प्रेम करना हमारे समाज में अपराध, प्रेम के अभाव में समाज हिंसक बन चुका है

धर्म के धंधेबाजों को इस बात का पता है कि प्रेम की ताकत के अच्छे से अच्छे तानाशाह और राजा महाराजा भी हार गए। प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश...

Vidya Bhushan Rawat
हाइलाइट्स

प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

धर्म के धंधेबाजों को इस बात का पता है कि प्रेम की ताकत के अच्छे से अच्छे तानाशाह और राजा महाराजा भी हार गए।

जातियों के जाल में जकड़ा देश कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा और केवल घृणा और नफ़रत के ब्यापारियो के नियंत्रण में रहेगा।

विद्या भूषण रावत

कल अंकित सक्सेना के पिता को टी वी पर देखा, जहां एंकर महाशय उनको प्रणाम कर रहे थे लेकिन गुस्सा हो गए कि केजरीवाल ने मुसलमानों को तो मौत पर अधिक पैसा दिया और हिन्दुओं को नहीं। सर्व प्रथम बात ये कि अंकित को मार डाला गया और ये एक अपराध है और कानून के अनुसार अपराधियों के साथ जो होना चाहिए वो होना चाहिए। पुलिस ईमानदारी से काम करे और चार्ज शीट दाखिल करे ताकि न्याय हो सके।

अंकित सक्सेना की मौत पर साप्रदायिक राजनीति की कोशिशें हो रही हैं और एंगल निकालने की कोशिशें भी जारी हैं,जो अभी तक नहीं मिल पाया है लेकिन बना दिया जाएगा क्योंकि चैनल इसीलिए हैं कि अगर सांप्रदायीकरण का मटेरियल नहीं मिल रहा तो उसे तैयार कर दिया जाना चाहिए।

कुछ दिनों पूर्व मुझसे पूछा गया गया था कि अंकित सक्सेना के पिता ने बहुत संयम से काम लिया है और उसकी सराहना की जानी चाहिए। मैं तो ये कहता हूँ कि ऐसे मौके पर मीडिया को माँ बाप के मुंह में माइक लगाने के बजाये निष्पक्ष रिपोर्टिंग करनी चाहिए। हमें ये पता होना चाहिए कि जिस किसी के घर में कोई असामयिक मौत होगी तो उसके घर वाले बहुत बिरले ही होंगे जो इमोशनल न हों और इन हालात में वे अगर कुछ कह भी दें तो बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

अंतरजातीय या अंतर्धार्मिक रिश्तों में बहुत आवश्यक है कि कुछ बातें समझी जाएं। हम इन्हें लोकतान्त्रिक रिश्ते भी कह सकते हैं और ये तभी कामयाब हो पाएंगे जब हम एक दूसरे के ऊपर अपनी धार्मिक और भाषाई श्रेष्ठता न लादें। ये रिश्ते इसलिए मज़बूत होते हैं क्योंकि आप धर्म और जाति की सीमाओं को लांघकर इसे बनाते हैं, इसलिए आप ये नए विचार की नींव रख रहे हैं जो संगठित धर्मो और जातियों से निकलकर बनता है जहां इंसान की श्रेष्ठता होती है, उसकी आज़ादी का सम्मान है और थोड़ी जगह विचारभिन्नता के लिए भी बची रहती है। कोई भी प्रेम सम्बन्ध तब तक नहीं चल सकता जब तक उसमें स्वतंत्रता की गुंजाइश न हो और कोई भी सम्बन्ध अनंत काल तक चलता रहे इसकी सम्भावना भी नहीं होती इसलिए संबंधों के बनने और बिगड़ने में जो कड़वाहट आती है उसका कारण यही है कि हम कहीं लुटा हुआ महसूस करते हैं। कोई कहता है प्यार में डूब जाना चाहिए, लेकिन मुझे लगता है किसी को डूबने की जरुरत नहीं। अपने होश हवाश में रहिये और एक दूसरे की स्वयत्तता का सम्मान करेंगे तो अलग होने में कोई कड़वाहट नहीं होगी।

