केशव राव जाधव- एक खांटी समाजवादी के डॉ लोहिया से जुड़े अनुभव

डॉ. लोहिया का साथी केशव राव जाधव की यादों के पुराने अंश...

डॉ. लोहिया का साथी केशव राव जाधव की यादों के पुराने अंश

सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य और डॉ लोहिया के बेहद करीबी रहे प्रो केशव राव जाधव का तेलंगाना के हैदराबाद में निधन हो गया है। 2011 में युवा संवाद के लोहिया विशेषांक के सिलसिले में डॉ केशव राव जाधव से हैदराबाद में मुलाक़ात हुई थी। तब मैंने उनका एक लंबा साक्षात्कार भी किया था। केशव राव जाधव डॉ लोहिया के बेहद करीबी थे। उन्होंने साक्षात्कार के दौरान डॉ लोहिया से जुड़े कुछ अनुभव साझा किए थे। -राजेश कुमार (टीवी पत्रकार)}

1956 में मैं एम ए फाइनल इयर का छात्र था, और वो तब का समय था जब सोशलिस्ट पार्टी में काफी झगड़े हो रहे थे। राष्ट्रीय स्तर पर और राज्य के स्तर पर नेताओं में काफी मनमुटाव था। उस वक्त मैं समाजवादी युवजन सभा के हैदराबाद का सेक्रेटरी था। उन दिनों उसे सोशलिस्ट यूथ लीग कहा जाता था। जो बाद में जाकर समाजवादी युवजन सभा कहलाई। उस दौर में हमारे एक शिक्षक थे वी. सुधाकर जो सोशलिस्ट पार्टी में काफी सक्रिय थे। एक दिन, मैं आर्टस कॉलेज के पास बस सटैंड पर खड़ा था कि प्रोफेसर सुधाकर मिल गए। उन्होंने कहा कि डॉक्टर साहब (राम मनोहर लोहिया ) हैदराबाद आए हुए हैं उनसे मिलना होगा। ये कहकर वे मुझे जबरदस्ती लोहिया जी से मिलाने ले गए। उस वक्त जो नई पार्टी बनी थी उसका हेड ऑॅफिस हैदराबाद में ही था। तक़रीबन 15 साल तक हैदराबाद में सोशलिस्ट पार्टी का दफ्तर रहा, "मैनकाइंड" और "चौखंबा" भी यहीं से निकला। इस तरह मैं प्रोफेसर सुधाकर के साथ पहली बार लोहिया जी से मिला। लोहिया जी उन दिनों तक़रीबन हर महीने आठ दस दिन पार्टी ऑॅफिस में बैठते थे। लोहिया जी से जब पहली बार मिला तो वे देर तक बातें करते रहे। उन्होंने ज्यादातर परिवार के बारे में बात की। जैसे तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं ? घर में कौन कौन लोग कमाते हैं और कितने भाई बहन हैं ? उन्होंने काफी चीजें पूछीं। उनका नज़रिया था कि जो लोग नौकरी कर रहे हैं वो पार्टी का उतना काम नहीं कर पाएंगे इसलिए उन्हें कुछ और जिम्मेदारी दी जाती थी।

बातचीत के बाद उन्होंने मुझे कहा कि "मैनकाइंड" का काम देखो। मुझे काफी हैरानी हुई और मैंने कहा कि डॉक्टर साहब "मैनकाइंड" तो एक इन्टरनेशनल मैगज़िन है। और इसमें बड़े बड़े नाम छपते हैं, मैनकाइंड के लिए बड़े बड़े लेखक लिखते हैं। मैं भला क्या इसकी एडिटिंग कर पाउंगा। तो डॉ लोहिया ने जवाब दिया कि देखो हर काम सीखना पड़ता है। कोई भी पैदाइस से कोई काम नहीं जानता। तुम जल्दी सीख जाओगे। फिर उन्होंने मैनकाइंड के एडिटिंग इनचार्ज अभयवद्र्धने को बुलाकर कहा कि केशव के लिए एक टेबल और एक कुर्सी का इंतजाम करो और उसे कम्यूनिकेशन का प्रभार दे दो। मैनकाइंड में कम्यूनिकेशन एक सेक्शन था । इस तरह मैं मैनकाइंड के जरिए पहली बार डॉ लोहिया के संपर्क में आया।

