आपातकाल को कोसने वाले लोकनायक के संगठन पीयूसीएल से जुड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को नक्सली बता रहे

ये अद्भुत लोग होते हैं, जो वरिष्ठ अर्थशास्त्री अशोक मित्रा के शब्दों में “सरकारी तंत्र में शीर्ष पर बैठने के बजाय मनुष्यों में तेजी से बढ़ती असमानता के खिलाफ अपने विवेक से बोलते हैं, जो मानव मस्तिष्क ...

अतिथि लेखक
आपातकाल को कोसने वाले लोकनायक के संगठन पीयूसीएल से जुड़े मानवाधार कार्यकर्ताओं को नक्सली बता रहे

भारत के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सुरक्षा जरूरी

पुष्कर राज

भारत में आज बेहद व्यथित करने वाली राजनीतिक सच्चाई यह है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को शिकार बनाया जाता है, फंसाया जाता है और उन्हें राजनीतिक बंदी के तौर पर वर्षों जेल में सड़ना पड़ता है।

वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर दिल्ली में उस समय हमला किया गया, जब वह हाल ही में दिवंगत हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने जा रहे थे। बंधुआ मजदूरी के खिलाफ अभियान छेड़ने वाले अग्निवेश के साथ इससे पहले 18 जुलाई को झारखंड के पाकुड़ में भी मारपीट की गई थी, जब वह नागरिक समाज की एक बैठक में हिस्सा लेने गए थे।

सरकार के एक करीबी टीवी चैनल ने 4 जुलाई को दावा किया कि उसके पास एक पत्र है, जिससे साबित होता है कि (1975 में घोषित आपातकाल के विरुद्ध लड़ने के लिए जयप्रकाश नारायण द्वारा स्थापित) पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की राष्ट्रीय सचिव सुधा भारद्वाज कश्मीरी अलगाववादियों के संपर्क में हैं और इससे पता चलता है कि वह राष्ट्रविरोधी हैं।

जून में कई राज्यों में चलाए गए एक अभियान में पुलिस ने देश के विभिन्न हिस्सों से पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बेवक्त गिरफ्तार कर लिया। उनमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के युवा स्नातक और गढ़चिरौली में लोगों को खनन के खिलाफ एकजुट करने वाले महेश राउत; मृत्युदंड के खिलाफ बोलने वाली और राजनीतिक बंदियों की रिहाई का समर्थन करने वाली रोना विल्सन; डॉ. साई बाबा जैसे राजनीतिक बंदियों के मुकदमे लड़ने वाले वकील सुरेंद्र गाडगिल; युद्धग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के साथ बढ़ती यौन हिंसा के खिलाफ बोलने वाली शोमा सेन और रोजमर्रा के जीवन में जाति एवं सांप्रदायिकता के प्रभावों से लड़ने के लिए विचार हेतु गठित  250 से अधिक दलित एवं अल्पसंख्यक संगठनों के जुटान एल्गार परिषद के संयोजक सुधीर धवले शामिल थे।

सभी कार्यकर्ताओं को देशद्रोह के कानूनों तथा गैर-कानूनी गतिविधि निवारक अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया है। आरोप लगाया गया है के वे राष्ट्रहित के विरुद्ध काम कर रहे थे और गैरकानूनी तथा अशांति फैलाने वाली गतिविधियों में लिप्त थे।

लेकिन कार्यकर्ताओं के खिलाफ मुकदमे विश्वास के लायक नहीं हैं। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप प्राप्त कर चुके महेश राउत ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम) अथवा पेसा को लागू करने की मांग की, जो गढ़चिरौली जैसे आदिवासियों के निवास क्षेत्रों में खनन पर रोक लगाता है। उन्होंने इलाके के लोगों को संगठित किया, जिन्होंने अपने जीवन तथा आजीविका पर खनन के प्रभाव पर रोष व्यक्त किया।

इसी प्रकार एल्गार परिषद के कार्यकर्ता सुधीर धवले को एक सभा आयोजित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उस सभा में भारत के 30 करोड़ दलितों तथा 26 करोड़ अन्य अल्पसंख्यकों के साथ जाति एवं संप्रदाय के नाम पर रोजमर्रा के जीवन में हो रहे अन्यायों का मुकाबला करने की रणनीतियों पर चर्चा की गई थी।

