जेल के अन्दर का लालू और भी खतरनाक होगा, संघी कंधों पर बहुत समय तक नहीं चल पाएंगे नीतीश

जब से लालू यादव को जेल की सजा हुई है तब से बहुत से लोगों के दिल गदगद हैं। सोचते हैं रास्ते का काँटा निकल गया, अब तो वो आराम से राजनीति करेंगे...

Vidya Bhushan Rawat
हाइलाइट्स

दो वर्ष पूर्व जब लालू और नीतीश ने समझौता किया और सरकार बनाने की नौबत आये तो लालू को सावधानी से काम करना चाहिए था। अपने पूरे खानदान को राजनीति में जबरन धकेलने और सीधे से मंत्रियो की कुर्सियों तक पहुचने में वो बहुत जल्दबाजी में दिखे। हालाँकि तेजस्वी यादव बहुत मंझे हुए राजनेता नज़र आ रहे हैं,

अगर वो लालू को अपराधी कह रहे हैं तो निःसंदेह लालू जी ने कोई न कोई अच्छा काम किया होगा

लालू प्रसाद यादव और भ्रष्टाचार का प्रश्न

विद्या भूषण रावत

जब से लालू यादव को जेल की सजा हुई है तब से बहुत से लोगों के दिल गदगद हैं। सोचते हैं रास्ते का काँटा निकल गया, अब तो वो आराम से राजनीति करेंगे, लेकिन मैं मानता हूँ कि जेल के अन्दर का लालू और भी खतरनाक होगा और बिहार में संघी कंधो पर बहुत समय तक नहीं चल पाएंगे नीतीश कुमार। जब भी भ्रष्टाचार के एक के प्रकार के मामले होते हैं, उन्हें एक साथ कर दिया जाना चाहिए ताकि कोर्ट का काम भी कम हो और लोगों का अनावश्यक हरासमेंट न हो।

लालू को राजनैतिक तौर पर ख़त्म करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई देवे गोडा ने जब वह प्रधानमंत्री थे। बिहार की अलग-अलग अदालतों में उनके खिलाफ एफ़ आई आर करने का मतलब ही यही था कि उनको मुकदमों में फंसाया जाए। हाँ, लालू को ख़त्म करने में मात्र भाजपा की ही दिलचस्पी हो, ऐसा कहना गलत होगा। बहुत से पुराने लोहिया जय प्रकाश वादी भी ऐसा ही चाहते थे। नीतीश तो ऐसा लगता है फूले नहीं समां रहे हैं और उनके जनता साथी भी तरह-तरह के बयान दे रहे हैं, जैसे भारत में लालू से खतरनाक कोई व्यक्ति नहीं आया।

केस तो बहुत लम्बा खिंचेगा और हमें ये भी मानना पड़ेगा कि राजनैतिक लोग जब पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल अपने व्यक्तिगत हितों के लिए करते हैं तो ऐसा होगा ही। लालू यादव पर जो मुकद्दमे हुए हैं, वो भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई लड़ाई नहीं है, अपितु इनके पीछे राजनैतिक महत्वकाक्षांएँ भी शामिल हैँ। हमें नहीं भूलना चाहिए कि देवेगोड़ा से ज्यादा लालू की महत्वाकांक्षा थी प्रधानमंत्री बनने की। भारतीय राजनीति में जब भी महत्वाकांक्षाओं की टकराहट हुई है तो 'दुश्मन' को समाप्त करने के लिए जो भी तौर तरीके होते हैं जो 'लोकतान्त्रिक' हैं वो इस्तेमाल करते हैं और जो सत्ता में है वो तो इसमें माहिर होता ही है।

जनता परिवार में भी जो अपने को लालू से अधिक योग्य और बड़े राज्य का मानते थे, वो भी खुश थे। मुलायम सिंह का लालू पर आरोप था उनके प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी को लालू ने गड़बड़ाया। दोनों में भी राजनैतिक समीकरण नहीं बने। लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं और अंतरविरोधों का सबसे बड़ा लाभ सवर्ण जातिवादी प्रभुत्ववादी ताकतों ने उठाया, जो लालू को समाप्त कर देना चाहते थे।

