नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है

एक स्थायी नियति है जन्मस्थान से पलायन

जगदीश्वर चतुर्वेदी
Updated on : 2018-07-14 11:32:14

नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है

मथुरा के मायने

जगदीश्वर चतुर्वेदी

आपकी दशा मैं नहीं जानता, लेकिन अपनी तकलीफ का एहसास मुझे है और यह एहसास ही मुझे बार-बार मथुरा की ओर खींचता है। आमतौर पर शिक्षा के बाद आदत है कि जहां पैदा हुए, पले-बढ़े, वहां पर नौकरी करना नहीं चाहते, बाहर जाना चाहते हैं। लेकिन मेरा मन हमेशा इस बात से परेशान रहा कि मुझे मथुरा में उपयुक्त काम ही नहीं मिला वरना मैं जेएनयू से पढ़कर मथुरा लौट आता।

एक स्थायी नियति है जन्मस्थान से पलायन

मुझसे पूछें तो यही कहूँगा नौकरी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है। नौकरी की तलाश में जब शहर छूटता है तो आपसे बहुत कुछ छूट जाता है। अपने लोग, परिवेश, भाषा, चिर-परिचित संस्कृति आदि आपके हाथ से एक ही झटके में निकल जाते हैं। अधिकतर नौकरीपेशा लोग अपने काम-धंधे में इस कदर मशगूल हो जाते हैं कि इस सांस्कृतिक जमा पूँजी के हाथ से निकल जाने से होने वाली सांस्कृतिक क्षति से अनभिज्ञ रहते हैं। लेकिन आजीविका की तलाश में इस सांस्कृतिक क्षति को हम सबको उठाना पड़ता है। हमारे पास कोई शॉर्टकट नहीं है कि इस क्षति से बच सकें। जन्मस्थान से पलायन एक स्थायी नियति है जिससे आधुनिककाल में पूरा समाज गुजरता है।

मैं मथुरा से जेएनयू पढ़ने के लिए 1979 में निकला तो जानता ही नहीं था कब वापस लौटूंगा। पढ़ते हुए मन में यही आशा थी कि कहीं मथुरा के आसपास ही नौकरी लग जाएगी और मथुरा से संपर्क-संबंध बना रहेगा। लेकिन बिडम्बना यह कि जैसा चाहा वैसा नहीं घटा। आमतौर पर जीवन में जैसा चाहते हैं वैसा नहीं घटता।

विश्वविद्यालय में अध्यापन नौकरी की तलाश में ढाई साल तक इधर-उधर दसियों विश्वविद्यालयों में इंटरव्यू दिए। जेएनयू से पढ़ाई खत्म करके निकलने के बाद दि.वि.वि. के दो कॉलेजों में इंटरव्यू देने के बाद तय किया कि कॉलेज में इंटरव्यू नहीं दूँगा और न नौकरी करूँगा। यही वजह थी कि विश्वविद्यालय में ही नौकरी के आवेदन करता रहा, परिचितों से खारिज होता रहा और अंत में कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नौकरी मिल गयी। नौकरी लगायी प्रो.के.पी.सिंह, काशीनाथ सिंह और सावित्री चन्द्र शोभा ने। विभिन्न विश्वविद्यालयों में नौकरी के लिए अनुपयुक्त पाया प्रो.नामवर सिंह, शिव कुमार मिश्र, रमेश कुंतल मेघ, नित्यानंद तिवारी आदि ने। इन लोगों ने जिन लोगों का चयन किया वे निश्चित तौर मुझसे योग्य थे, जो योग्य पाए गए उनकी अकादमिक क्षमता से हिंदी जगत बखूबी परिचित है।