एक दूसरी घटना जो डॉक्टर साहब से जुड़ी हुई मुझे याद आती है वे ये है कि एक बार उन्होंने मुझे अनुवाद करने के लिए आठ दस हिन्दी के पत्र दिए। मुझसे लोहिया जी ने पूछा कि क्या तुम्हें हिन्दी आती है। तो मैंने कहा कि हिन्दी की औपचारिक शिक्षा तो मेरी कभी हुई नहीं लेकिन आर्य समाज की रात्रि पाठशाला में मैंने दो चार महीने तक हिन्दी पढ़ी है। उस्मानिया में जहां मैं पढ़ता लिखता था,,वहां उर्दू माध्यम में पढ़ाई होती थी। अंतिम बादशाह उस्मानी खां का ये बहुत बड़ा एचीवमेंट था कि उन्होंने हैदरबाद को पहला ऐसा राज्य बनाया जहां सारा काम एक हिन्दुस्तानी जुबान में हुआ करता था। इसी वजह से मेरी पूरी पढ़ाई उर्दू में हुई और इंटरमीडिएट साइंस भी मैंने उर्दू माध्यम से ही किया। उसके बाद मैंने इंगलिश लिटरेचर की पढ़ाई शुरू की। हालांकि मैंने आर्य समाज की रात्रि पाठशाला में हिन्दी सीखी थी इसी वजह से मैं थोड़ी बहुत हिन्दी जानता था। तो डॉक्टर लोहिया ने मुझे हिन्दी के कुछ पत्र दिए और कहा कि इसका अंग्रेजी में अनुवाद करके मुझे दे दो। मैंने हां तो कर दिया लेकिन मैंने ये नहीं सोचा था कि लैटर प्रिन्टेड या टाइप नहीं है। वो सारे पत्र हाथ से लिखे हुए थे और लिखावट भी बहुत ही रफ थी। मुझे पढ़ने में काफी दिक्कत हो रही थी मैंने मुश्किल से पांच पत्र का अनुवाद किया। दूसरे दिन डॉक्टर साहब मिले तो उन्होंने पूछा कि काम हो गया तो मैंने कहा कि डॉ साहब काम हो रहा है अभी तक पांच का काम पूरा किया है बाकी का कल तक हो जाएगा। लेकिन लोहिया जी गुस्से में आ गए और उन्होंने मुझे बहुत डांटा। मैंने कोई रिएक्ट नहीं किया बस इतना कहा कि काम कल तक हो जाएगा। क़रीब दो घंटे बाद लोहिया जी दोबारा ऑॅफिस के उस कमरे में आए जहां मैं बैठा था। उन्होंने कहा कि चलो चाय पीकर आएं। उस वक्त पार्टी दफ्तर में हम दो लोग ही थे। मेरे कांधे पर हाथ रखकर वो एक फर्लांग दूरी पर एक होटल में गए। मुझसे उन्होंने कहा कि मैं तुम्हीं लोगों को तो डॉंट डपट सकता हूं , और कौन लोग हैं मेरे साथ। वो क्षण मेरे लिए बहुत ही मार्मिक था। मैंने कहा कि लोहिया जी घबराइये नहीं हमारी पार्टी और उसके लोग देश में बहुत मजबूत हैं। भले लोग उसे मानने से इंकार करते हों। वो तब का समय था जब हमारी हैसियत बहुत कम थी और अखबार हमारे ख़िलाफ़ लगातार लिख रहे थे।

-केशव राव जाधव

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