लालू कोई दोष से परे नहीं हैं, पर लालू संघ और भाजपाई राजनीति से लड़ने के लिए विपक्ष से सबसे बड़े हथियार हैं

दो वर्ष पूर्व जब लालू और नीतीश ने समझौता किया और सरकार बनाने की नौबत आये तो लालू को सावधानी से काम करना चाहिए था। अपने पूरे खानदान को राजनीति में जबरन धकेलने और सीधे से मंत्रियो की कुर्सियों तक पहुचने में वो बहुत जल्दबाजी में दिखे। हालाँकि तेजस्वी यादव बहुत मंझे हुए राजनेता नज़र आ रहे हैं, लेकिन अपनी ही पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को भी वह अच्छे पद दिलवा सकते थे। फिर एक बेटे को अगर बनाया तो सभी को तो बनाने का मतलब नहीं बनता। एक लालू कई लोगों को बना सकता है। क्या सामाजिक न्याय केवल परिवार को कुर्सी तक पहुंचाने के लिए रहेगा ?

लालू से सवर्णों की नफ़रत उनकी मुद्दों पर साफ़ पकड़ से है। लालू ने पिछड़ा वर्ग की बिहार राजनीति की शैली अपनाई जो पेरियार के पिछड़ा दर्शन के अनुसार नहीं है। उन्होंने अपने को 'अधार्मिक' या गैर हिन्दू नहीं कहा, अपितु हिन्दू धर्म पर शान से अपने अधिकार की बात की। अगर लालू धर्म से बाहर आने की पॉलिटिक्स करते तो शायद सफल नहीं होते।

पोलिटिकल डिस्कोर्स लोगों को सुधारने के लिए नहीं अपितु उनके अनुसार खुद को ढालने के लिए होते हैं। बिहार में शायद उतना रेडिकल नहीं हो सकता था जो पेरियार ने तमिलनाडु में किया।

ये भी हकीकत है कि लालू पेरियार नहीं हो सकते थे, क्योंकि पेरियार ने तो ये मान लिया था कि सामाजिक आन्दोलन ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि उसकी ताकत के दम पर तो हम बड़े-बड़े ताकतवर नेता को झुका सकते हैं और ये हकीकत भी है कि पेरियार बिना किसी सरकारी पद पर न होने के बावजूद भी तमिलनाडु का सबसे बड़ा नाम है और उनके नाम के बिना तमिलनाडु की द्रविड़ियन राजनीति नहीं चल सकती। पेरियार साफ़ कहते थे कि राजनीति में समझौते करने पड़ते हैं और अधिकांशतः ये समझौते उन लोगों के खिलाफ जाते हैं, जिनको हम चाहते है।

पेरियार ने अपनी जनता की कीमत पर कोई समझौता नहीं किया। उनके शिष्यों ने उनसे अलग होकर पार्टियाँ बनाईं और उनके उद्देश्यों के साथ ही शुरुआत की, लेकिन पिछले बीस वर्षों की द्रविड़ियन राजनीति केवल परिवार और भ्रष्टाचार का शिकार हुई। पेरियार के जीते जी ऐसा संभव नहीं था क्योंकि उनका नैतिक बल बहुत बड़ा था।

बाबा साहेब आंबेडकर के साथ भी यही स्थिति थी। कानून के बड़े जानकार होने के बावजूद भी बाबा साहेब नैतिक बल बहुत महत्वपूर्ण मानते थे और अंत में सांस्कृतिक क्रांति की ओर आये।

राजनीति ही हर सवाल का उत्तर नहीं है।

लेकिन सांस्कृतिक प्रश्नों को जय प्रकाश या लोहिया के शिष्यों ने कभी तरजीह नहीं दी। शायद इसलिए कि वो कोई सामाजिक बदलाव का आन्दोलन नहीं कर रहे थे। ज्यादातर जातियों में अपनी जमीन तलाश रहे थे।

