जब मेहनतकशों के हकहकूक भी खत्म हैं तो मई दिवस की रस्म अदायगी का क्या मतलब?

जब मजदूर आंदोलन हैं ही नहीं, जब मेहनतकशों के हकहकूक भी खत्म हैं तो मई दिवस की रस्म अदायगी का क्या मतलब? सरकार अब मैनेजर की भूमिका में है हरियाणा में अब मजदूर दिवस विश्वकर्मा दिवस पर मनाया जाएगा!...

हाइलाइट्स
  • जब मजदूर आंदोलन हैं ही नहीं, जब मेहनतकशों के हकहकूक भी खत्म हैं तो मई दिवस की रस्म अदायगी का क्या मतलब?
  • सरकार अब मैनेजर की भूमिका में है
  • हरियाणा में अब मजदूर दिवस विश्वकर्मा दिवस पर मनाया जाएगा!

पलाश विश्वास

पहली मई को शिकागो में मजदूरों ने अपनी शहादत देकर काम के आठ घंटे का हक हासिल किया था। उन्हीं के लहू के रंग से रंगा है मजदूरों का लाल झंडा। आज जब हम भारत और बाकी दुनिया में पहली मई मानने की रस्म अदायगी कर रहे हैं, तो संगठित और असंगठित मजदूरों की दुनिया में मेहनतकशों के सारे हक हकूक सिरे से लापता हैं।

मुक्तबाजार की कारपोरेट दुनिया डिजिटल हो गयी है। कल कारखानों और उत्पादन इकाइयों में आटोमेशन हो गया है। उत्पादन में मशीनों के बाद कंप्यूटर और कंप्यूटर के बाद रोबोट का इस्तेमाल होने लगा है।

कारपोरेट दुनिया में सारे कामगार, सारे कर्मचारी और सारे अफसरान भी अब ठेके पर हैं। जिनके काम के घंटे तय नहीं है।

कहने को भारत में 16154 कामगार संगठन हैं, जिनके करीब 92 लाख सदस्य हैं। भारत में कुल 50 करोड़ कर्मचारी व मजदूर हैं, जिनमें करीब 94 फीसदी असंगठित क्षेत्र के कामगार हैं।

भारत में मेहनतकशों के तमाम कानूनी हक हकूक सिरे से खत्म हो गये हैं। श्रम कानून सारे खत्म हैं। वैसे भी मुक्तबाजार की अर्थव्यवस्था में उत्पादन प्रणाली तहस नहस है और सारा जोर सर्विस और मार्केंटिंग पर है, जहां उत्पादन होता नहीं है। जहां श्रम का कोई मूल्य नहीं है और न उसकी कोई भूमिका है।

संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में नौकरी अब ठेके पर होते हैं और ठेके में काम के घंटे तय नहीं होते।

आटोमेशन माने व्यापक पैमाने पर छंटनी

डिजिटल कैशलेस इंडिया का मतलब भी जमीनी स्तर तक आटोमेशन है। आटोमेशन माने व्यापक पैमाने पर छंटनी। क्योंकि सरकार अब मैनेजर की भूमिका में है और मेहनतकशों, कामगारों और कर्मचारियों के हकहकूक की कोई जिम्मेदारी उसकी नहीं है। उसे देशी विदेशी पूंजी के हित में सारी चीजें मैनेज करना होता है।

ऐसे हालात में क्या मई दिवस और क्या मेहनतकशों के हकहकूक?

बहरहाल, पहली मई को दुनिया के कई देशों में श्रमिक दिवस मनाया जाता है और इस दिन देश की लगभग सभी सरकारी गैरसरकारी उत्पादन इकाइयों और कंपनियों में छुट्टी रहती है। भारत ही नहीं, दुनिया के करीब 80 देशों में इस दिन राष्‍ट्रीय छुट्टी होती है। हालांकि इस साल हरियाणा सरकार ने लेबर डे नहीं मनाने का फैसला किया है। जहां उसी विचारधारा की सरकरा है, जिसकी सत्ता केंद्र में है। जैसे श्रमिक कानून खत्म करने की शुरआत राजस्थान से हुई, वैसे ही श्रमिक दिवस खत्म करने की शुरुआत हरियाणा से हो गयी है।

हरियाणा सरकार ने इस साल मजदूर दिवस नहीं मनाने का फैसला किया है। प्रदेश के श्रम राज्य मंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि हमने फैसला लिया है कि 1 मई को मजदूर दिवस नहीं मनाएंगे। मजदूर दिवस विश्वकर्मा दिवस पर मनाया जाएगा, जो दीपावली के अगले दिन होता है। हालांकि मजदूर संगठनों ने इसका विरोध किया और उनका कहना है कि सरकार की मंशा ठीक नहीं है।