नव्य उदार युग का मथुरा

कोलकाता अप्रैल1989 में आया और तबसे नवम्बर 2017 तक वहीं रहा। यहां आने के पहले दिल्ली में था तो मथुरा जल्दी-जल्दी जाता था लेकिन कोलकाता आने के बाद मथुरा आने-जाने का सिलसिला टूट गया। अब साल-छह महीने में आना-जाना होता। इसके कारण मथुरा में नए दोस्त नहीं बने। पुराने दोस्त लगातार उम्रदराज होते गए और उनमें से अनेक थक भी गए। अब नौकरी से रिटायर होने के बाद मथुरा रह रहा हूं तो एक नए मथुरा का अनुभव कर रहा हूं। यह नव्य उदार युग का मथुरा है। इसकी हर चीज नयी है।

का. सव्यसाची का अभाव

मथुरा से दूर हुआ तो सबसे बड़ा अभाव मुझे का. सव्यसाची का महसूस हुआ। सव्यसाची सही मायने में मथुरा में रचे-बसे थे, वहां के लोगों से घुले-मिले थे, उनसे मिलकर हमेशा मजा आता था, उनकी अनौपचारिक बोलने की शैली और तीखी भाषा हमेशा अपील करती थी। वे मुझे कभी कॉमरेड नहीं कहते ”पंडितजी´´ कहकर बुलाते थे। पता नहीं क्यों उन्होंने मेरे लिए पंडितजी सम्बोधन चुन लिया, मैं नहीं जानता, जबकि मुझे कोई और पंडितजी नहीं कहता था। सव्यसाची के पंडितजी कहने का असर अन्य लोगों पर भी हुआ, इसके कारण और भी कई मित्र पंडितजी कहने लगे। लेकिन इन चंद मित्रों को अलावा सब नाम से ही बुलाते हैं। मेरे मित्रों का सीधे नाम से पुकारना और सव्यसाची जी का पंडितजी कहकर पुकारना अपने आप में मेरे व्यक्तित्व के उन पहलुओं को अभिव्यंजित करता है जो मुझे सामाजिक विकास के क्रम में मिले हैं, मेरे व्यक्तित्व में दो किस्म के व्यक्ति हैं। एक वह व्यक्ति है जो पिता और संस्कृत पाठशाला ने बनाया, दूसरा वह व्यक्ति जिसे मथुरा –जेएनयू के मित्रों और जेएनयू की शिक्षा ने बनाया। मजेदार बात है कि मैं इन दोनों को आज भी जीता हूँ। मुझे अपने बचपन के संस्कृत के सहपाठी और अग्रज जितने अच्छे लगते हैं उतने ही जेएनयू के मित्र और कॉमरेड भी अच्छे लगते हैं।

बार-बार अपनी ओर खींचता है मथुरा का अतीत

मुझे मथुरा का अतीत बार-बार अपनी ओर खींचता है, लेकिन जेएनयू नहीं खींच पाता। जेएनयू से पढ़कर निकलने के बाद 1989 से लेकर आज तक में मात्र 4बार ही जेएनयू गया हूँ। लेकिन इस बीच मथुरा बार-बार गया, उन पुराने स्थानों पर बार- बार जाता हूँ जो मेरी बचपन की स्मृति का अंग हैं, या मेरी फैंटेसी का अंग हैं। अपने जीवन के तजुर्बे से यही सीखा है कि जन्मस्थान का मतलब कुछ और ही होता है। जन्मस्थान आपकी रगों में, इच्छाओं और आस्थाओं में रचा-बसा होता है, वह आपके व्यक्तित्व के निर्माण में बुनियादी रूप से भूमिका निभाता है। वह कभी पीछा नहीं छोड़ता।

मथुरा से निकले तकरीबन 35साल से ऊपर गुजर गए, इस बीच मथुरा में बहुत कुछ बदला है, जिसका कायदे से अध्ययन करना मेरा लक्ष्य है। मैं इस बीच मथुरा आता-जाता रहा हूँ, लेकिन मात्र पर्यटक की तरह, मथुरा को नए सिरे से पाने, समझने और महसूस करने के लिए वहां कुछ समय गुजारना बेहद जरूरी है, निकट भविष्य में यह काम कर पाऊँ तो बेहतर होगा।