उत्तर भारत का पिछड़ा वर्ग आन्दोलन या उसके नेता चाहे राजनैतिक तौर पर सफल रहे हों, लेकिन वो ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक सामाजिक बर्चस्व को नहीं तोड़ पाए, हालाँकि लठैती में वो ब्राह्मण-भूमिहार-ठाकुरों का मुकाबला करते दिखे, लेकिन दुर्भाग्यवश उनके दण्डों का रुख गाँव के दक्षिण की और की दलित बस्तियों की तरफ ही ज्यादा दिखा।

1990 के लालू और सन् 2000 के लालू में भी बहुत फर्क है।

1990 के लालू ने दलित पिछड़ों के बीच आत्मसम्मान बढ़ाया और न केवल ये, उन्होंने कई नए प्रयोग किये जिसके फलस्वरूप इन जातियों में गहन राजनैतिक चेतना आई।

ऐसा भी माना जाता है कि बिहार की सशक्त ब्राह्मण-भूमिहार-कायस्थ लॉबी, जिसने प्रगतिशीलता का चोला ओढ़कर बिहार की सरकारी सेवाओं में घोर बिरादरीवाद किया, उनके एकाधिकार को लालू ने ही चुनौती दी। हालाँकि लालू शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नहीं कर पाए या यूँ मान लीजिये वो उनका अजेंडा ही नहीं था।

केवल जुमलों की राजनीति से आगे आने की जरुरत भी थी लालू को

मुसहर बस्तियों में लालू के प्रयोग, उनका चरवाहा विद्यालय आदि काफी कामयाब रहे, लेकिन लालू को केवल जुमलों की राजनीति से आगे आने की जरुरत भी थी।

 

बहुजन समाज के नेताओं ने अपने आपको जानबूझकर बुद्धिजीवियों और सामाजिक आन्दोलनों से दूर रखा। कुछ तो उनको गरियाते हैं। आज बाबा साहेब आंबेडकर,  ज्योति बा फुले या पेरियार के आन्दोलन क्यों जिन्दा हैं ? अगर वो लिखते नहीं और अपना मीडिया खड़ा नहीं करते तो क्या आज जिन्दा रहते ? 1990 तक कोई भी हिन्दू उनके बारे में लिखने को तैयार नहीं था। आज ये लोग जिन्दा हैं अपने लेखन और सांस्कृतिक क्रांति की बदौलत क्योंकि उन्होंने काम करने वाले जिन्दा दिल लोगों को तैयार किया, भक्त तैयार नहीं किये। क्योंकि उन्होंने सामाजिक क्रांति का बीज बोया और वैचारिक धार दी। सबने खूब लिखा और और सभी अपने आप में लेखक और पत्रकार भी थे।

भक्तों की फौज तैयार करके हम बहुत नुक्सान करते हैं। भक्त भी तभी तक भक्त रहता है जब तक उसका हित होता है या माल मिलने की उम्मीद बनी रहती है नहीं तो वो दुश्मन भी पहले बन जाता है। आज यदि भाजपा है तो वो संघ की बदौलत है। मोदी तो आयेंगे और जायेंगे, लेकिन संघ तो खड़ा है चाहे उनसे हमारे विचार न मिले लेकिन वो तो अपना काम कर ही रहे हैं

लालू से सवर्णों की नफ़रत उनके आत्मविश्वास के कारण हुई है, क्योंकि लालू खुद का दिमाग रखते हैं और अधिकारियों को समय समय पर उन्होंने खूब 'जलील' भी किया।

उनका भूरा बाल या अन्य जातीय प्रश्नों पर ठेठ बिहारी लहजे में बात करके भी अधिकारी परेशान थे। जातीय अहंकार में डूबे ये अधिकारी दलित बस्तियों में कभी जाना भी नहीं चाहते। आज भी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार के सवर्ण अधिकारी दलितों को जानबूझकर हरिजन शब्द से बुलाते हैं।