औसतन हर तीसरे दिन कोई न कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता सरकार के सत्ता दुरुपयोग का शिकार बन जाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार इस वर्ष अप्रैल और जून के बीच ऐसे 30 मामले दर्ज किए गए। इनमें कानूनी कार्रवाई करने में नाकामी तथा गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लेना, झूठे मामले में फंसाना तथा गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार करना जैसे सत्ता का दुरुपयोग शामिल है।

ये लोग चंद्रशेखर आजाद रावण जैसे उन 2,93,000 विचाराधीन कैदियों में शामिल हैं, जिनकी संख्या भारत के कुल बंदियों की 67.2 प्रतिशत है तथा जो खचाखच भरी जेलों में छह महीने से पांच साल तक गुजारते हैं। यह फ्रांज काफ्का के उपन्यास ‘द ट्रायल’ में जोसेफ के कड़वे अनुभवों की याद दिलाता है।

क्या होते हैं मानवाधिकार कार्यकर्ता

मानवाधिकार कार्यकर्ता अपने साथ के पीड़ित मनुष्यों की वेदना महसूस करता है और खुद को बड़े खतरे में डालकर उन्हें बचाने पहुंचता है। ये कार्यकर्ता युद्ध और शांति दोनों में साहस दिखाते हैं। ये अद्भुत लोग होते हैं, जो वरिष्ठ अर्थशास्त्री अशोक मित्रा के शब्दों में “सरकारी तंत्र में शीर्ष पर बैठने के बजाय मनुष्यों में तेजी से बढ़ती असमानता के खिलाफ अपने विवेक से बोलते हैं, जो मानव मस्तिष्क का अभिन्न अंग है।” उनका योगदान सैनिक, सेनापति या प्रधानमंत्री से कम नहीं होता।

समाज में शक्ति के विषम वितरण के कारण मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की समाज में अपरिहार्य भूमिका होती है, चाहे समाज नियमों के अनुसार चलता हो या स्वच्छंद हो। यह समाज परोपकारिता से अधिक डार्विन के सिद्धांत पर चलता है, जिसे रिचर्ड डॉकिंस ने अपनी पुस्तक ‘द सेल्फिश जीन’ में विस्तार से समझाया है।

किसी भी समाज और देश में मानवाधिकार कार्यकर्ता के प्रति विद्वेष की सीमा से पता चलता है कि समाज में कितना अन्याय है और सरकार का कितना आतंक है। इस समय ताकतवार सरकार के खिलाफ मानवाधिकार कार्यकर्ता अकेले हैं और उन्हें केवल नागरिक समाजतंत्र का सहारा है, जो देश भर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हो रहे अत्याचारों के बारे में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सतर्क करता है। लेकिन मानवाधिकार आयोग की अपनी सीमाएं हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मित्र और परिजन ही उनकी कमी महसूस करते हैं, उनके लिए शोक मनाते हैं या लड़ते हैं। लेकिन यह पहाड़ के खिलाफ राई की लड़ाई जैसी कष्टदायक है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के परिवारों तथा मित्रों को जिस तरह रोजाना अदालतों में जूझना पड़ता है, उसे देखते हुए नागरिक समाज का कर्तव्य है कि वह क्षेत्र और विचारधारा से ऊपर उठे तथा उपयुक्त लोगों की मदद के लिए मानवाधिकार रक्षा कोष गठित करे।

संयुक्त राष्ट्र का सदस्य होने के नाते अपनी अंतरराष्ट्रीय बाध्यताओं के कारण सरकार को भी मानवाधिकार रक्षकों के सार्वभौमिक घोषणापत्र पर अमल करना होगा और “मानवाधिकार रक्षकों की सुरक्षा की गारंटी देने वाले कानून एवं नीतियां” स्वीकार करनी होंगी।

मानवाधिकार रक्षकों को जेल में डालकर कोई भी समाज न तो मुक्त रह सकता है और न ही लोकतांत्रिक हो सकता है। उसके बजाय वह समाज 399 ईसा पूर्व में सुकरात को मौत देने वाले समाज जैसा ही हो सकता है।

(पुष्कर राज मेलबर्न में शोधकर्ता और लेखक हैं। पहले वह दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ाते थे और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव हैं।)

(‘एशिया टाइम्स’ में प्रकाशित लेख का लेखक की अनुमति से हिंदी अनुवाद। अनुवादक: जयंत कुमार कश्यप)

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