विश्व हिन्दी सम्मेलन या हिन्दुत्व सम्मेलन ?

हिन्दी एक दुरभिसंधि का शिकार हो गई। हिन्दी के समूचा तंत्र पर मनुवादी सोच का कब्जा ऊपर से नीचे तक दिखाई देता है। जातीय, प्रांतीय और धार्मिक आस्थाओं ने भी हिन्दी को दुर्बल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी...

ललित सुरजन

विश्व हिन्दी सम्मेलन या हिन्दुत्व सम्मेलन ?

14 सितंबर है हिन्दी दिवस

हिंदी : विसंगतियां व विडंबनाएं

ललित सुरजन

कल 14 सितंबर है। हिन्दी दिवस। इस मौके पर मुझे कुछ ऐसे नाम याद आ रहे हैं जिनसे कम से कम छत्तीसगढ़ में पाठकों का एक बड़ा वर्ग परिचित है। प्रोफेसर वि.गो. वैद्य रायपुर के शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय में रसायनशास्त्र के प्राध्यापक थे। पड़ोसी थे और अक्सर मुलाकातें होती थीं। एक दिन यूं ही कुछ बात छिड़ी तो उन्होंने देशबन्धु के लिए ''कुछ ज्ञान-कुछ विज्ञान;;  शीर्षक से साप्ताहिक स्तंभ लिखना शुरू किया जो कई बरस चला। वे मराठीभाषी थे और उनके कॉलम में मराठी का पुट आने से भाषा और निखर जाती थी। वैद्य साहब बाद में बेटे के पास पुणे चले गए। वहां उन्होंने मराठी से हिन्दी में विज्ञान कथाओं का अनुवाद करना प्रारंभ किया, फिर उन्होंने एनबीटी के लिए मूल हिन्दी में ही एक विज्ञान उपन्यास लिखा।

के.एल. बानी और सोमनाथ साहू

रायपुर के वास्तुविद् याने आर्किटेक्ट के.एल. बानी के साथ अच्छा संपर्क था। एक दिन उनका लिखा पत्र देखा तो भाषा और लिखावट ने अनायास ही मन मोह लिया। मेरे आग्रह पर श्री बानी ने इस अखबार में तत्व चिंतन पर एक साप्ताहिक कॉलम की शुरूआत की जो पिछले साल उनके असमय निधन तक नियमित प्रकाशित होता रहा।

कुछ ऐसा ही किस्सा डॉ. सोमनाथ साहू के साथ हुआ। वे हमारे प्रदेश के वरिष्ठ और सम्मानित चिकित्सक हैं। उन्होंने एक दिन मुंबई में मेडिकल कॉलेज के अपने शिक्षक के पत्र की कापी अपने एक टिप्पणी के साथ मुझे पढ़ने भेजी। सुंदर लिखावट, सुंदर भाषा, और सुंदर अभिव्यक्ति। मैंने डॉ. साहब को उकसाया तो वे अपने आत्मकथात्मक संस्मरण लिखने के लिए काफी ना-नुकुर के बाद राजी हुए और इस तरह उन्होंने एक मुकम्मल पुस्तक लिख डाली।

इंदर सिंह आहूजा

एक नाम का जिक्र और करूंगा। इंदर सिंह आहूजा बेमेतरा जिले के दाढ़ी नामक गांव से आते हैं। इनका रायपुर में अनाज की आढ़त का कारोबार था। आहूजा जी ने शायद कॉलेज की पढ़ाई भी नहीं की है। लेकिन पिछले दो दशक से वे देशबन्धु में गुरु ग्रंथ साहब पर एक साप्ताहिक स्तंभ लिखते हैं। उन्होंने हमारे लिए खालसा पंथ के तीन सौ वर्ष पूर्ण होने पर मनोयोग से एक पुस्तक का संपादन भी किया। इस सिलसिले को विस्तार दें तो हमें दक्षिण भारत के उन हजारों व्यक्तियों का ध्यान आता है जिन्होंने महात्मा गांधी और राजाजी की प्रेरणा से हिन्दी सीखी और फिर अहिन्दी भाषी दक्षिण भारतीयों को हिन्दी सिखाने के मिशन में जुट गए। आज भी दक्षिण के पांचों राज्यों में स्वैच्छिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में इस कार्य में जुटे हुए हैं।  इनके साथ-साथ हमें मुंबई के फिल्म उद्योग का भी ध्यान आता है जिसने हिन्दी को देशव्यापी स्तर पर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह क्रम यहां समाप्त नहीं होता। फिलहाल मेरा मकसद यह रेखांकित करना है कि जिस हिन्दी को हम राष्ट्रभाषा कहकर इठलाते है उसके उन्नयन का काम कितने जाने-अनजाने लोगों ने बिना किसी प्रत्याशा के किया है। ऐसे तमाम उदाहरण हिन्दी के भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं। किन्तु दूसरी तरफ निराशा होती है जब हमारा ध्यान हिन्दी जगत में व्याप्त विसंगतियों और विडंबनाओं की ओर जाता है।  हिन्दी भाषी प्रदेशों में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर हिन्दी की जो स्थिति देखते हैं, निराशा से मन वहीं घिर जाता है। प्राथमिक शिक्षा पर 'असर’ नामक जो वार्षिक रिपोर्ट आती है उसमें सरकारी स्कूलों की बात होती है, गणित की कमजोरी का उल्लेख होता है; लेकिन जिस भाषा में सारा जीवन व्यवहार होना है, उसकी तरफ कोई तवज्जो नहीं दी जाती। एक ओर जहां पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की योजनाएं चल रही हैं वहीं मातृभाषा या राष्ट्रभाषा के प्रति बेरुखी पर क्यों नहीं चिंता होना चाहिए?