हमारे गाँवों के अलावा, हमारे मीडिया, ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका में भी है मनुवाद

बिहार में जब लालू ने अधिकारियों को मुसहर बस्तियों में जाकर शैम्पू और बाल कटाने और सफाई करवाने के लिए भेजा तो अधिकांश नहीं चाहते थे। भारत का मनुवाद हमारे गाँवों के अलावा, हमारे मीडिया, ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका में भी है।

लालू के कई प्रयोगों से अधिकारी परेशान थे। उनकी बिरादरी के दबंगों ने भी लालू की इमेज को ख़राब किया। उनके दो सालों के कारण भी वो बदनाम हुए। इसीलिये मैंने कहा कि सत्ता में आने पर दलित बहुजन नेताओं को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि परिवार के जरिये ही नेता भ्रष्ट होता है। इस सन्दर्भ में सबसे बेहतरीन उदाहरण मान्यवर कांशीराम साहेब है। मै ये समझता हूँ, कि उन्होंने स्वयं को अपने परिवार से बिलकुल दूर कर समाज के लिए पूर्णतः समर्पित कर दिया और कभी भी परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में लाने का प्रयास नहीं किया। नतीजा ये निकला कि कोई भी उन पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगा सकता।

जहां तक पार्टी के लिए धन इकठ्ठा करने की बात है तो वो हरेक करता है और वो पार्टी का पैसा था न कि उनका व्यक्तिगत।

कहने का आशय यह कि जब तक आज के दौर के नेता अपने परिवारों को अधिक से अधिक राजनीति से दूर नहीं रखेंगे उनके लिए खतरे बने रहेंगे। आज मीडिया, सोशल मीडिया के जरिये लोग अपनी बात रख रहे हैं और किसी को ये गलत फहमी में नहीं रहना चाहिए कि वे नहीं रहेंगे तो लोगों का क्या होगा। लोग आयेंगे और खड़े भी होंगे और आप से बेहतर भी आ सकते हैं।

लालू यादव के बारे में सी बी आई कोर्ट की टिप्पणियों के बारे में मैं यही कहूँगा कि भारत के प्रभुत्ववादी समाज और उनके चहेते मनुवादी मीडिया ने पहले से ही लालू को अपराधी घोषित कर दिया है, इसलिए उनकी टिप्पणियों का क्या कहें। अगर वो लालू को अपराधी कह रहे है तो निःसंदेह लालू जी ने कोई न कोई अच्छा काम किया होगा जिसके लिए इतनी गालियां खा रहे हैं।

लालू यादव की सबसे बड़ी ताकत है उनकी वैचारिक साफगोई और पक्की जुबान। उन्होंने जमीनी राजनीति की है इसलिए उनको बिहार का समाज शास्त्र पता है और शायद किसी बड़े समाज शास्त्री से ज्यादा, लेकिन जरूरत अपनी जातियों से बाहर निकलकर और परिवर्तनकारी समाज बनाने में। दलित बहुजन नेताओं को भी अपने थिंक टैंक बनाने होंगे और उनको समर्थन करना होगा जो लोग दिन रात सरकार और देश दुनिया की नीतियों का अध्ययन करते रहे और इन नेताओं को समय-समय पर बताते रहे और नयी पौधों का मार्ग दर्शन करें।

वो जमाना गया कि जब नेता लोग पढ़ने-लिखने का मजाक उड़ाते थे। अब का दौर सूचनातंत्र का दौर है और इसमें अगर हमारे पास सोचने समझने वाले लोग नहीं होंगे तो चाहे हमें राजनैतिक सत्ता मिल भी जाएगी, तो उसके बहुत मतलब नहीं होंगे यदि आपको दो चार लोग अच्छे मार्गदर्शन वाले न मिलें।