मथुरा के मंदिर, बंदर, घाट, यमुना का किनारा, गलियां, वहां के लोगों की बेबाक भाषा, गालियां, अनौपचारिकता, औरतों का बिंदास भाव मुझे बहुत अच्छा लगता है। चलते -फिरते मथुरा को जितना मैं देखकर समझ पाया हूँ उसमें मुझे एक नए किस्म की मानुषगंध मिलती है।

मथुरा पहले की तुलना में स्मार्ट हो गया है। वहां के लोग पहले की तुलना में ज्यादा आधुनिक बने हैं, बदले हैं, खासकर स्त्रियां तो पहचानने में ही नहीं आतीं। इन दिनों आधुनिकता के परिवर्तनों ने मथुरा की युवा लड़कियों को बहुत ही आकर्षित किया हुआ है।

पुराने शहर के बाहर विशाल नया मथुरा, नयी रिहाइश वाला मथुरा बस गया है। दिलचस्प बात है मथुरा की गंध, पुराने शहर के अंदर ही महसूस कर सकते हैं। पुरानी गलियों में ही पुराने शहर की भाषा, गंदी नालियों, बंदरों आदि को देखकर महसूस कर सकते हो।

मेरी दिली ख्वाहिश है कि मथुरा की गलियों और उनकी जीवंतता के वैविध्य पर जमकर लिखूँ। हर गली की अपनी विशेषता है, वहां के रहने वाले लोगों की अपनी निजी विशेषताएं भी हैं। मथुरा के बाहर रहते हुए मथुरा का मर्म धीरे धीरे मन से खिसक गया है। ब्रजभाषा बोल नहीं पाता, वहां जाने पर दो-तीन दिन रहने पर ब्रजभाषा बोल पाता हूँ।

ब्रजभाषा का सुख मथुरा का सबसे बड़ा सुख है। बाहर रहते हुए मुझे रोज एक-दो ब्रजभाषा कविता पढ़ने की आदत पड़ गयी, इस आदत को मैंने सचेत रूप से विकसित किया, जिससे मैं मथुरा से जुड़ा रहूँ। मथुरा में बड़ी संख्या में पुराने मित्र भी हैं जो बार-बार याद आते हैं। लेकिन मथुरा को हमेशा भाषा में ही पाता हूँ, वहां जाता हूँ तो भाषा सुनने में मजा लेता हूँ।

मैंने अपने अनुभव से यही सीखा है कि यदि किसी शहर को पाना है तो वहां के लोगों को देखो और आत्मीयता से वहां की भाषा सुनो, शहर आपके मन में उतरता चला जाएगा।

कोलकाता में 27साल से ज्यादा रहा हूँ और यहां पर मैंने बोलचाल की बंगला भाषा के जरिए बंगाल को महसूस किया है। घर से जब पढाने जाता तो रास्ते में बंगला में लोगों की बातें सुनते हुए बंगाल को पाता, उसी क्रम में बंगला का आस्वाद विकसित हुआ, बंगला समझने की क्षमता पैदा हुई। यहां तक कि नए बंगला शब्दों को भी मैंने बोलचाल की बंगला के जरिए ही अर्जित किया, सीखा। असल में जीवन तो भाषा में ही व्यक्त होता है

मथुरा की याद आती है तो सूरदास याद आते हैं, उनकी यह पंक्ति बहुत प्रिय है- "आजु कोऊ नीकी बात सुनावै।" वैसे उनकी यह पूरी कविता ही बहुत सुंदर है-

आजु कोऊ नीकी बात सुनावै ।

कै मधुबन तैं नंद लाड़लौ, कैऽब दूत कोउ आवै ॥

भौंर एक चहूँदिसि तैं उड़ि-उड़ि, कानन लगि-लगि गावै ।

उत्तम भाषा ऊँचे चढ़ि-चढ़ि, अंग-अंग सगुनावै ॥

भामिनि एक सखी सौं बिनवै, नैन नीर भरि आवै ।

सूरदास कोऊ ब्रज ऐसौ, जो ब्रजनाथ मिलावै ॥

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