जो लोग इसे लव् जिहाद का नाम दे रहे हैं वही लोग खाप पंचायतों के जातिगत फैसलों को संस्कृति और परंपरा के नाम पर सही ठहराते हैं। हकीकत ये है कि प्रेम करना हमारे समाज में अपराध है और इसलिए प्रेम के अभाव में हमारा समाज हिंसक बन चुका है। ये हिंसा क्रूरता और बर्बरता में बदल चुकी है क्योंकि ये प्यार नहीं, ये प्यार में औरत को एक वस्तु समझ रहा है और जिस समाज की महिला प्यार में दूसरी ओर जाती है वह अपने को लुटा हुआ महसूस करता है। इसलिए अंकित के प्यार में उसकी प्रेमिका के माँ बाप की उनकी इज्जत खतरे में दिखाई दी। हम सब जानते हैं कि प्रेम विवाह कितने मुश्किल हैं खासकर जब लड़का और लड़की दोनों का आर्थिक रुतबा बहुत बड़ा नहीं होता और वे दो स्वतंत्र व्यक्ति नहीं बन पाते और उनको अपने परिवार की मदद की लगातार जरुरत होती है। दो सफल व्यक्ति अपने समाज से दूर रहकर अपने रास्ते पर चल सकते हैं लेकिन जहाँ व्यक्ति समाज के रीति रिवाजों के अनुसार चलेंगे तो वे तो प्यार के रास्ते में रोड़ा अटकाएंगे ही।

भारत में शादी की पवित्रता का सिद्धांत जाति से जुड़ा हुआ है और प्रेम विवाह जाति की सर्वोच्चता और शुद्धता के सिद्धांतो में सबसे बड़ी बाधा है। जैसे-जैसे लोग जाति धर्म के बन्धनों से ऊपर उठकर निकलेंगे तो इनके नाम पर चलने वाली घृणा और नफ़रत की दुकानों के बंद होने की संभावनाएं भी बढ़ जाएँगी। देश के युवा की उर्जा समाज निर्माण में लगनी चाहिए न कि जाति धर्म की अँधेरी दीवारों को मज़बूत करने में। शायद धर्म के धंधेबाजों को इस बात का पता है कि प्रेम की ताकत के अच्छे से अच्छे तानाशाह और राजा महाराजा भी हार गए।

अंकित के दोस्तों ने एक विडियो बनाया और कहा के प्रेम किसी से भी हो सकता है। प्रेम कोई योजना बनाकर नहीं होता। योजना से तो दंगे करवाए जाते हैं या किसी की जासूसी करवाई जाति है और प्रेमी जोड़ो का क़त्ल और वो सब वो लोग करते हैं जिनकी जिंदगी से प्रेम गायब है। जिनकी जिंदगी में प्रेम है वो तो बस प्रेम की गंगा बहाते रहेंगे।

अंकित की दोस्त शह्जादी ने लगातार ये बात कही कि उसके माँ बाप गुनाहगार हैं। प्यार करने वालों को मजबूती से अपने विचारों पर खड़ा होना होगा क्योंकि प्यार भी एक विचारधारा है वैसे ही जैसे घृणा और नफरत भी एक नकारात्मक विचार है जो जातीय और धार्मिक सर्वोच्चता के अहंकार से पनपती है। इसलिए प्यार के विचार की जीत के लिए हमें कौशल्या जैसी प्रेमिकाओं की और देखना होगा जिसने जातिगत अहंकार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखी है और अपने पति शंकर के हत्यारों को जेल के सींखचों तक पंहुचाने के लिए अपने जद्दोजहद जारी रखी है।

कौशल्या का मामला भी भी अंकित जैसा है वो तथाकथित ऊँची जाति से आती थी जिसका शंकर से प्रेम हो गया, जो दलित था और ये बात कौशल्या के माँ बाप को पसंद नहीं थी और एक दिन कोयम्बतूर के बिजी चौराहे में शंकर की बेरहमी से हत्या कर दी गयी, बिलकुल उसी तरह जैसे हम अंकित की हत्या देख रहे हैं। सड़क चलते लोग अपने काम में लगे रहे, कोई विडियो बनाता रहा और कोई चुप देखता रहा लेकिन भीड़ निर्दोष को बचा नहीं पायी। शहजादी को कौशल्या से सीखना होगा और हत्यारों को जेल तक पहुंचाना होगा, अपने लिए न्याय की लड़ाई लड़नी होगी और घृणा फ़ैलाने वाली मानसिकता से लड़ना होगा।