लालू यादव ने क्या किया क्या नहीं किया वो तो अब कोर्ट में लम्बी लड़ाई का मामला है लेकिन उनको फंसाया गया है और इतने सारे मुकदमों में फंसाकर उनके राजनीतिक करियर को ख़त्म करने का प्रयास है। हम उम्मीद करते हैं कांग्रेस और अन्य सहयोगी पार्टियां लालू यादव के साथ में रहेंगी क्योंकि अगर भ्रष्टाचार से लड़ने की बात होगी तो पहले जो पार्टी अरबों खरबों का खर्चा कर रही है, जो बाबाओं और लालाओं की मोनोपोली और पूंजी के सहारे बेइंतहा पैसा खर्चा कर रही है, वो तो कुछ बताये कि पैसा कहाँ से आया।

वैसे ईमानदार जग्गंनाथ मिश्र छूट ही गए हैं और दूसरे बड़े लोग उनके भ्रष्टाचार के बारे में बोलने पर मुकदमा करने की धमकी दे रहे हैं, इसलिए भ्रष्ट केवल वो रह गए हैं जिन पर सीबीआई मुकदमा कर रही है, बाकि सभी तो 'ईमानदार' हैं।

लालू यादव की लगातार परेशानी राजनैतिक है। ये बात सही है यदि लालू कांग्रेस के साथ नहीं खड़े होते और भाजपा के पास चले जाते तो वो ईमानदार होते। ईमानदारी का सर्टिफिकेट आजकल सरकार के पास है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई कभी भी अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंचेगी जब तक उसमे बौद्धिक और वैचारिक ईमानदारी नहीं होगी और वो राजनैतिक रोटियां सेंकने का यंत्र न बन जाए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध सही लड़ाई के लिए एक नए तंत्र की जरूरत है और उसमें सभी राजनैतिक दलों और देश के नागरिक और मानवाधिकार संगठनों की भी भूमिका है। दलाली पर पलने वाला, देश में राष्ट्रवाद का एकमात्र ठेकेदार मीडिया भी अपने गिरेबान में झांके कि उनकी दुकानें कैसे चल रही हैं और वो इतना क्यों भौंक रहे हैं।

लालू एक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं, एक पार्टी के बड़े नेता हैं, केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं और उनकी उम्र भी है। मैं समझता हूँ कि न्यायपालिका के लोगों को भी कोई कमेंट करने से पहले सोचना पड़ेगा कि उनके वक्तव्यों के क्या मायने हैं। देश की अधिसंख्य जेलों में आज भी दलित आदिवासी और मुसलमानों की संख्या है और इन्हीं तबको की सूचना, तंत्र, प्रशासन और न्यायपालिका में भागीदारी बिलकुल नगण्य है। क्या दलित पिछड़े आदिवासी मुसलमानों के प्रति नकारात्मक रवैये में उनकी नगण्य भागदारी होना कोई कारण नहीं है ? क्या जाति हमारे प्रशासन और न्याय को प्रभावित नहीं करते ? यदि नहीं तो आज तक बिहार में हुए इतने हत्याकांडो में जिनमें बड़ी-बड़ी माफिया सेनाओं के नेताओं की बड़ी भूमिका रही है, अभी तक कितने लोगों को सजा हुई है ? क्या ये शर्मनाक नहीं है ? क्या लक्ष्मनपुर बाथे या शंकर बिगहा के हत्याकांड के आरोपित लोगों को छोड़ने पर लोगों में ये धारणा मज़बूत नहीं हुई कि न्याय भी जातिवादी है ?

फिलहाल ये एक सन्देश भी है बहुत से नेताओं के लिए कि 2019 से पहले कोई गठबंधन मत करना नहीं तो आपको ईमानदारी की परीक्षा देनी पड सकती है। लालू यादव तो उस परीक्षा को दे ही रहे हैं, लेकिन औरों का भी नंबर आ सकता है। हम समझते हैं कि ऐसी धमकियों से राजनैतिक लोगों को नहीं घबराना चाहिए अपितु उन्हें और मजबूती से एक साथ खड़ा होना चाहिए ताकि जन विरोधी शक्तियों को परास्त किया जा सके।

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