कवि कुमार का आपत्तिजनक बयान आप और केजरीवाल की घोषित लाइन है

कुमार विश्वास जातिवाद का ज़हर फैलाने का आरोप उन नेताओं पर लगा रहे हैं जिन्होंने जातिवाद की खाई को पाटने में सबसे ज्यादा योगदान दिया था।...

अतिथि लेखक
हाइलाइट्स

बात कुमार विश्वास की और से दी गई सफाई की करें तो उनकी सफाई पहले के बयान से भी ज्यादा आपत्तिजनक है। पहले वीडियो में उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था लेकिन दूसरे वीडियो में वो बेशर्मी से विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम ले रहे हैं। जिस वीपी सिंह ने एक बड़े तबके को आरक्षण से जोड़कर पिछड़ी जातियों को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की कोशिश की, उनका नाम लेकर पार्टी प्रवक्ता का इतना बेशर्मी दिखाना बग़ैर केजरीवाल के शह के नहीं हो सकता।

आम आदमी पार्टी और कवि कुमार का आपत्तिजनक बयान

राजेश कुमार

बाबा साहेब अंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कुमार विश्वास ने जो कुछ भी कहा है, दरअसल वो आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल/मनीष सिसोदिया की घोषित लाइन है। कुमार कवि की ओछी टिप्पणी इंडिया अंगेस्ट करप्शन (आईएसी) नामकी संस्था का मूल उद्देश्य है, जिसकी शुरुआत यूथ फॉर इक्वलिटी को फंड और नेतृत्व उपलब्ध कराने से हुई थी। आपको याद होगा जे एन यू  जैसे विश्वविद्यालयों और कई मेडिकल कोलेजों में मुहिम चलाने के बाद संवैधानिक आरक्षण के विरोध में जंतर-मंतर पर यूथ फॉर इक्वलिटी का प्रदर्शन किया गया था। लिहाज़ा कुमार विश्वास ने जो कहा है वो अचानक आया हुआ बयान नहीं है, बल्कि समय-समय पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे की कोर टीम के लोग इस तरह की बयानबाजी करते रहते हैं।

ग़ौरतलब है कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी मंच से भी कई बार आरक्षण विरोधी बयानबाजी की है। ये लोग राजनीति में किसी भी तरह की विचारधारा का विरोध करते हैं। ज़बकि भारत का संविधान, जैसा भी वह है, एक विचारधारा ना नाम है। प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव जैसे लोग आम आदमी पार्टी की विचारधारा हीनता को स्वीकार करके ही उसमें शामिल हुए थे।     

तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद जब आम आदमी पार्टी का गठन किया जा रहा था। उसी वक्त डॉ प्रेम सिंह ने अपने लेखों और वक्तव्यों के जरिये बार-बार अगाह किया था कि नवउदारवाद की कोख से निकली ये पार्टी ना केवल सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक राजनीतिक मूल्यों को कमजोर करेगी बल्कि नवउदारवाद के खिलाफ संघर्षों को भी निर्णायक क्षति पहुंचाएगी। यही वजह है कि जब देश में कोई भी पार्टी बाबा साहेब और आरक्षण की खुलकर मुखालफत नहीं कर पाती, तब आम आदमी पार्टी के बैनर तले एक स्वयंभू कवि देश के सबसे बड़े नेताओं पर जातीय उन्माद की राजनीति करने का आरोप लगा रहा है।

आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास जातिवाद का ज़हर फैलाने का आरोप उन नेताओं पर लगा रहे हैं जिन्होंने जातिवाद की खाई को पाटने में सबसे ज्यादा योगदान दिया था

कुमार विश्वास और उनके मेंटर अरविंद केजरीवाल दरअसल सोशल जस्टिस विरोधी राजनीति के विस्तार का प्रतिनिधित्व करते हैं जो कॉर्पोरेट के हाथ का खिलौना है। 

विवादित वीडियो मे कुमार विश्वास ना केवल वर्णवादी व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं, बल्कि खुलकर स्त्री विरोधी बातें भी कर रहे हैं। इस तरह का बयान कुमार विश्वास ने कोई पहली बार नहीं दिया है। कवि कुमार का नरेंद्र मोदी का गुणगाण और रंगभेदी बयान देने वाला वीडियो पहले भी सामने आ चुका है। लेकिन बावजूद इसके वे ना केवल आम आदमी पार्टी में बने रहे, उन्हें पार्टी ने बड़ी जिम्मेदारी भी दी गई। अभी भी यही लगता है कि पार्टी सुप्रीमों उन्हें भाजपा का रास्ता नहीं दिखने जा रहे हैं, जबकि कुमार विश्वास पर संघी होने और भाजपा में जाने की तैयारी का आरोप लगता रहता है। ये दोनों एक ही राह के हमसफ़र हैं।

आप के संस्थापक सदस्य कुमार विश्वास का बयान भले ही कुछ लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है। लेकिन सामाजिक न्याय के संघर्षों को कुंद करने की कोशिश आम आदमी पार्टी पहले दिन से कर रही है। और कुमार विश्वास जैसे लोग अपनी भूमिका बखूबी निभा भी रहे हैं।

आम आदमी पार्टी की 'क्रांतिकारिता' को लेकर बुद्धिजीवियों के आगे धुंध की भले ही अभी तक साफ नहीं हो सकी हो, लेकिन भ्रष्ट्राचार विरोधी आंदोलन की आड़ में कॉर्पोरेट राजनीति को साधते इन खिलाड़ियों की असलीयत अब जनता के सामने आ चुकी है। 

इस पूरे मामले में आप के एक और नेता संजय सिंह का बयान महज राजनीतिक लीपा-पोती केअलावा कुछ नहीं है। कुमार विश्वास द्वारा निकाले गए नेताओं प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को वापस बुलाने की बात की है। इस पर प्रशांत भूषण का यह बयान कि आप में दोबारा शामिल नहीं होंगे, आश्वस्त करने वाला नहीं लगता। क्योंकि दोनों धडों में फिर से मिलने की बातचीत के संकेत समय-समय पर मिलते रहते हैं। बात कुमार विश्वास की और से दी गई सफाई की करें तो उनकी सफाई पहले के बयान से भी ज्यादा आपत्तिजनक है। पहले वीडियो में उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था लेकिन दूसरे वीडियो में वो बेशर्मी से विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम ले रहे हैं। जिस वीपी सिंह ने एक बड़े तबके को आरक्षण से जोड़कर पिछड़ी जातियों को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की कोशिश की, उनका नाम लेकर पार्टी प्रवक्ता का इतना बेशर्मी दिखाना बग़ैर केजरीवाल के शह के नहीं हो सकता।

 (लेखक टीवी पत्रकार हैं)

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