भारत के भविष्य के लिए जरुरी है कि जातियों का समूल विनाश हो क्योंकि ये देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है। ये जातीय फर्जी गौरवों के सिद्धांत पर चल रही है। अभी इलाहाबाद में दलित छात्र दिलीप सरोज की नृशंश हत्या केवल इसलिए कर दी गयी कि उसका पैर किसी दबंग सवर्ण से टकरा गया।

जाति के आधार पर भारत में विभाजन साफ़ दिखाई दे रहा है और पचासों उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर या बड़ी बड़ी फौजें बनाकर और हथियार बेचकर भी देश कभी मज़बूत नहीं बन सकता, जब तक जाति के किले बचे रहेंगे।

रोहित वेमुला से लेकर दिलीप सरोज तक सैंकड़ों छात्रों और युवाओं की बलि चढ़ चुकी है, केवल इसलिए क्योंकि आपको अपनी जातीय सर्वोच्चता बनाये रखनी है। देश के बहुजन समाज को अशक्त करके कभी देश आगे नहीं बढ़ सकता। हिंसा हमारे समाज का एक नया नॉर्म बन चुकी है जो किसी भी समाज को मंदबुद्धि बनाएगी और हिंसा का प्रतिकार केवल हिंसा से करने को उत्प्रेरित करेगी।

आज देश के युवाओं को देखना है कि वे प्रेम की दुनिया को आगे बढ़ाना चाहते है या जातियों के दमघोंटू ढांचे में कैद रहना चाहेंगे। प्रेम में बहुत बड़ी ताकत है उन सारे पूर्वाग्रहों को तोड़ने की जिन्हें जाति की ढांचों ने बनाये है। आजदी के 70 वर्षो के बाद भी आज हम उन्ही पुराथान्पंथी जकड़न में फंसे हैं, तो कहीं न कहीं विचारात्मक द्वन्द्व है।

जाति के नाम पर दुकान चलाने वालो और अपना प्रभुत्व बनाये रखने वालों की साजिश को केवल युवा तभी तोड़ पायेंगे जब विवाह जैसी संस्था का लोकतान्त्रीकरण हो और वो तभी संभव होगा जब चाहत पर किसी का पहरा न हो।

जिस दिन भारत में समाज का लोकतांत्रीकरण हो गया जैसा बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे, उसी दिन भारत दुनिया का सबसे मज़बूत लोकतंत्र होगा और सबसे बड़ा देश भी।

समाज में लोकतंत्र के अभाव में हम अपनी ही औलादों को इज्जत के नाम पर मारते रहेंगे और तमाशा देखते रहेंगे। अभी भी समय है, चेतने का, समाज के नव निर्माण का और देश को बचाने का। जातियों के जाल में जकड़ा देश कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा और केवल घृणा और नफ़रत के ब्यापारियो के नियंत्रण में रहेगा। जातियों का उन्मूलन तभी हो पायेगा जब हमारे युवाओं को अपना साथी चुनने की स्वतंत्रता होगी नहीं तो उदंडता और जबरदस्ती ही हमारे समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखेंगे और कानून का पालन करने वाले केवल देखते रहेंगे क्योंकि संविधान केवल बहस करने का एक दस्तावेज होगा, हमारे जीवन मूल्यों को निर्धारित करने का नहीं। ये अंतर्द्वंद अंततः उन ताकतों को मज़बूत बना रहा है जो चाहते ही नहीं कि समाज लोकतान्त्रिक हो क्योंकि इस प्रक्रिया में उनके बहुत से जातीय विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे लेकिन बदले में सबको जो मिलेगा वो अप्रतिम होगा, एक लोकतान्त्रिक समाज ही देश को मज़बूत और एकजुट रख पायेगा जिसके लिए हमें बड़ी तोपों और टैंकों की जरुरत नहीं होगी।

Love is a crime in our society, society has become violent because of lack of love

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