मायावती के कांग्रेस से कुट्टी के गहरे राजनीतिक अर्थ और स्वार्थ हैं

मायावती राजनीति की माहिर खिलाड़ी हैं और वे अच्छे से जानती हैं कि कांग्रेस से गठबंधन न करने का ऐलान और साथ ही कांग्रेस के दोष गिनाने से सीधा फायदा भाजपा को होगा।...

देशबन्धु
मायावती के कांग्रेस से कुट्टी के गहरे राजनीतिक अर्थ और स्वार्थ हैं

बसपा प्रमुख मायावती ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन से साफ इन्कार कर दिया है। छत्तीसगढ़ में तो वे पहले ही कांग्रेस से अलग हुए अजीत जोगी के साथ गठबंधन कर चुकी हैं, अब मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी उन्होंने कांग्रेस के साथ न आने का ऐलान किया। उन्होंने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में उनकी पार्टी अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और किसी भी कीमत पर कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा। गठबंधन न होने के लिए उन्होंने दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहराया और उन्हें भाजपा का एजेंट भी बताया। लेकिन दूसरी ओर यह भी कहा कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो गठबंधन चाहते थे।

कर्नाटक चुनाव के बाद जगी थी महागठबंधन की उम्मीद

अभी जनता वह दृश्य नहीं भूली होगी, जब कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में सोनिया गांधी और मायावती के बीच गर्मजोशी दिखी थी।

कर्नाटक में जेडीएस के साथ बसपा ने पहले ही गठबंधन किया था और कहा जाता है कि मायावती की पहल पर ही कांग्रेस ने मतगणना के बाद जेडीएस का साथ देने का ऐलान किया और भाजपा को सत्ता से बेदखल कर सरकार बनाई।

कर्नाटक चुनाव के बाद देश में विपक्षी दलों के महागठबंधन की संभावनाएं बलवती हो रही थीं और भाजपा खेमे में इससे बेचैनी भी नजर आ रही थी। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह और तमाम दिग्गज भाजपाई अक्सर महागठबंधन के अस्तित्व पर सवाल उठाते और यह दावा करते कि भाजपा के खिलाफ कोई एकजुटता नहीं होगी। अब भाजपा का यह दावा सही होता दिख रहा है। महाराष्ट्र में शरद पवार, पं.बंगाल में ममता बनर्जी, उप्र में अखिलेश यादव अब तक उस संभावित महागठबंधन पर कोई पुख्ता फैसला नहीं ले पाए हैं, जिसकी कमान कांग्रेस के हाथ में होगी। ये सभी कहीं न कहीं प्रधानमंत्री बनने की दबी-छिपी लालसा रखते हैं और दूसरी ओर राजनीति में सभी की कमजोर कड़ियां भी हैं, जिसे लेकर सत्तारूढ़ भाजपा इन्हें दबा सकती है।

अब मायावती का नाम भी इस सूची में शामिल हो गया है। उनके समर्थक उन्हें प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं। लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों और पिछले लोकसभा चुनावों में उनका दायरा बिल्कुल सिमट गया है। उपचुनावों में उन्होंने सपा से हाथ मिलाया, जिसका नुकसान भाजपा को हुआ। आगे भी बसपा, सपा से दोस्ती जारी रखना चाहती है और अखिलेश यादव ने भी संकेत दिए हैं कि भाजपा को हराने के लिए वे दो कदम पीछे हटने तैयार हैं। यानी बसपा को अधिक सीटें देने में उन्हें गुरेज नहीं है। लेकिन भाजपा को हराने का यही जज्बा बसपा-कांग्रेस की दोस्ती में नजर नहीं आया।

मायावती राजनीति की माहिर खिलाड़ी हैं और वे अच्छे से जानती हैं कि कांग्रेस से गठबंधन न करने का ऐलान और साथ ही कांग्रेस के दोष गिनाने से सीधा फायदा भाजपा को होगा। फिर भी उन्होंने ये कदम उठाया है, यानी इसके गहरे राजनीतिक अर्थ और स्वार्थ हैं

तो भाजपा को होगा फायदा

बीते कुछ समय से जो राजनैतिक विश्लेषण हो रहा था, उसमें छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश तीनों जगह भाजपा के कमजोर होने की खबरें आ रही थीं राजस्थान और मध्यप्रदेश में तो भाजपा का विरोध कई जगह खुलकर हुआ और उपचुनावों में उसकी हार भी जनता ने देखी। राजस्थान में बसपा-कांग्रेस गठजोड़ का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यहां कांग्रेस मजबूती से उभर ही रही थी। लेकिन मध्यप्रदेश में कमलनाथ को उम्मीद थी कि बसपा से गठबंधन होने पर भाजपा को हराया जा सकता था। वे इसमें गोंडवाना गणतंत्र परिषद को भी साथ लाना चाहते थे। गौरतलब है कि मप्र के पन्ना, छत्तरपुर, सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली, टीकमगढ़, शिवपुरी, अशोकनगर, ग्वालियर, शिवपुर, दतिया, भिंड और मुरैना इन तमाम जिलों में बसपा मजबूत है। अगर वह कांग्रेस के साथ आती, तो उसे भी लाभ होता और कांग्रेस को भी।

लेकिन अब इन दोनों के अलग चुनाव लड़ने पर वोट बंटेंगे और जाहिर है फायदा भाजपा को मिलेगा। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि भाजपा को लाभ पहुंचाने वाला यह कदम आखिर क्यों उठाया गया? मायावती को दिग्विजय सिंह से शिकायत है, लेकिन इस वक्त तो वे कांग्रेस में कोई महत्वपूर्ण पद या जिम्मेदारी नहीं संभाल रहे हैं। कमान तो राहुल गांधी के हाथों में है।

उधर दिग्विजय सिंह का भी राजनैतिक गणित दो और दो पांच वाला लग रहा है। वे एक ओर महागठबंधन होने की संभावनाएं जतला रहे हैं, दूसरी ओर मायावती के लिए यह बयान दे रहे हैं कि वे भाजपा के दबाव में हैं। उनके इस बयान से मायावती खासी नाराज हैं। और यह नाराजगी कांग्रेस पर उतरी है। अब देखने वाली बात यह है कि ये नाराजगी केवल विधानसभा चुनावों तक रहती है या उससे आगे आम चुनावों में कायम रहेगी।

वैसे विधानसभा और लोकसभा का गणित अलग-अलग होता है। पिछले दो-ढाई दशकों में केंद्र की सत्ता बिना गठबंधन के चल ही नहीं पाई है। इस बार भाजपा को पूर्ण बहुमत है, फिर भी एनडीए बना हुआ है और अगले चुनाव में भी एनडीए भाजपा की मजबूरी रहेगा। अब देखना यह है कि यूपीए का कुनबा कितना बढ़ता है? क्या महागठबंधन हकीकत में तब्दील होता है? अगर होता है, तो फिर कांग्रेस उसमें किस भूमिका में रहेगी और क्षेत्रीय दलों की क्या स्थिति रहेगी?

... और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या राहुल गांधी बड़बोले नेताओं की बयानबाजी रोककर अपना इकबाल बुलंद करेंगे, ताकि कांग्रेस के साथ देने के लिए लोग आगे बढ़ें।

(देशबन्धु का संपादकीय )

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