कुलसूम सयानी : हो सके तो मुल्क़ की नीव रखने वाले हर हाथ को ढूंढकर महसूस कीजिये

जब आज़ादी के वक़्त मुस्लिम लीग ने लोगों को भड़काने का काम किया तो इन्होंने शिक्षा का ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया कि उसके सामने सब बौने हो गए।...

हफीज़ किदवई

7 साल की उम्र में जिसने मुल्क़ की आज़ादी के ख्वाब को अपनी आँखों में संजोया और सब कुछ छोड़ गाँधी जी के पाँव के पीछे अपने पाँव बढ़ा दिए।एक लड़की जिसके जज़्बे के आगे अंग्रेज़ों को तो झुकना था,लीगियों को भी झुक जाना पड़ा।उन्हें दोहरी लड़ाई लड़नी थी।एक अंग्रेज़ों को बाहर निकालने की दूसरी मुस्लिम लीग के पृथक्करण के विरुद्ध।गाँधी जी का इस तेज़ तर्रार महिला पर हाथ था तो इस महिला का का हाथ समाज की नब्ज़ पर था।अपने दम पर गुजरात में रहने वाली यह अंग्रेज़ों को तो धूल चटा ही गईं साथ आने वाले भारत की बुनयाद भी रख गईं।

यह वोह पहली महिला थीं जिसने गुजरात भर में घूम घूम कर स्कूल खोले,शिक्षा का प्रचार किया।लड़कियों की पढ़ाई पर इतना ज़ोर दिया की कांग्रेस के कार्यालयों में क्लास चलने लगी।जब आज़ादी के वक़्त मुस्लिम लीग ने लोगों को भड़काने का काम किया तो इन्होंने शिक्षा का ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया की उसके सामने सब बौने हो गए।आज़ादी की इस महत्वपूर्ण साथी ने देश आज़ाद होने पर कुछ भी नही लिया। ख़ामोशी से तालीम के छोटे छोटे चिराग जलाती हुई चली गईं।हममे से किसी को उन्हें याद करने की भी फुर्सत नही।हमारे मुल्क़ के ढाँचे में ऐसे लाखों चेहरे दफ़न हो गए,जिन्हें शायद हमे याद रखना था।

काँग्रेस के "जन जागरण"अभियान को इन्होंने ही सबसे सफल बनाया। जब सब तरफ मायूसी थी।तब "रहबर" नाम से एक प्रौढ़ शिक्षा का अभियान चलाया जो बेहद सफल हुआ।उस दौर में उनके इतना प्रौढ़ शिक्षा पर किसी ने काम नही किया।दसयों किताबें लिखी मगर अब वोह ज़िक्र से ही बाहर हैं।

यह महिला हैं कुलसूम सयानी।आज उनकी पुण्यतिथि है। हो सके तो मुल्क़ की नीव रखने वाले हर हाथ को ढूंढकर महसूस कीजिये। वैसे लोग कुलसूम आपा को भले ही न जानते हों मगर उनके बेटे रेडियो की मशहूर आवाज़ अमीन सयानी को ज़्यादातर जानते ही होंगे।उनसे पहले ताउम्र जूझने वाली कुलसूम सयानी को याद कर लीजिये।नीचे तस्वीर में कुलसूम आपा अपने बड़े बेटे हमीद सयानी के साथ और जो लड़का है वोह है अमीन सयानी।।।।

हफीज़ किदवई की एफबी टाइमलाइन से साभार

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