श्रीदेवी के मरने के बाद भारतीय टीवी मीडिया बाथटब के चुल्लु भर पानी में डूब गया

आप भले सेलिब्रिटी हो न हो लेकिन किसी भी मौत को रिपोर्ट करने के लिये एक बेसिक शिष्टाचार और संवेदनशीलता को दिखाना होता है। ...

अतिथि लेखक

बाथटब में डूबने को आतुर भारतीय मीडिया

अविनाश कुमार चंचल

यह आरोप लगता रहा है कि भारतीय मीडिया की संवदेनशीलता काफी पहले मर चुकी है, वह क्रूर हो चुका है। समय-समय पर यह आरोप जगजाहिर भी होता ही रहता है। अभी हाल ही में श्रीदेवी के मरने की खबर के बाद जिस तरह टीवी मीडिया ने रिपोर्टिंग की है, उससे एक बार फिर पूरी दुनिया में भारतीय टीवी मीडिया की जगहंसाई हुई है और उसके कुरूप होने का आरोप सच साबित हुआ है।

श्रीदेवी मामले को रिपोर्ट करते-करते टीवी वालों ने अपनी कल्पनाशीलता को खुली छूट दे दी। उन्होंने नये तरीके से फिक्शन रचे, झूठी रिपोर्टिंग की और सबसे ज्यादा किसी के मरने के उपर टीआरपी बटोरने की कोशिश हुई। किसी के मरने की खबर की रिपोर्टिंग पहले भी होती आयी है, लेकिन ऐसे मामले में उम्मीद की जाती है कि थोड़ी संवेदनशीलता और शिष्टाचार का पालन किया जायेगा, मरने वाले और उसके परिवार के प्रति सहानुभूति जतायी जायेगी। लेकिन सहानुभूति तो दूर की बात है उल्टे मीडिया ने मोरल पुलिसिंग, स्टोरीटाइपिंग के जरिये पीड़ित के चरित्र पर ही सवाल उठाने और उसकी छवि को नुकसान पहुंचाने का काम करने लगी।

टीवी मीडिया ने एक अलग तरह की ही ग्राफिक जर्नलिज्म का परिचय दिया। टीवी वालों ने अपने स्टूडियो को बाथटब बना दिया, कुछ ने तो उस बाथटब में श्रीदेवी को डूबाते हुए तक दिखाया, कई ने मौत को कहानी बनाकर पूरा सीन क्रियेट करके दिखाया। किसी ने मौत का बाथटब नाम से खबर चलायी तो किसी ने श्रीदेवी के शराब पीने पर सवाल उठाया, तो किसी ने उनके शराब पीने के ब्रांड पर अपनी खोजी पत्रकारिता का परिचय दिया। कुछ बड़े चैनलों का प्राइमटाइम इस बात पर केन्द्रित था कि श्रीदेवी ने उस दिन वाइन पीया था या वोदका। एक चैनल ने बाथटब के बगल में वाइन की बोतल रख कर रिपोर्टिंग की तो दूसरे ने बाथटब के पास बोनी कपूर को खड़ा कर दिया। किसी ने श्रीदेवी को अवसाद से ग्रसित बताया तो किसी ने उनके परिवारिक कलह को मौत की वजह बताया।

इन सब कार्यक्रमों में एक बात कॉमन था और वह यह कि सारे ऐसे कवरेज को खूब सारे टीआरपी मिले। इन कार्यक्रमों में शामिल होने वाले लोगों को देखिये, जो पैनलिस्ट बनकर, एक्सपर्ट बनकर आये थे। ये लोग आम लोग नहीं थे बल्कि खास वर्ग के लोग थे, उनमें वकील थे, डॉक्टर थे, पत्रकार थे। ये लोग जनमत को प्रभावित करने वाले लोग थे और एक ऐसे कार्यक्रम में बोलने आये थे, जिसके बारे में उन्हें कोई खबर नहीं थी। वह खबरिया चैनलों के काल्पनिक कहानी पर अपनी एक्सपर्ट कमेंट दे रहे थे। यह डराने वाली बात है क्योंकि ऐसे लोग जो जनमत को प्रभावित करने वाले वर्ग से आते हैं, वे अगर गैरजिम्मेदाराना तरीके से फिक्शन पर कमेंट लगेंगे तो हम कैसा जनमत बनायेंगे? यह सोचने की बात है।

इस मीडिया कवरेज के विरोध में सोशल मीडिया पर “Let her rest in peace और न्यूज की मौत नाम से हैशटैग चलाया गया। कई बॉलीवुड स्टार और आम लोगों ने मीडिया की इस रिपोर्टिंग पर दुख जताया। लोगों ने खबरीया चैनलों के खत्म होने की घोषणा की। जाहिर सी बात है कि आप भले सेलिब्रिटी हो न हो लेकिन किसी भी मौत को रिपोर्ट करने के लिये एक बेसिक शिष्टाचार और संवेदनशीलता को दिखाना होता है। लेकिन खबरिया चैनलों ने हमेशा की तरह एक बार फिर टीआरपी के लिये अपनी नासमझी को दिखाया है।

जब श्रीदेवी की मौत को टीआरपी बनाकर बेचने की तैयारी हो रही थी तभी मुजफ्फरपुर से खबर आयी कि 9 बच्चों को एक भाजपा नेता ने शराब पीकर कुचल दिया, लेकिन उसपर कोई मीडिया आउटरेज नहीं दिखा, न ही उन बच्चों की माँओं से मिलने वहां कोई टीवी कैमरा पहुंचा, न ही किसी तरह की स्टूडियो में ग्राफिक बनाये गए। वह खबर आज भी लगभग दबी है। यह पूछने वाला कोई खोजी पत्रकार नहीं है कि आखिर शराबबंदी के दौर में बिहार में शराब कहां से आया, कहां से बीजेपी के उस नेता को भागने का मौका मिला?

दुबई से जांच क्लियर होने के बाद श्रीदेवी की लाश को मुंबई लाया गया। वे पंचतत्व में विलीन हो गयीं। मीडिया का सनकीपन भी थोड़ा कम हो गया। लेकिन आज से काफी सालों बाद जब मीडिया के इस दौर के इतिहास को पलट कर देखा जायेगा तो याद किया जायेगा कि श्रीदेवी के मरने के बाद भारतीय टीवी मीडिया एकबार बाथटब के चुल्लु भर पानी में डूब गया था।

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