वह बिना किसी विरोध के सत्ता में आ जाए। मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो इन चीजों को पसंद नहीं करता और यही वजह है कि भाजपा को बहुमत नहीं मिलता। यह पूर्वोत्तर के मेघालय और मणिपुर में भी दिखा और गोवा और कर्नाटक में भी।

केंद्र के साथ राज्यों में भी सत्ता कब्जाने के चक्कर में भाजपा ने वैसा राजनीतिक रास्ता अपना लिया जिसका बचाव वह नैतिक ढंग से नहीं कर सकती। इसने उन लोकतांत्रिक तकाजों का उल्लंधन किया है जिसके तहत सबसे बड़ी पार्टी सरकार बनाने का दावा पेश करती थी। भाजपा ने तो दो सीटें जीतने के बावजूद किसी तरह से मेघालय में सरकार बना लिया और कर्नाटक में बहुमत से कम 104 सीटें होने पर भी सरकार बनाने से नहीं बाज आई।

भाजपा किसी भी कीमत पर सत्ता चाहती है। लेकिन एक सभ्य लोकतंत्र का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि लोगों को अपने पक्ष में लाने के लिए कितनी सभ्य भाषा और तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया गया। पार्टी कार्यकर्ताओं को लोकतंत्र मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए।

एक जाति के वर्चस्व की महत्वकांक्षा के साथ काम कर रही है भाजपा

भाजपा जिस महत्वकांक्षा के साथ काम कर रही है, वह अतीत में एक जाति के वर्चस्व से जुड़ती है। आम जनता को लोकतंत्र में सभ्यता को बनाए रखने के लिए यह सोचना होगा कि वैसी पार्टी को चुनें जो एक खास तरह का वर्ग विभेद पैदा करना चाहती है या फिर वैसी पार्टी को जो वंशवादी राजनीति की पोषक है। इस सामंती महत्वकांक्षा में इसकी कोई जगह नहीं है कि आज मेरा शासन है, कल मुझ पर भी किसी और का होगा। इसकी जगह इस सोच ने जगह ले ली है कि आज मेरा शासन और मेरा ही शासन हमेशा रहेगा।

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