उच्च शिक्षा में तो हाल बेहाल हैं। अधिकतर विद्यार्थी हिन्दी में एम.ए. इसलिए करते हैं कि उन्हें यह विषय स्नातकोत्तर उपाधि पाने का सबसे सरल उपाय लगता है। विषय में उनकी रुचि अक्सर नहीं होती और उपाधिधारी अनेक व्यक्ति हिन्दी में खुद को भलीभांति अभिव्यक्त नहीं कर पाते। एम.ए. ही क्यों, हिन्दी साहित्य में पीएचडी करने वालों की भी रुचि न तो भाषा में होती, न तो साहित्य में। उनके लिए वह नौकरी पा जाने का एक जरिया मात्र है। जब शिक्षा प्राप्ति के दौरान यह स्थिति है तो आगे चलकर क्या होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। किन्तु हम विद्यार्थियों को ही क्यों दोष दें? हिन्दी का पूरा तंत्र जिनके जिम्मे है वे लोग क्या कर रहे हैं? इसमें हिन्दी अखबार, टीवी चैनल, सरकारी उपक्रमों के राजभाषा विभाग, हिन्दी सेवा के नाम पर चल रही संस्थाएं, विश्व हिन्दी सम्मेलन इत्यादि सब शामिल हैं।

मैं एक समय रेलवे बोर्ड की राजभाषा समिति का सदस्य था। मैंने देखा कि देश के अनेकानेक रेलवे स्टेशनों पर जो हिन्दी ग्रंथालय हैं उनमें एक सिरे से अपठनीय पुस्तकें भरी पड़ी हैं जिन्हें गैर-हिन्दी तो क्या, हिन्दीभाषी रेलकर्मी छूना भी पसंद नहीं करते। जाहिर है कि यह लेखक, प्रकाशक और राजभाषा विभाग का मिला-जुला करतब था। अन्य सार्वजनिक उपक्रमों में भी स्थिति बेहतर नहीं है। जो राजभाषा अधिकारी होते हैं उनमें से अधिकतर औपचारिकता का निर्वाह करने में विश्वास करते हैं। भूले-भटके कोई कल्पनाशील और परिश्रमी हिन्दी अधिकारी आ जाए तो वह एक अपवाद ही होता है। इस विषय में चिंता यह देखकर और बढ़ जाती है कि सार्वजनिक उपक्रमों का धीरे-धीरे निजीकरण हो रहा है। निजी कंपनियों को अपने कारोबार से मतलब। वे राष्ट्रभाषा जैसे व्यर्थ के कामों में अपना दिमाग खपाना पसंद नहीं करते।

विश्व हिन्दी सम्मेलन या हिन्दुत्व सम्मेलन

मेरा ध्यान अभी-अभी मॉरीशस में सम्पन्न हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन पर जाता है। पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 में नागपुर में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत रुचि से आयोजित हुआ था। उसी समय महात्मा गांधी के नाम पर वर्धा में अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय स्थापित करने का फैसला लिया गया था। दूसरा सम्मेलन 1976 में मॉरीशस में ही हुआ था जिसमें मैंने भाग लिया था। तभी  यह आशंका हो गई थी कि विश्व हिन्दी सम्मेलन के नाम पर ऊंची पहुंच वाले कुछ लेखकों, पत्रकारों और हिन्दी सेवियों ने एक प्रपंच रच लिया है जिसका इस्तेमाल वे निज लाभ के लिए करेंगे। वही हुआ भी। मॉरीशस के ताजा सम्मेलन में जो कुछ हुआ उससे तो मॉरीशस के ही हिन्दी लेखक व हिन्दी प्रेमी विक्षुब्ध और हताश हैं। वैसे भी नाम के लिए यह हिन्दी सम्मेलन था, इसकी पूरी परिकल्पना हिन्दुत्व सम्मेलन की थी।

अब धार्मिक कर्मकांड की भाषा बनती जा रही है हिन्दी

दरअसल, तमाम भारतीय भाषाओं में सबसे प्रमुख हिन्दी एक दुरभिसंधि का शिकार हो गई है। हिन्दी के समूचा तंत्र पर मनुवादी सोच का कब्जा ऊपर से नीचे तक दिखाई देता है। जातीय, प्रांतीय और धार्मिक आस्थाओं ने भी हिन्दी को पुष्ट करने के बजाय दुर्बल करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। मीडिया भी कम अपराधी नहीं है। हिन्दी अखबारों से हिन्दी को लगातार खारिज किया जा रहा है। चैनलों की स्थिति भी बेहतर नहीं है और सबसे बढ़कर दोष तो हमारे उस प्रबुद्ध समाज का है जिसकी मानसिकता हिन्दी में विमर्श करने के लिए, संवाद करने के लिए, है ही नहीं। वे अंग्रेजी में भाषण देते हैं, लेख लिखते हैं, उनकी पुस्तकें उसी में छपती हैं; और वे सोचते हैं कि हिन्दी का प्रयोग करने से उनका उच्चासन छिन जाएगा। कुल मिलाकर हिन्दी अब धार्मिक कर्मकांड की भाषा बनती जा रही है। हिन्दी दिवस पर इस बारे में हम सबको सोचने की आवश्यकता है।

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( देशबन्धु )

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