बहुत जल्द मई दिवस मनाने की रस्म अदायगी भी खत्म होने जे रही है। 1991 से उदारीकरण, निजीकरण, ग्लोबीकरण के तहत हमने जिस डिजिटल अर्थव्यवस्था को अपनाया है, उसमें तेजी से मेहनतकशों का दमन और सफाया का अभियान बिना रोक टोक चल रहा है और मेहनतकशों के वोटों से चुनी हुई सरकार और आम जनता के चुने हुए नुमाइंदों की संसदीय सहमति से आर्थिक सुधार के नाम मेहनतकशों के हक हकूक खत्म करने के लिए तमाम कानून खत्म कर दिये गये हैं या बदल दिये गये हैं। इसके साथ ही ट्रेड यूनियन आंदोलन खत्म हो गया है।

नए श्रम कानून में प्रस्तावित बदलाव के तहत अब कर्मचारियों को नौकरी से निकालना आसान होगा वहीं कर्मचारियों के लिए यूनियन बनाना ज्यादा मुश्किल हो जाएगा ट्रेड यूनियन बनाने के लिए न्यूनतम 10 फीसदी या 100 कर्मचारियों की जरूरत होगी। फिलहाल 7 कर्मचारी मिलकर ट्रेड यूनियन बना सकते हैं। नए कानून में तीन पुराने कानूनों को मिलाया जाएगा। नौकरी से निकाले जाने पर ज्यादा मुआवजे पर विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही 1 साल से पुराने कर्मचारी को छंटनी के पहले 3 महीने का नोटिस देना जरूरी होगा। नया श्रम कानून इंडस्ट्रियल डिस्प्युट्स एक्ट 1947, ट्रेड यूनियंस एक्ट 1926 और इंडस्ट्रियल एंप्लॉयमेंट (स्टैंडिंग ऑर्डर्स) एक्ट 1946 की जगह लेगा।

ट्रेड यूनियनें अब मैनेजमेंट का हिस्सा है, जिनका इस्तेमाल मजदूर आंदोलन को सिरे से खत्म करना है।

जब मजदूर आंदोलन है ही नहीं, जब मेहनतकशों के हकहकूक भी खत्म है तो मई दिवस की रस्म अदायगी का क्या मतलब?

अब मजदूर जिवस तो हम मना रहे हैं लेकिन मेहनतकशों की लड़ाई सिरे से खत्म है और मजदूरों के सारे हकहकूक खत्म हैं और अब उनके रोजगार या नौकरी की भी कोई गारंटी नहीं है। जो अभी काम पर हैं, उनके काम के घंटे भी तय नहीं हैं।

मई दिवस पर अपने मशहूर गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार के इस मंतव्य में अंधाधुंध शहरीकरण और उपभोक्ता संस्कृति के मुक्तबाजार में उत्पादन प्रणाली से बाहर इस कारपोरेट दुनिया में सर्वव्यापी असंगठित क्षेत्र में मेहनतकशों के मौजूदा हालात बयां हैः

कभी सड़क पर कपड़े की पोटली में बच्चा लटकाए सड़क बनाते मजदूर पति पत्नी से पूछियेगा कि वो पहले क्या करते थे ?

इनमें से बहुत सारे मजदूर पहले किसान थे जिन्हें हम शहरियों के विकास के लिए बाँध बनाने, हाई वे बनाने , हवाई अड्डा बनाने या अमीरों के कारखाने बनाने के लिए उजाड दिया गया .

हमने किसान को पहले मजदूर बना दिया

फिर जब ये मजदूर पूरी मजदूरी मांगता है तो हमारी ही पुलिस इन मजदूरों पर लाठी चलाती है इन्हें गोली से उड़ा देती है

आज तक कभी पुलिस को किसी अमीर को पीटते हुए देखा है कि तुम अपने मजदूरों को कानून के मुताबिक मजदूरी क्यों नहीं देते ?

आज तक श्रम विभाग के किसी अधिकारी को इस बात पर सज़ा नहीं हुई कि तुमने एक भी फैक्ट्री में मजदूरों को पूरी मजदूरी दिलाने के लिए कार्यवाही क्यों नहीं करी ?

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि अगर कोई भी मजदूर कम मजदूरी पर काम करता है उसे बंधुआ मजदूर माना जायेगा ၊

अब ज़रा राष्ट्र की राजधानी में ही सीक्योर्टी गार्ड की नौकरी करने वाले से पूछियेगा कि उसकी ड्यूटी आठ घंटे की है या बारह घंटे की ?

आठ घंटे के काम के लिए मजदूरों नें लंबा संघर्ष किया था ၊

दिल्ली की हर फैक्ट्री में मजदूरों से बारह बारह घंटे काम करवाया जा रहा है , खुद जाकर देख लीजिए ၊

लेकिन यह सब देखना सरकार की प्राथमिकता ही नहीं है ၊

सभी पार्टियां इस मामले में एक जैसी साबित हुई हैं ၊

आप मानते हैं कि देश में सब ठीक ठाक चल रहा है ၊

हमें इसी बात की चिंता है कि इतना अन्याय होते हुए भी सब कुछ ठीक ठाक क्यों चल रहा है ?

हमारी चिंता अशांति नहीं है ၊

हमारी चिंता शांति है ၊

अन्याय के रहते शांति बेमानी और नाकाबिले बर्दाश्त है ၊

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